महाभारत में युधिष्ठिर ने दिया 100+5=105  का महामंत्र, आज भारत को इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत.. दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

भारत एक ऐसा सौभाग्यशाली देश है, जिसके पास “रामायण” और “महाभारत” जैसे साहित्य के दो महारत्न हैं. इनमें हमारी प्राचीन....

महाभारत में युधिष्ठिर ने दिया 100+5=105  का महामंत्र, आज भारत को इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत.. दिनेश मालवीय भारत एक ऐसा सौभाग्यशाली देश है, जिसके पास “रामायण” और “महाभारत” जैसे साहित्य के दो महारत्न हैं. इनमें हमारी प्राचीन संस्कृति, इतिहास, आदर्श और व्यवहार का ऐसा ज्ञान निहित है, जो हमेशा प्रासंगिक रहा और हमेशा रहेगा. महाभारत में बहुत जटिल और पेचीदा परिस्थितियों में धर्म का निर्वाह कैसे किया जाता है, यह बताया गया है. साथ ही धर्म के सूक्ष्म रूप को बहुत रोचक तरीके से समझाया गया है. आज भारत में धर्म, जाति, वर्ग और अन्य मुद्दों के लेकर जिस तरह बिखराव आ रहा है, उसे रोकने के लिए उसमें महाभारत बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है. महाभारत का वनपर्व बहुत महत्वपूर्ण है. इसमें अन्य अनेक बातों के साथ सामाजिक-राष्ट्रीय हित का एक बहुत बड़ा महामंत्र दिया गया है. गणित की भाषा में हम इसे 100+5=105  यानी वन हंड्रेड प्लस फाइव इजीक्लटू वन ज़ीरो फाइव कह सकते हैं. जैसा कि हम जानते हैं कि, दुर्योधन एक बिगड़ा हुआ, ईर्ष्यालु, घमंडी और अनेक बुराइयों का पुतला था. इसमें कोढ़ में खाज जैसी स्थिति यह बन गयी कि, उसे मामा शकुनी, दु:शासन और कर्ण जैसे लोगों का साथ मिल गया. इसके कारण उसका  विवेक पूरी तरह नष्ट हो गया. छलपूर्वक जुआ खेलकर दुर्योधन ने पाण्डवों का राजपाट हड़प लिया और उन्हें बारह वर्ष तक वनवास भेज दिया. उसे इससे भी संतुष्टि नहीं हुई. उसके साथी तो उसे गलत कामों के लिए भड़काते ही रहते थे. उन्होंने उसे बहकाकर इस बात के लिए राजी कर लिया कि, वन में रहने वाले पाण्डवों को जाकर सताया जाए. उनकी बुरी हालत पर जश्न मनाया जाये और अपनी समृद्धि दिखाकर उनके मन में हीनभावना पैदा की जाए. उन्होंने किसी तरह राजा धृतराष्ट्र से भी आज्ञा प्राप्त कर ली. दुर्योधन, मामा शकुनी, कर्ण, दु:शासन और एक बहुत बड़ी  सेना के साथ द्वेत वन में गया जहाँ, पाण्डव बहुत कष्टपूर्वक वनवास काट रहे थे. उसने पाण्डवों की कुटियों के पास ही अपना शिविर लगाकर क्रीड़ामंडप तैयार करवा लिया.  