सुरताओं का अवतरण : सृष्टि तीन प्रकार की है तथा तीन स्तरों (ठिकानों) से उतरी हैं

सुरताओं का अवतरण : सृष्टि तीन प्रकार की है तथा तीन स्तरों (ठिकानों) से उतरी हैं
सुरताओं का अवतरण

"सुरता तीनों ठौर की, इत आई देह धर।

ए तीनो आए नासूत में, किया बेवरा इमामे आखर।। "

महामति प्राणनाथ जी कहते हैं कि सृष्टि तीन प्रकार की है तथा तीन स्तरों(ठिकानों) से उतरी हैं। शास्त्रों में भी इन तीन प्रकार की सृष्टि तथा उनके ठिकानों से उतरी आत्माओं का स्पष्ट उल्लेख है।

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इनके तीन ठिकाने हैं- परम धाम, अक्षर धाम और बैकुंठ धाम। इन्हीं तीन ठिकानों से ये सुरताएँ (आत्मा) इस नश्वर संसार में मानव में प्रविष्ट या अवतरित हुई हैं। बैकुंठ धाम से उतरी सुरता को जीव सृष्टि, अक्षर धाम से उतरी सुरता को ईश्वरी सृष्टि तथा परम धाम से उतरी सुरता को ब्रह्म सृष्टि कहते हैं।

इन तीनों प्रकार की सृष्टियों की प्रवृत्ति, स्वभाव और शरीर अलग-अलग होते हैं। अक्षरधाम से उतरने वाली सुरताएँ तथा परमधाम से उतरने वाली सुरताएँ दृष्टा आत्मा होती हैं। परंतु बैकुंठ धाम से उतरने वाली सुरताएँ नश्वर तथा दृश्य होने के कारण अनात्मा कही जाती है।

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संसार के साधारण लोगों का स्वभाव मोह, अहंकार से पूर्ण होता है क्योंकि इनकी उत्पत्ति मोह एवं अहंकार से ही हुई है। वे स्वप्न, सुषुप्ति, जाग्रत इन तीनों अवस्थाओं में ही पड़ी रहती हैं। इसलिए यह नश्वर ब्रह्मांड से ऊपर नहीं उठ पाती हैं। जीव सृष्टि की पहचान यही है।

जीव सृष्टि सपने के जीव कहे जाते हैं। यह शून्य(नींद) के पार कभी नहीं जाते हैं। ईश्वरी सृष्टि की सूरत शून्य को पार कर अक्षरधाम में पहुंच जाती है। संसारी जीव जागते हैं तो दुनिया के कामों में लगे रहते हैं। सोते हैं तो मन में संसार का ही सपना संजो लेते हैं। नींद में भी संसार का सपना ही देखते हैं। जीव सृष्टि का जीवन यहीं तक सीमित है।

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परमात्मा की कृपा कर्मों के ऊपर आधारित होती है और कृपा के अनुसार मानव कर्म करता है। कृपा और कर्म दोनों अंकुर आत्मा के संबंध के अनुसार होते हैं। चेतना के जिस स्तर से आत्मा जुड़ी होती है उसके लिए कृपा का अवतरण भी वहीं से होता है। कृपा कितनी होती है उसकी गणना नहीं होती अर्थात् कृपा तो प्रत्येक समय पर होती रहती है पात्र योग्य चाहिए।

तीनों-सृष्टि के कर्म और स्वभाव से उनकी गति जानी जाती है। कर्म छिपे नहीं रहते उनसे ही उनके अंकुर तथा उद्गम स्थल का निर्णय होता है। जहां से वे अंकुरित होती हैं कृपा भी वहीं से उतरती है। जो दृष्टा सुरता (आत्मा) होती हैं वे इस संसार में जिस मनोरथ के लिए आई है, उसे पूरा करके अपने धाम में पुनः लौट जाती हैं। इन सुरताओं को कर्म लागू नहीं है और ये गर्भ मे भी नहीं जाती है तथा आवागमन में नहीं रहती हैं।

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जो जीव सृष्टि है वे आवागमन में रहती हैं और अपने प्रारब्ध कर्म को भोगकर अपने धाम को लौट जाती है। ये दृश्य जीव है जो अंधकार(नींद) से उत्पन्न हुए हैं तथा कभी परमात्मा से नहीं मिल सकते हैं।

प्रणाम जी,

बजरंग लाल शर्मा

EDITOR DESK



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