गांधी चंदन थे तो राम उनमें बसी सुवास -दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

गांधी चंदन थे तो राम उनमें बसी सुवास -दिनेश मालवीय बीसवीं शताब्दी में भारत में अनेक महापुरुषों का अवतरण हुआ. इन सभी में एक बात आमतौर समान थी कि इनके जीवन पर श्रीमद्भगवत्गीता और रामचरित मानस तथा इन महान ग्रंथों के चरित्र नायकों का अत्यधिक प्रभाव रहा. युग पुरुष महात्मा गांधी ने इन दोनों ग्रंथों को अपने जीवन में बहुत गहराई से आत्मसात किया। महात्मा गांधी राजनीति में भले ही थे, लेकिन उन्हें गहराई से समझने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वह वास्तव में सत्यशोधक और मोक्षकामी थे. उन्होंने राजनीति को आध्यात्म से जोड़कर उसे जनकल्याण के साथ-साथ, अपनी आत्मशुद्धि का साधन बना लिया. उन्होंने बर्तानी सत्ता से संघर्ष के जो साधन अपनाये, वे ध्यात्म पर ही आधारित थे. इनमें सत्याग्रह सबसे प्रमुख था. महात्मा गांधी ने स्वयं लिखा है कि " मेरा चरम ध्येय आत्मा का मोक्ष है. मेरी देश-सेवा उसी मोक्ष की साधना है. पृथ्वी का नश्वर साम्राज्य प्राप्त करने की इच्छा मुझमें नहीं है. मुक्ति और शांति का जो शाश्वत लोक है, मैं उसी की ओर जाना चाहता हूं. मेरी देशभक्ति इस यात्रा का पड़ाव भर है. राजनीति को मैं धर्म से रहित नहीं मानता. जो राजनीति धर्म से रहित है, वह यमराज का फंदा है, क्योंकि उससे आत्मा का हनन होता है.' धर्म से उनका तात्पर्य धर्म ही था.  रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग ने कहा कि “गांधी इतिहास के संभवत: ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने ईसा की प्रेमधारणा को व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों से उठाकर बड़े पैमाने पर एक प्रभावकारी सामाजिक शक्ति बना दिया. उनके लिए प्रेम समाज और समूह के परिवर्तन का सक्षम अस्त्र था. प्रेम और अहिंसा की उनकी धारणा में मुझे समाज-सुधार का वह उपाय दिखाई दे गया, जिसकी मैं वर्षों से तलाश कर रहा था. बेन्थम और मिल, मार्क्स और लेनिन और हाब्स, रूसो तथा नीत्से से मुझे जो संतोष प्राप्त नहीं हुआ, वह गांधी से प्राप्त हुआ. " महात्मा गांधी ने श्रीमद्भगवत गीता का गहन अनुशीलन एवं चिंतन किया. उसके ज्ञान को तात्विक रूप से अपने जीवन में उतारा. वह गीता से इतने ज्यादा प्रभावित थे कि उसे अपनी माँ और जीवन का संदर्भ-ग्रंथ कहते थे. इसका पारायण उनकी दिनचर्चा का अभिन्न अंग था. रामचरितमांस का भी उन्हें बहुत अध्ययन था और वह इससे बहुत प्रभावित रहे. उन्होंने श्रीराम को आदर्श माना. तुलसी ने रामचरितमानस में जिस जिम्मेदार और उत्तरदायी ज्ञानी राम-भक्त की परिकल्पना की थी, वह उसे भारत के आम लोगों में फलीभूत देखना चाहते थे. महात्मा गांधी को युगधर्म और युग संदर्भ की गहरी समझ थी. वह जानते थे कि इस युग में भारत के आम नागरिक के आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ही हो सकते हैं. श्रीकृष्ण की गीता को जीवन में उतार कर और श्रीराम के चरित्र को आदर्श मानकर उन्होंने त्रेता और द्वापर के समन्वय से वर्तमान युग के समक्ष आदर्श प्रसुतुत किया. इसके माध्यम