भारत जहां मातृ देव है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

भारत जहां मातृ देव है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

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मातृदेवो भव

नारी मातृदेवता है l भारतीय संस्कृति उसको माता के रूप में उपस्थित कर इस रहस्य का उद्घाटन किया है कि वह मानव कामोपभोग की सामग्री न होकर उसकी वन्दनीय एवं पूजनीया है l इसी नाते मानवधर्मशास्त्र में जननी का गौरव उपाध्याय से दस लाख गुना, आचार्य से लाखगुना तथा पिता से हजारगुना बढ़कर बताया गया है l गर्भधारण के समय से लेकर गुरुकुल भेजने के समय तक पुत्र का पालन-पोषण करते हुए वह अपना जैसा परिचय देती है, उससे यही प्रमाणित होता है कि नारी का स्त्रीत्व मातृत्व ही है l
नारी अंक – गीताप्रेस. गौरखपुर
मातृदेव नारी मातृदेवता है। भारतीय संस्कृति ने उसको माताके रूपमें उपस्थितकर इस रहस्यका उद्घाटन किया है कि वह मानव के कामोपभोग की सामग्री न होकर उसकी वन्दनीया एवं पूजनीया है।इसी नाते मानव धर्मशास्त्र (२।१४५)-में जननी का गौरव उपाध्याय से दस लाख गुना, आचार्य से लाख गुना तथा पिता से हजार गुना बढ़कर बताया गया है।गर्भधारण के समय से लेकर गुरुकुल भेजने के समय तक पुत्र का पालन पोषण करते हुए वह अपना जैसा परिचय देती है, उससे यही प्रमाणित होता है कि नारी का स्त्रीत्व मातृत्व ही है।

सन्तान चाहे पुत्र निकल जाय, परंतु जन्मदात्री माता कभी कुमाता नहीं बन पाती-'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।'

उसका स्नेह और वात्सल्य अपनी सन्तानतक ही सीमित नहीं रहता।द्वार पर भिक्षा के लिये आये हुए गुरुकुल वासी ब्रह्मचर्य को उनकी माताओं के सदृश सप्रेम भिक्षा देकर वह उनको 'मातृवत् परदारेषु' अर्थात् परायी स्त्री को माता समझने का पाठ पढ़ाती है और इस प्रकार प्रत्यक्ष में समाज की जननी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त करती है।कुदृष्टि युक्त कोई पुरुष उसके पातिव्रत्य तेज के समक्ष नहीं ठहर पाता और उसके मातृत्व।के प्रति श्रद्धावनत होने के लिये बाध्य होता है।नारी को यह मातृत्व पुरुष के साथ समानता के सिद्धान्तानुसार किये गये किसी बँटवारे में नहीं मिला।

यदि ऐसा होता तो वह वन्दनीया न हो पाती।शास्त्रीय दृष्टि में उसका यह मातृत्व दयामयी जगत माता का प्रसाद है, जिनका रूप कहलाने का गौरव सारे नारी समाज को प्राप्त हुआ है। विष्णु पुराण की सूक्ति है देवतिर्यङ् मनुष्येषु पूर्णिमा भगवान् हरिः।

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स्त्री नाम्नी श्रीश्च विज्ञेया इसका आशय यह निकलता है कि सामान्य रूप में देव समाज, तिर्यक्योनि तथा मानव समाज के पुरातत्व में भगवान विष्णु की अभिव्यक्ति है और स्त्रीत्व में लक्ष्मी की। इसके अतिरिक्त जिन महिलाओं ने राष्ट्र का संरक्षण किया है तथा त्याग, तपस्या, सात्त्विकता, सेवा, भगवद्भक्ति आदि के द्वारा इतिहास के पृष्ठों को अलंकृत करते हुए आदर्श स्थापित किया है, वे जगत माता की विशिष्ट विभूतियाँ हैं।

इस मर्म को न समझकर पार्चात्त्य शिक्षा से प्रभावित लोग धर्म शास्त्रों के उन वचनों की दुहाई देकर, जिनमें नारी के जीवन का भार क्रमशः पिता, पति और पुत्र पर डाला गया है,यह भ्रम फैलाने का दुस्साहस होता है कि हिंदुओं ने नारी के अधिकारों की हत्या की है। वस्तु स्थिति इसके सर्वथा विपरीत है।

पाश्चात्त्य सभ्यता ने आदिम मनुष्य के एक अंग से नारी की उत्पत्ति की कल्पना की और अपने व्यवहार से उसको मनुष्य के सुखोपभोगका यन्त्र बनने के लिये विवश कर अत्यन्त दुःखद अवस्थातक पहुँचा दिया है। इसके अनुकरण से आर्य जननी की भी दुर्दशा होगी।आवश्यकता इस बातकी है कि मानव समाज नारी समाज के समादर एवं संरक्षण करे। महर्षि याज्ञवल्क्य ने आज्ञा दी है भर्तृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरैः बन्धुभिश्च स्त्रियः पूज्या 'पति, भ्राता, पिता, कुटुम्बी, सास, ससुर, देवर, बन्धु-बान्धव-इस प्रकार स्त्री के सभी सम्बन्धियोंका कर्तव्य है कि वे उसका सभी प्रकार सम्मान करें।'

प्रत्येक मनुष्य के इस वैयक्तिक कर्तव्य का समर्थन करते हुए धर्मवाङ्मयने व्यष्टि-सृष्टिके अर्धभागसे पुरुष की और अर्ध भाग में नारी की उत्पत्ति प्रमाणितकर दाम्पत्य-जीवनमें पति-पत्नीकी एकात्मता स्थापित की है और पति को पत्नी व्रत तथा पत्नी को पतिव्रता रहनेका आदेश दिया है।

उत्तम पतिव्रता नारी केवल पति मात्रं को पुरुष मानती है-‘पति मात्रं पुरुषं मन्यमाना।’पति के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष उसकी दृष्टि में पुरुष ही नही है।भगवती श्रुति की घोषणा है-‘मातृदेवो भव’ अर्थात् मातृदेवता के भक्त बनो।इसी घोषणा में माताकी आराधना का विधान किया गया है। इसी का विराट एवं व्यापक रूप है नारी समाज की आराधना।अत: मानव समाज का कर्तव्य है कि वह माताकी आराधना करते हुए नारी समाज की आराधना करे।


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