भारतीय समाज:- कर्म व पुनर्जन्म 2 (Karm & Rebirth 2)

भारतीय समाज:- कर्म व पुनर्जन्म 2 (Karm & Rebirth 2)

2. वर्णगत संस्तरण को संरक्षण (To safe guard the Varn Hier-archy) - वर्गों का आधार वैयक्तिक योग्यताएँ और क्षमताएँ हैं। वर्ण-व्यवस्था का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि कुछ वर्णों के लोग कम परिश्रम कर अधिक अर्जित करते हैं, उनका जीवन अधिक सुखी होता है, जबकि कुछ वर्ण अधिक परिश्रम कर कम प्राप्त करते हैं और तुलनात्मक दृष्टि से निम्न जीवन का निर्वाह करते हैं। यह अन्तर निम्न वर्णों में उच्च वर्णों के प्रति विद्वेष उत्पन्न करने का कारण बन सकता है। ऐसी दशा में उत्पन्न होने वाले संघर्ष से समाज की रक्षा करने में कर्म के सिद्धान्त ने उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह किया है। सभी मनुष्यों को न तो एक जैसी स्थिति प्रदान की जा सकती है और न ही भूमिकाएँ। कार्यों के संपादन की दृष्टि से इनमें अन्तर अवश्यम्भावी है, परन्तु इस अन्तर के कारण संघर्ष उत्पन्न नहीं होना चाहिए। कर्म का सिद्धान्त यह प्रकट करता है कि वर्तमान, अतीत का प्रतिफल है और भविष्य वर्तमान के कर्मों से बनेगा। इस प्रकार वर्तमान से संतुष्ट होकर निष्ठापूर्वक दायित्वों का निर्वाह करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। इसी धारणा ने वर्ण-संघर्ष से समाज को मुक्त रखा।

3. आश्रम व्यवस्था का संरक्षण (To protect Ashram System) – आश्रम व्यवस्था में अलग-अलग आश्रमों में व्यक्ति के जीवन काल को विभाजित किया गया है। प्रत्येक कालावधि में निश्चित प्रकार के कर्मों का प्रावधान किया गया है। उस कालावधि में निर्धारित कर्तव्यों का परिपालन करने से ही जहाँ व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति होती है, वहीं सामाजिक व्यवस्था भी बनी रहती है। इस दृष्टि से आश्रम धर्म के प्रति निष्ठा उत्पन्न करने में कर्म का सिद्धान्त सहायक रहा है।

Rajesh Narbariya



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