India is a vast toilet.’फूहड़ टिप्पणियों से शर्मशार होना पड़ेगा ?

फूहड़ टिप्पणियों से शर्मशार होना पड़ेगा

Toilet_00रेलवे लाइनों के किनारे प्रात:काल शौच के लिए बैठे लोगों को देखकर एक विदेशी यात्री ने अपनी डायरी में लिखा था... 'India is a vast toilet.'| क्या उस यात्री की टिप्पणी सही है? इस रूप में देश को ले जाने वाला कौन है? क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था इसकी दोषी नही है? इतिहास बताता है कि इस देश की रक्षा का भार क्षत्रियों पर था। शेष नागरिक देश-रक्षा के दायित्व से मुक्त रहे| बार-बार विदेशी हमले हुए। आपसी वैमनस्य के कारण समस्त रियासतों द्वारा विदेशी हमलावरों का संगठित मुकाबला नहीं किया गया| परिणाम देश की गुलामी का काल बढ़ता चला गया| वैसा ही मामला सफ़ाई का है| आज भी आम भारतीयों की पाकशालाएं चमचमातीं हैं किन्तु शौंचालय में दम घुटने लगता है। दोनों स्थानों की स्वच्छता में जमीन आसमान का अंतर होता है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में सफ़ाई का काम करना एक जाति विशेष का दायित्व समझ लिया गया। सिर पर मैला ढोने की प्रथा दशकों तक आरोपित रही। गंदगी करने वाला व्यक्ति सफाई के लिए दूसरे की ओर निहारता है| सफ़ाई कर्मियों के श्रम का मूल्यांकन ऐसा नहीं हुआ कि दूसरे लोग इस पेशे की ओर आकर्षित होकर अपनाते और गर्व का अनुभव करते। स्वच्छता बुनियादी जरूरत है। गाँधी जी ने सफाई के महत्व को समझा था। उन्होने अपना शौचालय खुद साफ़ करने की पहल की थी। आजादी के साथ ही इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विद्यालयों में शौचालयों न होने की बात कही है। अनेक कार्यालयों में सफाई व्यवस्था अस्थाई है जबकि वहाँ का कार्य स्थाई प्रकृति का है। यह विडंबना है कि देश के राजनेताओं और नौकरशाहों ने सफ़ाई को जीवन का अनिवार्य विषय नहीं माना हैं। स्वच्छता चाहे शरीर की हो, घर की हो अथवा सार्वजनिक जीवन की जबतक जीवन के लिए अनिवार्य नहीं माना जाएगा। हम भारतीयों को ऐसी फूहड़ टिप्पणियों से शर्मशार होना पड़ेगा।

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आफिस में स्वीपर लगा, टमप्रेरी सरवेंट।
बदबू जो फैला रहे, वे सब….परमानेंट॥
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डॉ० डंडा लखनवी

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