SPECIAL: भारत की ऐतिहासिक परम्परा और धर्म नगरी अवंतिका “उज्जैन”

 

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ऐतिहासिक परम्परा में उज्जैन का उल्लेख

लिंग पुराण, मत्स्य पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण के अनुसार महावंश के विख्यात नरेश कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने अवन्ती पर शासन किया था और उन्हीं से अवन्ती राज्य का प्रारम्भ हुआ। महाभारत में लिखा है कि अवन्ती के दो रमेश विन्द और अनुविन्द ने कौरवों की ओर से पांडवों के विरुद्ध दो अक्षोहिणी सेना के साथ युद्ध में भाग लिया था। ये दोनों ही महारथी युद्ध करते-करते पांडवों द्वारा मारे गये। इसके पश्चात् बीच का युग ऐतिहासिक दृष्टि से अंधकारमय है। गौतम बुद्ध के समय में अवन्ती के राजा चण्डप्रद्योत थे। उस समय उत्तरी भारत में अवन्ती, मगध, कौसल तथा वत्स ये चार राज्य प्रसिद्ध थे। चण्ड प्रद्योत की पुत्री वासदत्ता एवं वत्स नर्स उदयन की प्रेम कथा संस्कृत साहित्य में 'स्वप्न वासवदत्ता' के रूप में सदा अमर रहेगी। प्रद्योत वंश ने उज्जैन में 138 वर्ष राज्य किया। इस वंश के अंत सम्बन्धी कारणों के विषय में इतिहास मौन है।

मगध के मौर्य सम्राट् बिन्दुसार के राज्य में उज्जयिनी का वैभवपूर्ण नगरी थी और अवन्ती प्रदेश का प्रतिनिधि शासक यहीं रहता था। अशोक अपने युवराज काल में बिन्दुसार के प्रतिनिधि के रूप में 11 वर्ष तक उज्जैन में रहा और यहीं उसके पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ। अशोक के पुत्र कुणाल ने केवल 8 वर्ष राज्य किया तदुपरान्त उसके पुत्र सम्प्रति ने राज्य का विस्तार करके मध्यप्रदेश, गुजरात और दक्षिण में अपनी शक्ति बढ़ाई तथा साधुओं के लिए 25 राज्यों में अधिक सुविधाएँ प्रदान कराई। मौर्य वंश के उपरान्त शुंग और कण्व वंशों ने मगध और विदिशा पर राज्य किया, किन्तु अवन्ती पर उनके आधिपत्य का प्रमाण नहीं मिलता। कण्व वंश का अंत ईसा के 27 वर्ष पूर्व हो गया था।

इसके पश्चात् विक्रमादित्य ने अवन्ती पर राज्य किया और ईसा पूर्व 57 में शकों परास्त करके शकारि की पदवी धारण की। विक्रमादित्य के काल में उज्जयिनी का ऐतिहासिक, साहित्यिक तथा कला का वैभव पराकाष्ठा पर पहुंच चुका था। विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, उसकी सादगी ओर शौर्य की गाथाएँ भारतीय साहित्य में यत्र-त्र बिखरी पड़ी हैं। 'सिंहासन बत्तीसी' और 'बेताल पच्चीसी' जनश्रुतियों का एक विचित्र भंडार है। महाकवि कालिदास, विक्रमादित्य के समय में ही हुए थे, जिनके साहित्य को विश्व साहित्य में उच्च कोटि का स्थान प्राप्त है। विक्रम के नवरत्न अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।इस काल में साहित्य, कला, ज्योतिष, आयुर्वेद, कोश और ज्ञान-विज्ञान का भण्डारबड़े-बड़े पंडितों द्वारा भरा गया। समस्त विश्व इसके लिये उज्जयिनी का ऋणी रहेगा।विक्रमादित्य के पश्चात् कुछ काल तक का इतिहास अन्धकारमय है

उत्तर में कुषाण वंश का प्रादुर्भाव ईसा की प्रथम शताब्दी के अन्त में हुआ। कनिष्क इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था। कोई-कोई इतिहास लेखक इस बात को मानते हैं कि कनिष्क का अधिकार उज्जैन पर भी था। उज्जैन के शासकों में शिथिलता आते ही गुजरात के शर्मा ने फिर अपना प्रभुत्व बढ़ाया और उज्जैन को अपने अधिकार में कर लिया। शक क्षेत्र का प्रथम उत्तराधिकारी चष्टन था उज्जैन को राजधानी बनाकर उसने शकों का शासन दुढ करने में अपनी शक्ति लगाई। इस वंश के 9 राजा हुए जिनमें रूद्रदमन सबसे अधिक प्रतापी निकला। उसका प्रभुत्व गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, अवन्ती तथा राजस्थान के दक्षिणी भाग पर था। तीसरी शताब्दी के अन्तिम भाग में इन क्षत्रपों का पतन प्रारम्भ हुआ।

