होली के त्योहार का महत्व- वास्तुशास्त्र…….होली का महत्व

होली के त्योहार का महत्व- वास्तुशास्त्र……….होली का महत्व

वास्तुशास्त्र के अनुसार होलिका दहन किसी नगर, शहर या मोहल्ले के दक्षिण-पूर्व (South-East) में किया जाना चाहिए। यदि आप होलिका पूजन अपने घर में कर रहे हैं तो उसे अपने पूजा स्थान में करने की बजाय किसी खुले आंगन या खुले स्थान में करें। अगर आपके घर के सेंटर यानी ब्रह्म स्थान में चौक आदि बना हुआ है तो आप वहां पर भी होलिका पूजन कर सकते हैं। हालांकि होलिका दहन घर के भीतर नहीं करना चाहिए।




बहुत से लोग अपने घरों की छतों पर ध्वजा या झंडा लगाते हैं। आमतौर पर लोग साउथ वेस्ट को ऊंचा करने के लिए ऐसा लगाते हैं। अगर आपके घर की ध्वजा पुरानी हो गई है या उसका रंग फेड हो गया है तो होली का दिन इस ध्वजा को बदलने के लिए काफी अच्छा रहता है।




होली का त्योहार आपस में खुशियां व मस्ती बांटने का उत्सव है। इसलिए इस त्योहार को मनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आपके द्वारा की गई मस्ती दूसरे के लिए दुख या परेशानी का सबब न बन जाए। खासतौर पर, इस त्योहार में केमिकल्स युक्त या हानिकारक रंगों का प्रयोग करने की बजाय नेचुरल व हर्बल कलर्स, फूल आदि का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त रंगों का चयन करते समय भी वास्तु की पॉजिटिव दिशा यानी पूर्व व उत्तर दिशा से मिलते जुलते रंगों का ही प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, उत्तर पूर्व यानी गुरू के स्थान के लिए पीला रंग अच्छा व सकारात्मक होता है। यह सुख और समृद्धि को दर्शाता है। वहीं ऑरेंज कलर पूर्व दिशा के मध्य का रंग है, यह सूर्य का प्रतीक है। इसी तरह लाल रंग अग्नि देवता व साउथ ईस्ट का कलर है। यह ऊर्जा को दर्शाता है। वहीं उत्तर दिशा बुध का स्थान है। बुध का रंग हरा होता है, जिसका प्रयोग होली में किया जा सकता है। यह प्रकृति को दर्शाता है। वहीं नकारात्मक दिशा जैसे साउथ वेस्ट के कलर्स जैसे भूरे व पश्चिम दिशा शनि का स्थान है और इसका रंग काला है, इनका प्रयोग बिल्कुल भी न करें।

Priyam Mishra



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