ऐसे बचेगी भारतीय सनातन परंपरा : धर्म की रक्षा का सही तरीका

भागवतानंद

पशुओं के समान भोजन करके, प्रजनन और विलास करके और फेसबुक पर हिन्दू योद्धा बनकर धर्मरक्षा नहीं होती। धर्मरक्षा होती है उसे जीने से, धर्म को जीना ही उसे जीवित रखता है।

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सनातन के पुत्रों को तीन ही संसाधन बचा सकते हैं :- ज्ञान, धन एवं पराक्रम। पराक्रम से धन तो आ सकता है किंतु ज्ञान नहीं। धन से पराक्रम भी आ सकता है किंतु ज्ञान नहीं। इसीलिए बुद्धिमान और महत्वाकांक्षी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वप्रथम ज्ञानप्राप्ति का उपक्रम करे क्योंकि इससे धन और पराक्रम, दोनों प्राप्त किये जा सकते हैं।

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ज्ञान प्राप्ति के चार मुख्य स्रोत हैं :-

(१) संस्कार :- यह आपके वंश, शरीर, पूर्वजन्म के कर्म और नैसर्गिक प्रवृत्ति से प्राप्त होता है। तैरना मछली के संस्कार में होता है तो उड़ना पक्षी के संस्कार में। संस्कार के ही अभाव से मछली का उड़ना और पक्षी का मछली के समान तैरना नैसर्गिक रूप से अव्यावहारिक होता है।

(२) परिस्थिति :- यह आपके कार्यक्षेत्र, तपस्या, आकांक्षा और संघर्ष से निर्मित होता है। आपकी आवश्यकता के कारण आप जो परिस्थितियों के कारण अनुभव प्राप्त करते हैं, वह भी ज्ञानप्राप्ति का मुख्य स्रोत होता है।

(३) ग्रंथ :- नारद स्मृति के अनुसार लेखन और लिपिबद्ध साहित्य ब्रह्मा की ओर से मानवों के लिए सर्वोच्च उपहार है। विभिन्न माध्यमों से ज्ञान को चिरकाल तक सुरक्षित रखकर आगामी वंश को उसे निर्विवाद और प्रामाणिक रूप से सौंपने का सौभाग्य केवल ग्रंथात्मक प्रारूप से ही प्राप्त हो सकता है।

(४) गुरु :- समर्थ और योग्य गुरु की कृपा से दुर्लभ ग्रंथों का गूढ़ ज्ञान समझने में सुविधा होती है। भ्रम के जाल से निकलने में गुरु से बड़ा कोई सहयोगी नहीं होता। गुरु उस मार्ग की तरह हैं, जो स्वयं तो स्थिर और कूटस्थ हैं, किंतु अपने अनुसार चलने वाले को उसके लक्ष्य तक अवश्य पहुंचा देते हैं।

इन चारों स्रोतों में से एक का भी अभाव व्यक्ति को असहाय और असमर्थ बना देता है। साथ ही, यदि धर्मविरोधी संस्कार, परिस्थिति, ग्रंथ और गुरु मिल गए तो घोर पतन भी निश्चित है, अतएव इनके चयन में पर्याप्त सावधानी रखें।

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ज्ञान की भांति ही पराक्रम अथवा बल के भी चार मुख्य स्रोत होते हैं, जो इस प्रकार हैं :-

(१) कुटुम्ब :- जो व्यक्ति आपका रक्तसम्बन्धी हो (यथा मातापिता, पुत्रपुत्री, पतिपत्नी,भाईबहन समेत परिवार के सभी सदस्य), वह आपका प्राथमिक पराक्रम है। यदि उचित समय पर आपको इनका सहयोग और समर्थन मिल गया तो आप आधा युद्ध ऐसे ही जीत जाते हैं। और यदि उसमें महिला सदस्यों का सक्रिय समर्थन मिल गया तो आपके लिए संजीवनी का काम करेगा।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य लोगों को भी कुटुम्ब में ही गिना जाता है एवं उनके साथ भी बिल्कुल परिवार जैसा ही व्यवहार करना चाहिए, भले ही उनसे रक्तसम्बन्ध न हो। वे लोग निम्न परिस्थितियों से पहचाने जाते हैं :-

घर के मांगलिक विवाह, जन्मोत्सव आदि कार्यक्रमों में, अत्यधिक चिंता के समय में, अकाल पड़ने अथवा आजीविका नष्ट होने पर, शत्रुओं से घिर जाने पर, न्यायालय में मुकदमेबाजी होने पर, किसी की मृत्यु होने पर आदि स्थितियों में जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से आपके साथ सहयोग करने को खड़ा रहे, उसे भी कुटुम्ब ही मानना चाहिए।