क्षत्रपों के काल में दक्षिण में सातवाहन वंश की स्थापना हुई। पुराणों में इन्हें आंध्र के नाम से सम्बोधित किया गया है। गौतमीपुत्र शातकर्णी ने अवन्ती पर अपना अधिकार क्षेत्र समय में ही जमा लिया था किन्तु रुद्रदमन ने पुनः आंध्रों से अवन्ती को छीन लिया। यह संघर्ष चलता ही रहा और यज्ञश्री शातकर्णी ने अवन्ती को पुनः क्षेत्रों से छीन लिया। क्षत्रपों और सातवाहनों पश्चात् गुप्त वंश का अधिकार उज्जैन पर हुआ। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों को फिर अवन्ती क्षेत्र से मार भगाया और विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण की। चन्द्रगुप्त ने 375 ई. में अयोध्या में राज्यारोहण किया : किन्तु उसने 395 ईसवी में उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया। इन विक्रमादित्य की यशोगाथा अनेक शिलालेखों पर अंकित है।

चीनी यात्री फाह्यान इनके राज्यकाल में भारत में आया था।उसने विक्रमादित्य की कीर्ति और वैभव का वर्णन किया है। इस समय साहित्य संस्कृति एवं कला अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई थी इसीलिए अनेक विद्वानों का मत है कि उज्जैन के प्रसिद्ध विक्रमादित्य ये ही थे विक्रमादित्य के पश्चात कई पीढ़ियों तक गुप्त वंश का आधिपत्य उज्जैन पर रहा; किन्तु छठी शताब्दी के व गुप्त साम्राज्य निर्बल हो गया और हूणों ने उज्जैन पर अपना अधिकार कर लिया था हूण शासक तोरमाण हुआ। उसके पुत्र मिहिरकुल को मन्दसौर के शासक यशोधर्मन ने सन् 533 ईसवी में परास्त करके उज्जैन को अपने राज्य में मिला लिया: किन्तु उसके वंशजों का आधिपत्य अधिक समय तक न रह सका और थानेश्वर के प्रभाकरवर्द्धन ने छठी शताब्दी के अन्त में हूणों को हराकर मालवा, गुजरात तथा सिन्ध पर अधिकार कर लिया।

प्रभाकरवर्द्धन के छोटे पुत्र हर्षवर्धन ने 606 से 647 ईसवी तक राज्य किया। बाणभट्ट ने कादम्बरी में उज्जयिनी की प्रशंसा हर्ष के समय में ही लिखी थी। इसी समय दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत में आया। उसने लिखा है कि अवन्ति देश का क्षेत्रफल 1200 वर्ग मील था उज्जैन नगरी उस समय 6 वर्गमील में बसी हुई थी। नगरवासी व्यापार में बड़े कुशल थे। नगर में उस समय 10 बौद्ध विहार थे, जिनमें से कुछ जीर्ण हो चुके थे। बौद्ध भिक्षुओं की संख्या नगर में 300 थी। नगर में 10 मठ अन्य सम्प्रदायों के भी थे, जिनमें साधु लोग अधिक रहते थे। येनसांग लिखता है कि उज्जैन के लोग कोमल स्वभाव के एवं मधुभाषी थे। विद्या और बुद्धि में वे बढ़े-चढ़े थे। नगर धन-धान्य से पूर्ण था और व्यापार का केन्द्र माना जाता था। यहाँ बौद्ध भिक्षुओं के पश्चात से भारत में अराजकता फैल गई।

राष्ट्रकूट तथा गुर्जर प्रतिहार मालवा के लिए झगड़ते रहे। नवीं शताब्दी में परमारों ने मालवा पर अपना अधिकार कर लिया। इस वंश के प्रसिद्ध राजा वाक्पति मुंज और भोजदेव हुए। भोजदेव बड़े साहित्य-प्रेमी और कीर्तिवान हुए। कला और साहित्य की उन्नति इनके समय में अत्यधिक हुई। मुंज स्वयं वीट और विद्वान था। उसने कई बार चालुक्य राजा तैलप को परास्त किया किन्तु एक बार वह स्वयं परास्त हो गया। तैलप ने अपनी राजधानी में ले जाकर मुंज को बन्दीगृह में डाल दिया और उसे अपनी बहिन को शिक्षक बनाया; किन्तु उसके भाग जाने का सन्देह होने पर उसका सिर काट लिया।

मुंज के समय में उज्जैन के साथ-साथ धार की प्रतिष्ठा भी बढ़ने लगी थी। प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण मुंज ने धार में भी महल और घाट बनवाए थे। मुंज के पश्चात् उनके भतीजे भोज देव ने विक्रमादित्य के समान ही कीर्ति अर्जित की; किन्तु अपनी राजधानी सदैव के लिए नगरी घाट को ही बनाया। भोजदेव के समय में साहित्य की श्रीवृद्धि के साथ-साथ चालुक्यों से युद्ध भी होते रहे। गांगेय देव का युद्ध इसमें प्रसिद्ध है।

