भगवत्प्राप्ति में भाव का महत्व

भगवत्प्राप्ति में भाव का महत्व

मनुष्य-जीवन का परम लक्ष्य है भगवत प्राप्ति. लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान को भक्तों की बहुत चिंता रहती है. भक्तों की रक्षा के लिए वे नंगे पांव दौड़े चले आते हैं. परंतु, अक्सर लोगों को यह शिकायत भी रहती है कि उनके जप, पूजा, दान आदि का उन्हें कोई फल प्राप्त नहीं होता. उनका दुःख-दर्द बना रहता है और भगवान उनकी सुधि ही नहीं लेते. प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या शास्त्रों की बात झूठी है. यदि नहीं, तो आखिर भगवान पुकारने पर भी सुधि क्यों नहीं लेते?

इसलिए सब साधन- योग, तप, ध्यान आदि में महत्वपूर्ण है “भाव”

इसका एकमात्र कारण है- भाव की बुद्धि. देखा जाये तो आज किया जाने वाला जप, पूजा, दान आदि बहुत सतही हो गया है. वर्तमान में मनुष्य द्वारा किये गये धार्मिक कार्यों में दिखावे की प्रवृत्ति अधिक रहती है. आज का मनुष्य भगवान से ज्यादा संसार को दिखाना चाहता है कि वह कितना बड़ा दानी एवं पूजा-पाठी व्यक्ति है. ऐसी दशा में यह कैसे संभव है कि इन दिखावटी कर्मों से भगवान प्रसन्न हो जायें.

कहा जाता है कि परमात्मा भाव का भूखे होते हैं, भावपूर्ण तरीके से अर्पित की गयी कोई भी वस्तु भगवान बड़े प्रेम से स्वीकार करते हैं. और, बिना भाव एवं श्रद्धा के हजारों-करोड़ों की धन-संपत्ति भी उन्हें लुभा नहीं सकती. भगवान श्रीकृष्ण के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने दुर्योधन के छप्पन प्रकार के राजभोग भी त्याग कर विदुर के घर सूखा साग खाया. क्योंकि, दुर्योधन के यहां का भोजन दिखावे एवं अहंकार से युक्त था और विदुर का भोजन भाव एवं श्रद्धा से. गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

अर्थात् ‘जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पित करता है, उसे मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रेम सहित खाता हूं.’ स्पष्ट है कि यहां भगवान ने किसी प्रकार के विधि-विधान का नाम नहीं लिया है. उन्होंने यहां मात्र ‘प्रेमपूर्वक’ कहा. भाव की आवश्यकता मात्र भगवान के प्रति ही नहीं, वरन् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है. घर में आये मेहमान को आफत समझ कर मन-ही-मन कुढ़ते हुए आदर-सत्कार करना सर्वथा गलत है. इससे कर्तव्य-कर्म तो पूरा हो जाता है, परंतु फल में कमी आ जाती है. कारण यही है कि भाव सही नहीं था. ऐसी दशा में कल्याण होना संभव ही नहीं है. अपने-पराये का भेद विषमता का विष उत्पन्न करता है. इसका मूल है स्वार्थ का होना. जब व्यक्ति सदैव अपने ही हित और लाभ की बात सोचता है तब विषमता का जहर उत्पन्न होता है और इससे न केवल उसका भाव दूषित होता है, बल्कि काम, क्रोध, लोभ आदि जैसे दोष भी मन को दूषित कर देते हैं. सब परमात्मा के ही रूप हैं, मन में यह भावना आते ही बहुत थोड़े समय में परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है. यही ईश्वर-प्राप्ति का सरलतम तरीका है. गीता में भगवान ने कहा है

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

अर्थात् जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है. ईश्वर-प्राप्ति के लिए कोई भी मार्ग अपनाया जाये, परंतु सभी मार्गों के लिए ‘भाव शुद्धि’ अत्यधिक आवश्यक है. मान, बड़ाई, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ आदि मलिन भावों से रहित होना ही भावसंशुद्धि है. इसके बगैर हजारों जन्मों तक भी ईश्वर को पुकारा जाये, वे नहीं सुनते. यदि भाव शुद्ध और पवित्र हो जाये तो जीव एवं ईश्वर में भला क्या दूरी है?


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