सम्मान कैसे मिलता है?

सम्मान कैसे मिलता है?
गौतम बुद्ध और उनके शिष्य अक्सर जगह जगह भ्रमण करते थे। गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को बोल रखा था कि किसी भी गांव में एक महीने से ज्यादा और किसी भी घर में एक रात से अधिक आसरा न लें क्योंकि इससे लोगों पर आर्थिक दिक्कत होगी क्योंकि साधू संत को कोई भी अपने घर से जाने को नहीं कहेगा पर हमें उनकी परेशानियों को ध्यान में रखना चाहिए।

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एक बार वर्षा ऋतु थी जिसके कारण गौतम बुद्ध और उनके शिष्यों को एक ही गांव में अधिक समय तक रूकना पड़ा। गौतम बुद्ध ने कहा एक घर में इकट्ठा रहने से बेहतर है हम सब अलग अलग घरों में आसरा लें इससे किसी एक पर बोझ नहीं पड़ेगा।सब शिष्यों ने बात मानी और ग्रामीण वासियों से आग्रह किया, ग्रामीण वासियों ने खुशी खुशी उन सबको आसरा दिया।एक शिष्य एक घर से गुजरा तो घर के दरवाजे पर एक महिला जो कि पैशे से वेश्या थी उन्हें देख मोहित हो गई और उसने उन्हें रोका और कहा आप? गौतम बुद्ध के शिष्य ने अपना परिचय दिया और परेशानी सांझा की।

उसने कहा कि यदि आप मेरे घर में ठहरे तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। शिष्य ने कहा मैं अपने गुरु की आज्ञा के बाद ही आपके यहां ठहरूंगा। वैश्या ने कहा मैं एक वैश्या हूं आपके गुरु आपको यहां रूकने की अनुमति नहीं देंगे। शिष्य ने कहा मैं उनसे पूछें बिना यहां नहीं रह सकता और वो गौतम बुद्ध के पास गए और उन्होंने उनसे पूछा कि क्या मैं उस महिला के घर में रह सकता हूं। गौतम बुद्ध ने पूछा कि यदि तुम्हें कोई आपत्ती नही है तो तुम अवश्य ही रह सकते हों।

बाकी शिष्यों चकित हो उठे और गौतम बुद्ध से बोलें कि एक साधू एक वैश्या के घर में कैसे रुक सकता है ये पाप है।हम सब यहां आपसे धर्म के ज्ञान को अर्जित करने आए है और आप हमें पाप सिखा रहे हैं। एक साधू वैश्या के घर में रहेगा इससे हमारी इज्जत संसार में क्या रह जाएगी?

गौतम बुद्ध मुस्कुराते हुए पुनः उस शिष्य से पूछें क्या तुम्हें कोई आपत्ती है शिष्य ने ईमानदारी से जवाब दिया नहीं मुझे उस महिला के काम से उसके चरित्र से कोई आपत्ती नही है। मैं निसंकोच उसके यहां रहने को तैयार हूं।

गौतम बुद्ध की आज्ञा के बाद उस शिष्य ने पूरे वर्षा ऋतु उस महिला के घर में बिताया। एक तरफ शिष्य अपनी साधना में लीन रहता तो दूसरी तरफ वो महिला उसे रिझाने के लिए नृत्य,गान आदि कोशिशें करती पर शिष्य अपने साधना से भटका नहीं और उसने महिला को भी कुछ नहीं कहा बल्कि उल्टा उसके कला को सराहा।

वर्षा ऋतु खत्म होने को आया गौतम बुद्ध ने सभी शिष्यों को गांव से चलने को कहा।सभी शिष्यों ने उस शिष्य के आने की प्रतीक्षा की, जब शिष्यों ने उसे देखा तो सब चकित रह गए उसके साथ एक और साध्वी थी वह महिला। शिष्य से प्रभावित होकर उसने भी अधर्म छोड़ धर्म का मार्ग अपना लिया था।सभी शिष्यों और गांववासियों की नजर में उस शिष्य के प्रति इज्जत सम्मान और बढ़ गया।

तब गौतम बुद्ध ने कहा कि मान अपमान सब मनुष्यों की अवधारणा है यदि सभी को बिना किसी भेदभाव के अपनाएंगे , सम्मान देंगे और उसकी परिस्थितियों को देख उसे अपमानित करने के बजाय अपने विचारों उसके जीवन को सही दिशा देंगे ये सोचें बिना कि अगला कैसा व्यक्ति हैं और उसका आचरण कैसा है तो यकीन मानिए ईश्वर की नजर में आपसे अधिक सम्मानित व्यक्ति कोई नहीं होगा।

सीधे शब्दों में कहूं तो यदि आपके विचारों में सबके प्रति सम्मान है ये सोचें बिना कि इसका जाति, व्यवसाय, व्यवहार, परिस्थिति क्या है तो आपको भी सदैव सम्मान मिलेगा क्योंकि दुनिया कैसी भी हो आप अपने धर्म कर्म के मार्ग से मत भटके और सम्मान अपमान देने लेने का विषय ईश्वर पर छोड़ दें।

विज्ञान भी कहता है हर क्रिया की कोई न कोई प्रतिक्रिया होती है और आपकी ऊर्जा जो आप खर्च करते हैं वो आपको वापस मिलती है नष्ट नहीं होती। मतलब आप जैसा देंगे वैसा पाएंगे।


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