भोज ने गांगेय को हराकर विजय के उपलक्ष्य में एक लोहे का कीर्ति-स्तम्भ (लाट) खड़ा किया, जो अब भी धार में तीन टुकड़ों में विद्यमान है। अन्त में कलचुरि, चेदि और कर्नाटक नरेशों ने सम्मिलित रूप से भोजदेव पर आक्रमण किया, जिसमें भोज हारे और मारे गये। भोज विद्या, वीरता ओर दान में अद्वितीय थे। उनके दरबार में 1,400 पंडित रहते थे। भोज की मृत्यु (1058 ईसवी) के उपरान्त जयसिंह और उदयादित्य शासक हुए, जिन्होंने अनेक मन्दिर और तालाब बनवाए। उदयादित्य की वंश-परंपरा में लक्ष्मणदेव, नरवर्मन देव, यशोवर्मन देव ने शासन किया। अर्जुन देव के समय सन् 1235 ई. में दिल्ली के गुलामवंशीय सुलतान अल्तमश ने मालवा पर आक्रमण किया और उज्जैन तथा धार के वैभव को विनष्ट कर दिया। सन् 1291 से 1293 तक खिलजीवंश के प्रसिद्ध सुल्तान अलाउद्दीन ने दोबारा उज्जैन पर आक्रमण किया और उसे अपने राज्य में मिला लिया।

सन् 1322 में दिल्ली के तुगलक वंश ने मालवा को अपने राज्य का एक सूबा बना लिया और मालवे में अपना एक शासक नियुक्त कर दिया। जिस समय दिल्ली पर तैमूर लंग ने आक्रमण किया उस समय मालवा के तत्कालीन सेवा दिलावरखां ने मांडू को राजधानी बनाकर स्वतंत्र मांडू में अनेक इमारतें बनवाई। उसका मकबरा मांडू की प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारतों में गिना जाता है। इसके पश्चात् खिलजी सुलतानों का 11 आधिपत्य हुआ।

नासिरुद्दीन खिलजी ने उज्जैन में कालियादेह महल बनवाया उसी के एक होज में डूबने से उसकी मृत्यु हुई। सन् 1531 में गुजरात के सुलतान बहादुरशा ने मालवा को जीत लिया। सन् 1534 में मुगल सम्राट हुमायूं ने बहादुरशाह को मदंसौर के निकट हराया। शेरशाह सूरी ने जब हुमायूं को हरा दिया. तो उज्जैन पर सूर वंश का अधिकार हो गया। शेरशाह ने 1542 ईसवी शुजाअत खान को मालवे का सूबेदार नियुक्त किया। वह भी मांडू में ही रहता था। उसका पुत्र बाजबहादुर मांडू का अन्ति सुलतान था। रूपमती और बाजबहादुर की प्रेमगाथा भारत के जनशक्ति-साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है। हुमायूं के पुत्र साट अंको को सेनापति आदमखां को मांडू विजय के लिए भेजा था। सारंगपुर में बाजबहादुर आदमी से हार गया और इस प्रकार सन् 1562 में मालवा मुगल राज्य का एक सूबा बना दिया गया।

अकबर के पश्चात् जहांगीर ने मालवे में उज्जैन और मांडू की कई बार यात्रा की और उज्जैन के जगद्प नामक संत के दर्शन किए। अपनी डायरी में जहांगीर ने उज्जैन के इस संत के विषय में विस्तार से लिखा है। मुगल राज्य के पतनकाल में मुहम्मद शाह ने सन् 1720 में जयपुर नरेश जयसिंह को उज्जैन का सूबेदार बनाया था। उन्होंने जयपुर, दिल्ली, मथुरा, काशी और उज्जैन में वेधशाला बनवाई।

उज्जैन की यह वेधशाला आज भी विद्यमान है। इसी समय मराठों के आक्रमण होने लगे थे। कालान्तर में पेशवाओं ने मालवा अपने सरदार राणोजी को जागीर में दे दिया। तब से उज्जैन ग्वालियर के प्रसिद्ध सिंधिया वंश के अधिकार में रहा। उज्जैन के मन्दिरों का 1. जीर्णोद्धार इसी काल में कराया गया। सन् 1810 में दौलतराव सिंधिया ने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर लश्कर (ग्वालियर) में स्थापित की।

सिंधिया वंश के शासन में उज्जैन की उन्नति फिर होने लगी। अन्त में सन् 1948 में मध्य भारत राज्य निर्माण के समय सिंधिया-राज्य, ग्वालियर का विलीनीकरण मध्य भारत में हो गया। नवम्बर सन् 1956 में मध्य भारत राज्य समाप्त हो गया और नवीन मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ।

वर्तमान उज्जैन नगर विन्ध्य के मनोरम अंचल में समुद्र तल से 1698 फीट ऊंचाई पर बसा हुआ है। इसकी स्थिति उत्तरी अक्षांश 23°17′ तथा पूर्वी देशान्तर 78°78″ है। यह क्षिप्रा तट पर बसा हुआ है। यहाँ का जलवायु समशीतोष्ण है। यहाँ की भूमि उर्वरा और प्राकृतिक दृश्य मनोरम है। प्रतिवर्ष यहाँ सहस्रों यात्री महाकालेश्वर के दर्शनार्थ तथा क्षिप्रा के स्नानार्थ आया करते हैं।


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