इन छह बातों को रखें गुप्त -दिनेश मालवीय

इन छह बातों को रखें गुप्त

-दिनेश मालवीय

हमारे पूर्वजों ने जीवन के व्यवहारिक अनुभवों की आधार पर कुछ ऎसी सीखें दी हैं, जिनका पालन करना हमेशा लाभदायक होता है. उन्होंने छह बातों को गुप्त रखने की सीख दी है. आइये समझते हैं, ये छह बातें क्या हैं और इनका क्या महत्त्व है.

बुजुर्गों ने अपना धन,जमा पूँजी या आमदनी, घर का भेद, मंत्र, तप, दान और अपमान को गुप्त रखे जाने की सीख दी है. इन्हें उजागर करने से नुकसान ही नुकसान है.

अपना धन, जमापूंजी या आमदनी को गुप्त रखने की सलाह इसलिए दी गयी है कि इसके चोरी हो जाने का ख़तरा बढ़ जाता है. कोई इस बात को माने या न माने लेकिन यह सही है कि नज़र भी लग जाती है. यदि आपके पास बहुत धन-संपदा है तो उसे जहाँ-तहाँ उजागर नहीं करना चाहिए. आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएँगे जो ज़रा-सा भी मौका मिलते ही अपनी समृद्धि का बखान करने लगते हैं. इसके कारण उन्हें किसी दिन नुकसान हो सकता है. उपरोक्त खतरों के अलावा कोई भी आपसे कुछ बहाना बनाकर बेमतलब मदद माँग सकता है या उधार के नाम पर कुछ लेकर कभी वापस नहीं कर सकता है.

घर का कोई ऐसा भेद किसी को भी नहीं बताना चाहिए, जिससे कोई उसका बेजा फायदा उठा सके. हर एक घर-परिवार में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें दूसरों को बताना उचित नहीं है. यदि घर के सदस्यों में किसी बात पर आपसी मन-मुटाव या रस्साकशी चल रही हो और आप उसे बाहर दूसरों को बताएँगे तो इससे आपके घर की बदनामी तो होगी ही, साथ ही ऐसे लोग भी कम नहीं जो इसे बढ़ाने के लिए लगाई-बुझाई करना  शुरू करने में देर नहीं करेंगे. लिहाजा घर का भेद भी किसी को नहीं बताना चाहिए.

मंत्र को हमेशा गुप्त रखना चाहिए, तभी वह फलदायी होता है. इसीलिए गुरुजन मंत्र हमेशा कान में फूँकते हैं. मंत्र का एक मतलब मंत्रणा भी होता है. यदि किसी शुभचिंतक ने आपको कोई मंत्रणा दी हो तो उसे भी गुप्त रखना चाहिए. इससे आपकी और उसकी भी विश्वसनीयता बनी रहती है. मंत्र को गुप्त रखने से ही उसका प्रभाव कायम रहता है.

तप अनेक तरह के होते हैं. जंगल में जाकर आँख बंद करके ही तप नहीं किया जाता. अनेक तरह के तप होते हैं. जैसे वाणी का तप करने वाले कभी झूठ नहीं बोलते और अनावश्यक बात भी नहीं करते. किसी की निंदा तो सपने में भी नहीं करते. ऐस करने वालों को जीवन में बहुत लाभ होता है. मान लीजिये, आप झूठ नहीं बोलते, लेकिन यदि आप यह कहते फिरें की मै झूठ नहीं बोलता, तो आपका तप निष्फल हो जाता है. आप कहें कि मुझे तो फालतू बात करने की आदत नहीं है, तो यह अपने आप में फालतू बात है. आप किसी की निंदा नहीं करते और कहते हैं कि मैं तो किसी की निंदा नहीं करता, तो इससे आपकी इस तपस्या का कोई अर्थ नहीं रह जाता. इससे आपका अहंकार बढ़ता है जो हमारा सबसे पड़ा शत्रु है.

दान करके अधिकतर लोगों को अहंकार हो जाता है. दान देकर उसे पचाना बहुत कठिन काम है. इस सम्बन्ध में हमारे बुजुर्गों और संतों ने बहुत सावधान रहने की सीख दी है. पहली बात तो दान बहुत गुप्त रूप से करना चाहिए और करने के बाद भूले से भी कभी उसे अपने मुँह पर नहीं लाना चाहिए. यह बात सुनने-पढ़ने में भले ही बहुत सहज लगे, लेकिन व्यवहार में यह बहुत कठिन है. संतों ने कहा है कि दान हमेशा नीची नज़र करके देना चाहिए ताकि दान पाने वाले की आँखों में हीनता का भाव न आये. उसे ऐसा अहसास नहीं होने देना चाहिए कि आप उस पर कोई अहसान कर रहे हैं.

इस संदर्भ में रहीम का एक दोहा सहज ही याद हो आताहै-

देनहार कोऊ और है ,भेजत सो दिन रेन

लोग भरमहम पे धरें याते नीचे नैन.

स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि यदि आप किसी को दानदेते हैं, तो उसका अहसान मानिए कि उसने आपको यह परम पुण्य करने का अवसर दिया. भगवान का भी आभार मानिए कि उसने आप को किसी को दान देने लायक बनाया है.

अब रही बात अपमान की तो जीवन में कभी न कभी हर किसी का कहीं अपमान हो ही जाता है. उस अपमान को गुप्त रखने की बात कही गयी है. इसका पहला कारण यह है कि आप जिसे बता रहे हैं, वह इसे सहानुभूति जताते हुए सुन तो लेगा, लेकिन पचास और लोगों को नामक-मिर्च लगाकर बताएगा. इससे आपका समाज में और नाम ख़राब होगा. दूसरी बात यह कि अपमान की टीस को जीवन भर भुलाना मुश्किल होता है. जब आप अपने अपमान की बात किसी को बताते हैं तो यह टीस और गहरी होती जाती है. आप में अपमान करने वाले से बदला लेने का भाव बढ़ता है, जो आपमें नकारात्मकता पैदा करता है.

बुजुर्गों की इन छह सीखों को गंभीरता से समझकर उन्हें व्यवहार में लाने की कोशिश कीजिए, इसके फायदे आप स्वयं महसूस करेंगे.

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