(२) मित्र :- आमतौर पर (द्वितीय श्रेणी के कुटुम्ब को ही लोग मित्र समझते हैं, जबकि ऐसा हमेशा नहीं होता) जो व्यक्ति आपके प्रति न लोभ रखे और न आपसे भयभीत हो, अपितु भय और लोभ से परे होकर आपके लिए समयानुसार धर्मसम्मत हितकारी सलाह देता हो, वही मित्र है ऐसा जानना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो उसका स्थान चापलूस से अधिक नहीं। मित्रवर्ग आपके पराक्रम का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।

(३) कलेवर :- यदि व्यक्ति कुटुम्ब और मित्र से विहीन हो, अथवा परित्यक्त हो, अथवा ऐसी परिस्थिति में फंस गया हो जहां पर कुटुम्ब एवं मित्र का प्रयोग करना सम्भव नहीं, तो अपने कलेवर, अर्थात् शरीर पर विश्वास करके उससे अर्जित पराक्रम का प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए युद्धकला आदि का व्यावहारिक ज्ञान अथवा बलिष्ठ शरीर की आवश्यकता होती है।

(४) युक्ति :- यदि व्यक्ति का शरीर भी क्षीण हो, पर्याप्त रूप से बली न हो तो उसे अपने बौद्धिक पराक्रम और ज्ञान से अर्जित युक्ति एवं चातुर्य का ही प्रयोग करके अपनी रक्षा करनी चाहिए। बुद्धिर्यस्य बलं तस्य, इस उक्ति के अनुसार कार्य करना चाहिए।

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धन नामक संसाधन के मुख्य दो स्रोत हैं :- दिव्य तथा भौम। पुनः इन दोनों के ही चार – चार प्रभेद और होते हैं जो इस प्रकार है :-

दिव्य :-

१) – नभ / शुक्ल / सात्विक :- इसमें धन के रक्षक देवताओं यथा यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि की तपस्या करके उनसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार दैनिक धनराशि प्राप्ति की जाती है। यह धन आपको अन्न, वस्त्र अथवा स्वर्णमुद्रा के रूप में प्राप्त होगा। स्वर्णमुद्रा की संख्या देवताओं को शक्ति, पद और अधिकार के अनुसार न्यूनतम १ स्वर्णमुद्रा से लेकर अधिकतम १,००,००० स्वर्णमुद्रा प्रतिदिन तक जा सकती है, लेकिन सम्पूर्ण धनराशि को उसी दिन दान, भोग अथवा त्याग के माध्यम से समाप्त कर देना चाहिए।

२) – भूमि / रक्त / राजस :- इसमें प्राकृतिक शक्ति, यथा पर्वत, नदी, सरोवर, वृक्ष, समुद्र आदि एवं भूत, प्रेत, वेताल आदि क्षुद्र शक्तियों की साधनाओं के माध्यम से धन प्राप्त किया जाता है। यह धन भी देवता की शक्ति, पद और अधिकार की अनुसार न्यूनाधिक होते हैं। इसमें मुख्य रूप से रत्नों तथा आभूषणों के प्रारूप में धन मिलता है, जिसे उसी दिन खर्च कर देना चाहिए।

३) – पाताल / कृष्ण / तामस :- इसमें निधिदर्शन साधना के माध्यम से तथा हरिहर सम्बन्धी मन्त्रों के प्रयोग से सिद्ध महात्मा जन भूमि में गड़े धन को निकालने का कार्य करते हैं। इसमें धन का कोई निश्चित प्रारूप नहीं होता और साथ ही खर्च करने की निश्चित अवधि भी नहीं होती। जिस रूप में धन गड़ा है, उसी।रूप में मिलेगा और जब चाहें तब खर्च कर सकते हैं। हालांकि इस धन का दशांश से चतुर्थांश तक ( १० – २५% ) का भाग समाजसेवा में व्यय कर देना चाहिए।

४) – रसायन / धातु विज्ञान :- इसमें अलग अलग रसायनों, वनस्पतियों और धातुओं के मिश्रण, उद्दीपन, पारद संस्कार आदि के माध्यम से स्वर्ण-रजतादि का निर्माण किया जाता है।

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उपर्युक्त चारों विधियां अति विशिष्ट, दुर्लभ और गोपनीयता से भरी हैं। अब भौम नामक स्रोत के चार प्रभेदों का वर्णन करते हैं :-

१) – वर्ण :- व्यक्ति अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त जन्म के वर्ण और उसमें आने वाली जाति के अनुसार आजीविका का अनुसरण करते हुए धन का अर्जन करे।

