बच्चों को महामानव कैसे बनाएं? Paintings of ancient India

बच्चों को महामानव कैसे बनाएं? Paintings of ancient India

यदि आप अपने बच्चों को महामानव के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षा के साथ योग विद्या ,अस्त्र शस्त्र विद्या यज्ञ विज्ञान के साथ मन में उठने वाले अध्यात्म ज्ञान से संबंधित प्रश्नों के लिए उपनिषदों का ज्ञान देना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी बालक को महामानव के रूप में विकसित करने के लिए !!! वेद नहीं ! बल्कि उपनिषद सनातन की प्रथम आवश्यकता हैं। उपनिषदों में ही संपूर्ण अध्यात्म विद्या का रहस्य समझाया गया है। संसार का सारा ज्ञान मिलकर भी उपनिषदों का स्थान नहीं ले सकता। संख्या में उपनिषद 108 कहे गए हैं किंतु इनकी संख्या और भी अधिक है ।ये बहुत बड़े ग्रंथ नहीं हैं । मात्र तीन पुस्तकों में सारे उपनिषद इकट्ठे हो गए हैं। वर्तमान में उपलब्ध संपूर्ण उपनिषद मात्र ₹450 में किसी भी नजदीकी गायत्री शक्तिपीठ या शांतिकुंज हरिद्वार या युग निर्माण चेतना केंद्र मथुरा से प्राप्त किए जा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति उपनिषदों को फोन करके डाक से भी मंगा सकता है।

बच्चों को उनके कोर्स के साथ मुख्य मुख्य उपनिषदों का ज्ञान दिया जाए। संपूर्ण योग विद्या, संपूर्ण ब्रह्मविद्या उपनिषदों में समाहित है। शाब्दिक ज्ञान के साथ योग का प्रैक्टिकल ज्ञान भी चलता रहे। अस्त्र शस्त्र का प्रशिक्षण भी चलता रहे। आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षा भी चलती रहे। यदि हम ऐसा कर सके तो वास्तविक रूप में ऐसे महान मनुष्यों को विकसित कर सकते हैं जैसे प्राचीन समय में होते थे। हमने समाज को योग का ज्ञान देना बंद कर दिया इसलिए इस संसार में सिर्फ भोगी दिखाई दे रहे हैं और सत्ता हजारों वर्षों से सिर्फ भोगियों के हाथ में रही है । हमारे पास मस्तिष्क को विकसित करने की वह अद्भुत तकनीक है । जो संसार के अन्य किसी भी धर्म के पास नहीं, किसी भी देश के पास नहीं!!! हम मस्तिष्क को 100% इस्तेमाल करने की सामर्थ्य जागृत कर सकते हैं। इसी को आज्ञा चक्र का संपूर्ण जागरण कहा जाता है। जिस दिन पूर्णरूपेण आज्ञा चक्र जाग्रत हो जाता है ,वही स्थिति शत-प्रतिशत प्रज्ञा के उपयोग की होती है ।

प्राणायाम ,ध्यान एवं गायत्री महामंत्र का जप ,इनका सहयोग मिलकर मस्तिष्क चेतना में वह प्रकाश उत्पन्न करते हैं ।जिस प्रकाश के बारे में अन्य धर्म के अनुयायी सोच भी नहीं सकते। किंतु इस धर्म के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह हो गई कि इसने अपने वास्तविक ज्ञान को स्वयं ही मिट्टी पलीत कर लिया है । इस धर्म के अनुयायीअपने पैर स्वयं काट रहे हैं। यदि कोई सत्य का प्रकाश जन-जन तक फैलाना चाहता है तो पाखंडवादी पाखंड को बचाने के लिए अपनी ताकत लगा देते हैं। यही घटिया सोच इस धर्म को विकसित मानसिकता की ओर आगे नहीं बढ़ने दे रही है। सनातन के ज्ञान को कोई प्रचारित प्रसारित नहीं कर रहा किंतु आज योग विज्ञान बिक रहा है ।और संपूर्ण विश्व उसे खरीद रहा है , वह भी महंगे दाम पर किंतु भारतवर्ष में आज भी आश्चर्य की बात है । यह सत्य दिव्य ज्ञान उस स्तर पर विकसित नहीं हो पाया है । जिस स्तर पर होना चाहिए था।

