भारतीय समाज-आश्रम व्यवस्था का महत्व -2 (Importance of Ashram System-2)

भारतीय समाज-आश्रम व्यवस्था का महत्व -2 (Importance of Ashram System-2)

व्यक्तित्व का विकास (Development of personality) 

 उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि आश्रम व्यवस्था आयु के प्रत्येक कालखण्ड में प्रत्येक व्यक्ति को उसके अनुरूप विकास करने का अवसर प्रदान किया। अतः यह माना जा सकता है कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए जितना सुनियोजित प्रावधान आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत किया गया उतना इसके अभाव में सम्भव नहीं हो पाता। जीवन के प्रारंभिक काल से लेकर अंतिम समय तक समस्त प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करने, सुखोपभोग करने तथा समाज सेवा करने का अवसर प्रत्येक को आश्रम व्यवस्था के माध्यम से प्रदान किया गया। इस प्रकार आश्रम व्यवस्था ने व्यक्ति को जीवन भर सतत् अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अवसर प्रदान किया।

 जीवन को व्यवस्थित तौर-तरीका (Systematized way of Life) 

आश्रम व्यवस्था ने प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष भिन्न-भिन्न कालखण्डों में व्यक्ति के कर्त्तव्य, कार्य और अधिकारों को स्पष्टतः प्रस्तुत किया। व्यक्ति के समक्ष कभी भी इस सम्बन्ध में कोई दुविधा नहीं रही। अतः आश्रम व्यवस्था ने प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित कर सुगम जीवन-निर्वाह करने के तौर-तरीके प्रदान किए। 

 सामाजिक संगठन व एकता (Social organization & Solidarity)

आश्रम व्यवस्था के कारण जहाँ व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सका, वहीं वह समाज के साथ भी सक्रिय रूप से सम्बद्ध रहा। आश्रम व्यवस्था ने व्यक्ति को समुदाय और समाज के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इस प्रकार आश्रम व्यवस्था ने अतीत में समाज को संगठित रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

 सामाजिक कल्याण (Social Welfare)

आश्रम व्यवस्था को विकसित करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा गया कि इसके माध्यम से व्यक्ति, परिवार और समाज का कल्याण हो। विभिन्न आश्रमों के लिए निर्धारित कालावधि, प्रत्येक आश्रम में निर्धारित अधिकार, कर्तव्य, कमियों आदि पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि इस व्यवस्था के माध्यम से तत्कालीन समाज के प्रत्येक व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण का पूरा ध्यान रखा गया।

 सामाजिक स्थिरता सहायक (Helpful in Social stability) 

आश्रम-व्यवस्था के कारण वैयक्तिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी सुनिश्चितता, सुरक्षा और स्थिरता उत्पन्न हुई।

संस्कृतियों का निर्वाह (Transmission of culture) 

इस व्यवस्था ने संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित कर उसे सुरक्षित रखने और उसका संचार करने का उपयोगी कार्य किया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अतीत में आज के समान न तो संचार माध्यम थे, न ही प्रचार-प्रसार। इस प्रकार गुरुओं के माध्यम से और ब्रह्मचर्य आश्रम में उनके माध्यम से अवलोकन और अनुकरण के माध्यम से संस्कृति का प्रसार पीढ़ी-दर-पीढ़ी करना संभव हुआ। 

 सामाजिक संघर्ष और तनाव से मुक्ति (Helpful in avoiding social tensions and conflicts)

आश्रम व्यवस्था ने व्यक्ति को इतने सुनियोजित रूप से समाज के साथ संबद्ध किया कि वैयक्तिक तनावों तथा सामाजिक संघर्षों का अवसर ही नहीं आ रहा। इस प्रकार आश्रम-व्यवस्था तनाव तथा सामाजिक संघर्षों को रोकने में भी सहयोगी रही।

 सबके लिए उपयुक्त (Acceptable to all) 

आश्रम-व्यवस्था के चार सोपानों को विभिन्न आयु में होने वाले उतार-चढ़ावों के अनुकूल आध्यात्मिक और सांसारिक विकास हेतु विभाजित किया गया यही कारण है कि इसके प्रति न ब्रह्मचारी में आक्रोश रहा न गृहस्थ में और न ही वानप्रस्थी में।


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