से उन्होंने राजनीति को पवित्र किया. इस संबंध में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का कहना है कि 'गांधीजी से पहले के संतो और सुधारकों ने पुस्तकीय ज्ञान के बल पर अथवा अनुभवों के आधार पर जितनी भी अच्छी बातें कही थीं, गांधीजी ने उन सब पर आचरण करके मनुष्यता का चौंका दिया. उनके भीतर इस आशा को जागृत कर दिया कि दुर्बल से दुर्बल मनुष्य भी चाहे तो मानवता के चरम शिखर पर पहुंच सकता है. ज्ञानी संसार में बहुत हुये हैं. गांधी जी ने बताया कि मनुष्य की सार्थकता जानने में नहीं, करने में हैं. चाणक्य और मैकियावली जैसे पंडितों की राजनीति गांधीजी की नहीं है. चाणक्य और मैकियावली उस राजनीति के व्याख्यता हैं, जिसमें छल, प्रपंच, मिथ्याभाषण और दाव-पेंच, जैसे सभी दुर्गणों को गुण समझा जाता है.' महात्मा गांधी तुलसी के मानस में वर्णित राम राज्य से इतने प्रभावित थे कि वह इसे वर्तमान भारत में मूर्तरूप में देखना चाहते थे. एक जगह गांधी ने कहा है कि "मेरे सपनों का रामराज्य राजा और रंक दोनों को समान अधिकार सुनिश्चित करता है.' मानस में रामराज्य का जो वर्णन है उसका सारभूत तत्व यही है कि इसमें हर व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन के प्रति पूरी तरह सचेत, सजग और उत्साहित है. इसमें विषमता, द्वेष, कलह, कपट, अन्याय, अत्याचार, अनाचार बिल्कुल नहीं है. यह समता, प्रेम, एकता, निश्छलता, न्याय, सदाचार से परिपूर्ण है. साधन और साध्य की श्रेष्ठता गांधीवाद और रामराज्य दोनों का अभीष्ट है. महात्मा गांधी मानते थे कि मनुष्य में सुप्त दैविक संपदाओं को सत्यनिष्ठता की साधना से जगाकर उसे जीवन को सच्चे अर्थों में इसकी परिपूर्णता में जीने के योग्य बनाया जा सकता है. उसके माध्यम से वह देवत्व को प्राप्त हो सकता है. गांधीजी की दृष्टि में श्रीराम एक परम आध्यात्मिक सत्ता होने के साथ-साथ एक आदर्श पुरुष भी हैं. इसी कारण श्रीराम भारत के कोटि-कोटि जन के ह्मदय सम्राट हैं. देश भर में उनके लाखों मंदिर हैं और वह करोड़ों लोगों के आराध्य देव हैं. महान उर्दू शायर अल्लामा इकबाल तक ने श्रीराम को इमामे हिंद कहा है. वह भारतीय संस्कृति के प्राण हैं. कुछ लोग राम के अस्तित्व को ही नकारते हैं, तो कुछ उन्हें भगवान नहीं मानते, लेकिन कोई किसी भी धर्म को मानता हो अथवा धर्म को ही नहीं मानता हो, लेकिन उसे अपने देश के महान पूर्वजों के विषय में मर्यादा में रहकर बात करनी चाहिए. गांधी जी ने  एक जगह कहा है कि मेरे लिए रामराज्य का आदर्श सच्चा प्रजातंत्र है, जिसमें सबसे छोटे आदमी को भी त्वरित न्याय मिलने का पक्का भरोसा होता है. इस तरह गांधी और राम इस तरह से अभिन्न रूप से जुड़े हैं कि उन्हें एक दूसरे से अलग किया ही नहीं जा सकता. गांधी ने रामनाम और राम- भाव को चित्त में इतना गहरा उतार लिया था कि उनका रोम रोम इससे सिक्त था. कहते हैं कि व्यक्ति जिस भाव में जीवन भर रहता है, वही भाव अंतिम क्षण में उस पर प्रभावी रहता है. यही कारण था कि मृत्यु के समय गांधी के मुख से 'हे राम!" ही निकला। यही कहा जा सकता है कि गांधी का राम से वही संबंध है जो चंदन और सुवास का.