२) – प्रतिभा :- यदि वर्णगत आजीविका से प्राप्त धन पर्याप्त न हो तो वर्णसम्मत प्रतिभा के माध्यम से (यथा खेल, सङ्गीत, चित्रकला, अभिनय, लेखन, मूर्तिकला, शिल्प, अधिवक्ता, रक्षा, व्यापार कौशल आदि आदि) धन का अर्जन करना चाहिए।

३) – आपद्धर्म :- यदि उपर्युक्त दोनों स्रोत से धनागम न होता हो तो कृषि का अवलम्बन करे। जो अन्न स्वयं खाता हो, उसका उत्पादन स्वयं करे। अपने भोजन का नियंत्रण अपने हाथ में रखे। साथ ही एक या दो वर्ण नीचे (मतांतर से ऊपर भी) के कर्म को आंशिक रूप से अपनाकर जीविका चलानी चाहिये।

४) – अधिग्रहण :- आवश्यकता ही अधिकार है, और यही अधिग्रहण का नियम है। यह चौथा और अंतिम स्रोत होता है। जो व्यक्ति भूख या प्यास से मर रहा हो, उसे अधिकार है कि बलपूर्वक अथवा छलपूर्वक अपनी प्राणरक्षा की मात्रा के अनुसार अन्न या जल (कुछ मामलों में धन भी) उस व्यक्ति से ले ले, जिसके पास उसकी आवश्यकता से अधिक धन हो और जो फिर भी मांगने पर भी न दे। हालांकि अधिग्रहण का मुख्य उद्देश्य प्राणरक्षा ही होना चाहिए, न कि लोभपूर्वक सङ्ग्रह।

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इसके अतिरिक्त अधर्मपूर्वक अर्जित धन वाले व्यक्ति की सम्पदा का अधिग्रहण निम्न जन परिस्थितियों के अनुसार कभी भी और कितना भी कर सकते हैं… इनमें कनीय से वरीय क्रम के अनुसार यह व्यवस्था है :-

अधर्मी वैश्य एवं शूद्र का, साथ ही क्षत्रिय और ब्राह्मण के भी अनुचित रूप से अर्जित धन को आंशिक या सम्पूर्ण रूप से परम्परागत क्षत्रिय राजा अधिग्रहित कर ले। अधर्मी राजा के धन को समर्थ और धर्मप्रतिपालक ब्राह्मण वर्ग अधिग्रहण कर ले और योग्य राजा की व्यवस्था होने पर उस धनराशि को प्रजा के हितानुसार नवीन राजा को सौंप दे।

यदि ब्राह्मणवर्ग अधर्मी हो गए हों तो अधिकृत संन्यासी, शंकराचार्य आदि पारंपरिक धर्माधिकारी जन उस धन का अधिग्रहण करें। शंकराचार्य आदि के भी मोहग्रस्त होने की अवस्था में विरक्त अवधूत परमहंस (जैसे कि श्रीशुकदेवजी, अष्टावक्र जी, दत्तात्रेय जी आदि आदि थे) मठों और प्रजा की संपत्ति का अधिग्रहण करके सत्ता परिवर्तन करके योग्य लोगों को पुनः पदभार देकर सम्प्रदायों और सम्पदाओं का विभाजन कर दें।

यदि अवधूत परमहंस न हों, या उनकी इच्छा ऐसा करने की न हो अथवा परिस्थितियों में कुछ अधिक ही संकट हो तो भगवान के पार्षदगण अवतार लेते हैं और विशेष स्थितिमात्र में भगवान का भी अवतार होता है। हालांकि उससे पूर्व मानव अधिकारियों को पर्याप्त प्रेरणा, अवसर और बल दिए जाते हैं ताकि स्थितियों में धर्मानुकूल परिवर्तन किया जा सके।

ज्ञान, पराक्रम और धन के ये कुल सोलह स्रोत ही मनुष्य को एक स्वस्थ, समृद्ध और विकसित समाज का नेता बना सकते हैं।

जब तक हम अपने धर्म को जीवन में नहीं सम्मिलित करते, जब तक हम रोजगार, गाड़ी, बंगला, विवाह, बच्चे की कथित ब्रांडेड पढाई, और बॉलीवुड के ऊपर धर्म को प्रधानता नहीं देते, तब तक हमारा अस्तित्व सुरक्षित नहीं रह सकेगा। धर्म रहेगा तो ये सब आ जाएंगे, धर्म जाएगा तो ये सब होने पर भी छिन जाएगा। धर्म ही अर्थ, काम और मोक्ष तक पहुंचाता है। नींव ही छत तक पहुंचाती है।.. धर्म सबसे बड़ा है.. आपके परिवार, आपकी जीविका और आपके शरीर से भी बड़ा। जिस दिन आप ये बात समझ जाएंगे, उसी दिन से विजयध्वज दिखने लगेगा।

ATUL VINOD



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