खुशहाली के दावों में दाग की तरह है भूख-कुपोषण: राजेश सिरोठिया

खुशहाली के दावों में दाग की तरह है भूख-कुपोषण

राजेश सिरोठिया
RAJESH SIROTHIYAविकसित और आगे बड़ती दुनिया के के चमकदार कालीन में कुपोषण और भुखमरी ऐसे दाग हैं जो तमाम दावों तथा तथ्य कथ्य प्रयासों के बाद भी नहीं मिट रहे हैं। इन पर केंद्रित वैश्विक रिपोर्ट चौंकाने वाली होती हैं। इनसे पता चलता है कि दुनिया में कुपोषितों का आंकड़ा कितना और बड़ा। चितांजनक यह है कि तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कुपोषितों और भुखमरी का सामना करने वालों का आंकड़ा पिछली बार के मुकाबले बड़ा हुआ ही निकलता है। 

एक बड़ा सवाल यह भी निकलता है कि जिन लक्ष्यों को लेकर दुनिया के देश सामूहिक तौर पर या अपने प्रयासों के दावे करते रहे, उनमें कामयाबी कितनी मिली।दरअसल कुपोषण, गरीबी और भुखमरी में सीधा रिश्ता है। यह दो-चार देशों ही नहीं बल्कि दुनिया के बहुत बड़े भूभाग के लिए चुनौती है। 

लगभग आधी आबादी इन समस्याओं से जूझ रही है। इसलिए यह सवाल तो उठेगा ही कि समस्याओं से जूझने वाले देश आखिर क्यों नहीं इनसे निपट पा रहे हैंड़ हाल में ऐसे ही एक अध्ययन में यह पता चला है कि दुनिया के तीन अरब लोग पौष्टिक भोजन से वंचित हैं। इतना जरूर है कि इतनी आबादी तो उस पौष्टिक खाद्य से दूर ही है जो एक मनुष्य को दुरुस्त रहने के लिए चाहिए। इनमें ज्यादातर लोग गरीब और विकासशील देशों के ही हैं। गरीब मुल्कों में भी अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और एशियाई क्षेत्र के देश ज्यादा हैं। 

poverty india
गरीबी की मार से लोग अपने खानपान की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाते शहरों में तो गरीब आबादी के लिए रोजाना दूध और आटा खरीदना भी भारी पड़ता है। राजनीतिक संघर्षों और गृहयुद्ध जैसे संकटों से जूझ रहे अफ्रीकी देशों से आने वाली तस्वीरें तो और डरावनी हैं। खाने के एक-एक पैकेट के लिए। हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है, पौष्टिक भोजन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। महंगाई के कारण मध्य और निम्न वर्ग के लोग अपने खानपान के खर्च में भारी कटौती के लिए मजबूर हैं। 

ऐसे में एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए निर्धारित मानकों वाले खाद्य पदार्थ उनकी पहुंच से दूर हो जाते हैं। ताजा समय में कोरोना महामारी के चलते इस मोर्चे पर हालात और दयनीय हुए हैं। यानि संकट से निपटने की चुनौती और बड़ी हो गई है। गरीब मुल्कों की मदद के लिए विश्व खाद्य कार्यक्रम को तेज करने की जरूरत है। 

विकासशील देशों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो गरीबी दूर कर सकें। उन देशों की सरकारों को अपना खाद्य तंत्र मजबूत बनाना पड़ेगा। सरकारें यदि ठान लें तो क्या यह काम मुश्किल हैड़ अक्सर सुनने में आता है कि अन्ना के भंडार भरे हुए हैं, या अन्ना रखे हुए सड़ गया है। तो क्या इसे उन लोगों के पेट तक नहीं पहुंचाया जा सकता जो दो वक्त की रोटी से भी दूर हैं। 

जाहिर है कि सवाल बहुत हैं और यह भी तथ्य है कि कोरोना काल में गरीबों की संख्या भी बढ़ी है, लोग उसी जीवनस्तर पर पहुंच गये हैं जिसे वे बमुश्किल छोड़कर ऊपर आ सके थे। हर सरकार की जिम्मेदारी है कि उसके नागरिक पेट भर सकें, इसके लिए व्यापक योजना पर दुनिया के सभी साधन संपन्ना देशों को मिलकर योजना बनानी चाहिए।

(लेखक दोपहर मेट्रो के चीफ एडिटर हैं)

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Priyam Mishra



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