लिया. इस बीच दुर्योधन के सेनानायक द्वेत वन के सरोवर के किनारे गए. वहां गन्धर्वराज चित्रसेन पहले से ही अपने सेवकों के साथ आये थे. वह वहां अप्सराओं के साथ विहार कर रहे  थे. दुर्योधन के सेनानायकों ने उसे सरोवर के पास चित्रसेन के होने की बात बतायी. दुर्योधन ने निर्देश दिया कि, गन्धर्वों को मार भगाओ. जब दुर्योधन के सेनानायकों ने चित्रसेन से वहाँ से जाने को कहा तो चित्रसेन ने मना कर दिया. सेनानायक जब दुर्योधन के पास गये और पूरी बात बतायी तो दुर्योधन गुस्से में लाल-पीला हो गया. उसने चित्रसेन को बलपूर्वक  हटाने का आदेश दिया. गन्धर्वों और कौरव सेना के भीच बहुत भीषण युद्ध हुआ. गन्धर्वों  ने उन्हें ऎसी मार लगायी कि, दुर्योधन के देखते-देखते सारे कौरव सैनिक भागने लगे. धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भी भाग गये. अकेले कर्ण ने गंधर्वों काफी लोहा लिया, लेकिन उनके वाणों की वर्षा सहन नहीं पाया और वह भी भाग खडा हुआ. गंधर्वों ने दुर्योधन को भी पराजित कर उसे बंदी  बना लिया.  उन्होंने दुर्योधन के साथ आई स्त्रियों को भी अपने अधिकार में ले लिया. वे उन्हें अपने साथ ले जाने लगे, तब ही दुर्योधन के कुछ सैनिक पाण्डवों के शिविर में गए. सारी बात बताकर उन्होंने दुर्योधन और कौरव कुल की स्त्रियों को बचाने की पाण्डवों से प्रार्थना की. महा गुस्सेल भीमसेन ने कहा कि, जो काम हमें युद्ध में करना था, उसे गंधर्वों ने पूरा कर दिया है. भीमसेन ने कहा कि, दुर्योधन का अपनी सेना के साथ यहाँ आना हम पाँचों भाइयों को मार डालने का ही षडयंत्र था. उसके साथ यही होना था. हम उसकी मदद क्यों करें. अब  हम आपको  बताते हैं कि, युधिष्ठिर को धर्मराज और बहुत महान क्यों कहा जाता है. युधिष्ठिर ने कहा कि, भाई-बंधुओं में लड़ाई-झगड़े होते ही रहते हैं. कभी-कभी बहुत दुश्मनी भी हो जाती है. लेकिन इससे कुल का धर्म यानी अपनापन नष्ट नहीं होता. युधिष्ठिर ने कहा कि, आपस में विरोध होने पर ही हम पाँच और कौरव सौ भाई अलग हैं. लेकिन चित्रसेन द्वारा दुर्योधन और कुरुकुल की स्त्रियों को बलपूर्वक पकड़ने पर हमारा कुलधर्म नष्ट हो  रहा है. ऐसे स्थिति में हम एक सौ पांच हैं. युधिष्टिर ने अर्जुन और भीमसेन को आदेश दिया कि, चित्रसेन से दुर्योधन और कुरुकुल की स्त्रियों को मुक्त करवाओ. इन महावीर भाइयों ने  उनकी रक्षा की. अर्जन ने चित्रसेन को परास्त कर दिया. अर्जुन ने कहा कि  हमारे भाई और हमारे कुल की स्त्रियों को मुक्त कर दो. चित्रसेन के ऐसा करने पर चित्रसेन अर्जन का मित्र और शिष्य बन गया. यह होता है कुल धर्म और राष्ट्रधर्म. युधिष्ठिर चाहते तो दुर्योधन की मदद नहीं करते. उन्हें तो बिना लड़ाई किये ही अब कुछ  मिल  सकता था. चित्रसेन दुर्योधन की ह्त्या कर देता और सारी झंझट की जड़ ही समाप्त हो जाती. लेकिन युधिष्टिर को धर्मराज वैसे ही थोड़ी कहा जाता है. उन्होंने ऐसा कर के सम्पूर्ण भारतवासियों को सन्देश दिया कि, घर्म में भले ही आपस में लड़ लो, लेकिन बाहरी दुश्मन यदि परिवार और राष्ट्र पर आक्रमण करे तो सब एक हो जाओ.  आज हमारे देश को इस सन्देश को पूरी तरह  आत्मसात करने की ज़रुरत है. देश में हज़ारों जातियां है, अनेक वर्ग और धर्म हैं. लेकिन हमारा सबसे पहला धर्म राष्ट्रधर्म है.