आज संपूर्ण विश्व सनातन के मूल ज्ञान को अपनाकर अपनी बुद्धि को विकसित कर चुका है । बौद्ध अनुयायी आज इसी ज्ञान के दम पर अपने विवेक को विकसित कर चुके हैं । पाश्चात्य जगत भी इसी पद्धति का अनुसरण करके विकसित मस्तिष्क को प्राप्त कर चुका है किंतु जिस देश ने सत्य ज्ञान दिया उसके अनुयायी ढोंग , पाखंड ,आडंबर में लिपटे हुए हैं और तरह-तरह की मनगढ़ंत कहानियों में उलझ कर विज्ञान के इस तर्कसंगत युग में भी न जाने कैसी-कैसी मूर्खतापूर्ण बातों पर विश्वास करके बैठे हैं।

यदि धर्म अनुयायियों में वास्तविक रूप में सत्य चेतना का प्रसारण करना है तो सबको विज्ञान सम्मत साधना पद्धति "योग पद्धति "से जोड़ना होगा ।इस पद्धति में किसी को कोई दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है।हमारे ऋषि-मुनियों ने इस पद्धति को अपने आप में संसार की सर्वश्रेष्ठ पद्धति के रूप में विकसित किया है ।सीधा पकवान तैयार है !! बस उठाओ और खाओ !! इसमें जिसकी जिस जिस पकवान को खाने की क्षमता हो उस उस पकवान को खाएं और आनंद का लाभ उठाएं!!! यदि कोई डायबिटीज का मरीज है ?कोई अस्थमा का मरीज है ?कोई हर्ट का मरीज है तो अपने अपने पथ्य -अपथ्य के अनुसार पकवान का उपयोग करें !!! जिसको जो सूट नहीं करता ,उसे छोड़ दें अर्थात बच्चे एवं युवा अधिकांश आसनों का भी अभ्यास करें ।प्राणायाम करें । ध्यान करें ।मंत्र जप भी करें ।जो वृद्ध है ,बीमारी से ग्रस्त है , किसी प्रकार की अंग विकृति से ग्रस्त हैं।वे अपनी सुविधा के अनुसार आसन में बैठकर प्राणायाम करें । ध्यान करें एवं मंत्र जप करें ।

वेदों में अलग-अलग आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग मंत्र दिए हुए हैं !! थोड़ा विशेषज्ञों से अपनी आवश्यकता बता कर मंत्र जान लें और उसी अनुरूप मंत्र का जप करें ।यदि स्वास्थ्य लाभ चाहिए तो महामृत्युंजय मंत्र है ।यदि ब्रह्म साक्षात्कार चाहिए ! संपूर्ण ब्रह्मांड के ज्ञान को प्रकाशित करने वाली दिव्य प्रज्ञा चाहिए !संपूर्ण पाप मुलक प्रवृत्तियों से मुक्ति चाहिए!! दरिद्रता एवं कर्ज से मुक्ति चाहिए !साथ में ब्रह्म तेज के साथ अंत समय में मुक्ति चाहिए तो गायत्री महामंत्र हैं न । मंत्रों की दिव्य शब्द शक्ति आपके व्यक्तित्व को अपनी शक्ति से आच्छादित कर लेती है फिर आप अपनी इच्छा से नहीं ,उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मा एवं मां आदिशक्ति जगत जननी की इच्छा से आगे बढ़ने पर मजबूर होते हैं ।

हम अपने ही बुरे कर्मों की वजह से बंधन में बंधे हुए हैं ।गायत्री महामंत्र की दिव्य शब्द शक्ति हमें मनमानी करने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं देती ।फिर आप मन माना आचरण नहीं कर सकते । फिर आप वही करेंगे जो आप से करवाया जाएगा और यदि आप गलती करेंगे तो स्पष्ट रूप से आप को दंड भी मिलेगा ।

जो शक्ति इस संपूर्ण ब्रह्मांड को चला रही है । उससे यह दिव्य योग ही आपको संपूर्ण विश्व से जोड़ने में समर्थ है। जिसकी चेतना ने वास्तविक रूप में विराट चेतना से संपर्क स्थापित कर लिया ।वह संपूर्ण विश्व को उद्वेलित करने में एक न एक दिन समर्थ हो ही जाएगा। वह कुछ नहीं कर के भी बहुत कुछ कर जाएगा। संसार को वह चाहे कुछ करता हुआ दिखाई दे या न दे किंतु निश्चित रूप से वह बहुत कुछ कर जाएगा।

-- रामेश्वर हिंदू

अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा


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