मानव जीवन और परलोक

मौत एक ऐसी सच्चाई है, जिसको झुठलाया नहीं जा सकता।  इंसान अपने क़रीबी, अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को मौत के गाल में समाते हुए देखता है, लेकिन उन्हें मौत से बचा नहीं सकता।  उसे यह ख़याल भी आता है कि एक दिन उसे भी मरना है और सदैव के लिए इन संसार से चले जाना है।

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इंसान के समाने कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका सही उत्तर मिलना अत्यंत आवश्यक है।  जैसे-जीवन क्या है, ज़िन्दगी का स्रष्टा कौन है, हमसे वह क्या चाहता है, मौत क्या है, मौत के पश्चात् जीवन है या नहीं, अगर जीवन है, तो परलोक में सफल व कामयाब होने के लिए इस सांसारिक जीवन में क्या करना होगा। अगर जीवन नहीं है, तो क्या मौत के पश्चात् जीवन समाप्त हो जाता है।
इन प्रश्नों पर दार्शनिकों और विद्वानों ने हमेशा ही चिन्तन-मनन किया है, विशेष रूप से इस जीवन के बाद आने वाली मौत के बारे में तथा कुछ धर्मो में भी इसके बारे में प्रकाश डाला है, जो इस तरह है-

1-जीवन अस्ल और आख़िरी है। मरने के बाद कोई जीवन नहीं है, इसलिए इंसान जीवन को हर तरह से सफल बनाये।  जीवन का उद्देश्य बस ऐसो-आराम और भोगविलास है।

2-कुछ लोगों का विचार है कि मौत के बाद जीवन है।  इसे परलोक का जीवन कह सकते हैं।  स्वर्ग और नरक भी एक सच्चाई है। पारलौकिक जीवन में स्वर्ग पाने के लिए इंसान उस ईश्वर के बेटे पर अपनी आस्था रखें और यह स्वीकार करे कि हर इंसान पैदाइशी गुनाहगार है अर्थात जन्मजात पापी है।  उसके बेटे ने सूली पर जान देकर इंसानों के गुनाहों और पापों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) अदा कर दिया।

3-कुछ दूसरें लोगों का विचार है कि मरने के बाद जीवन का अंत नहीं होता।  इंसान अपने भले और बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए बार-बार इस संसार में जन्म लेता है कभी कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और कभी इंसान के रूप में।  यहाँ तक कि 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् इंसान को मुक्ति मिलती है।

4-एक धारणा यह है कि यह सांसारिक जीवन हर इंसान के लिए एक इम्तिहान है।  इंसान और समस्त जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, चल-अचल सब चीज़ों का स्रष्टा एक है।  ईश्वर के इंसान को बुद्धि-विवेक प्रदान की है, ताकि वह सोच-विचार करके अपना जीवन-व्यतीत करे कि मौत के बाद एक हमेशा का जीवन है।  जिसने ईश्वर को एक मालिक, पालनहार, स्रष्टा मानकर उसके बताये हुए मार्ग पर चलकर अपना जीवन निर्वाह किया, वह मरने के बाद स्वर्ग का अधिकारी होगा, यह उसके लिए बहुत ही बड़ी सफलता है।  जिसने ईश्वर को नहीं माना और उसके बताये गए मार्ग पर न चला और अपना जीवन ईश्वरीय  इच्छा के विपरीत गुज़ारा, वह नरक का भागी होगा।  उसे नरक की दहकती हुई आग में सदैव के लिए जलना होगा।  यह उसके लिए बहुत नाकामी व असफलता होगी।  इंसान अपने सांसारिक कर्मों के लिए ईश्वर के समक्ष जबावदेह और हर कर्म के बारे में अल्लाह इंसान से पूछेगा।
ये विचार व धारणाए एक ही समस्या के बारे में एक-दूसरें से विपरीत ही नहीं, बल्कि एक-दूसरें के विरुद्ध हैं।  एक ही समय में सब सही कैसे हो सकते हैं, उनमें से कौन-सा विचार सही और सच्चाई के क़रीब है ? इसकी जानकारी प्राप्त करके इसकी कमियों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी इंसान की है। पारलौकिक जीवन या मृत्यु पश्चात् जीवन के बारे में हमें बहुत सोच-समझ कर निर्णय करना है।  आज के ग़लत फ़ैसले का परिणाम कल नरक की आग और भयानक प्रकोप के रूप में सामने आये तो यह कितना भयानक परिणाम है।

जो लोग मौत के बाद जीवन को आंखों से देखे बिना मानने के लिए तैयार नहीं हैं, वे विश्वास के साथ केवल इतनी बात कह सकते हैं कि हम नहीं जानते कि मरने के बाद कोई जीवन है या नहीं, लेकिन वे यह बात नहीं कह सकते कि हम जानते हैं कि मरने के बाद कोई जीवन नहीं है। इसी सच्चाई को मालूम करने के लिए आंखों देखना ही एक मात्र रास्ता नहीं है।  आज तक कोई मरने वाला वापस लौटकर यह नहीं बताता कि मौत के बाद जीवन है, स्वर्ग और नरक सब कुछ है और न ही उसने यह बताया कि मौत के बाद कोई  और जीवन नहीं है।  स्वर्ग और नरक की धारणा सब झूठ है, मैंनें स्वयं अपनी आंखों से देखा है कि वहाँ कुछ नहीं है।  जब जीवन के इतने अहम मसले में ऐसी सूरते हाल से हम दो-चार हों तो फिर सच्चाई तक पहुँचने का मार्ग क्या हो सकता है ?

मौत के बाद जीवन के बारे में आंखो देखी असफलता के बाद सच्चाई तक पहुँचने का दूसरा मार्ग वह है कि अपनी पैदाइश कायनात (ब्रह्माण्ड) की निशानियों और सुबूतों पर सोच-विचार करके इसके सत्य व असत्य होने के बारे में अपना मत प्रकट करे। धार्मिक व पौराणिक किताबों, वेद और बाइबल से मालूम होता है कि मौत के बाद जीवन है।  स्वर्ग और नरक एक हक़ीक़त है।

मुहम्मद जैनुल आबिदीन मन्सूरी


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