अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस : बदल रहे हैं बुजुर्गियत के मायने .. अतुल विनोद


स्टोरी हाइलाइट्स

अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस : बदल रहे हैं बुजुर्गियत के मायने .. P Atul Vinod आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस है| बातें हो रही हैं बुजुर्गों के सम्मान की सीख दी जा रही है उनकी कद्रदान की| आखिर ज़रूरत क्यूँ है? क्यूँ बताना पड़ता है कि बुजुर्गों का सम्मान करो, उनका ख्याल रखो, उन्हें ललकारो मत? क्या जिन्हें बताना पड़ रहा है वे नासमझ हैं? क्या उन्हें पता नही कि वे भी उसी बुजुर्गियत की कतार में हैं| १०,२०,३० साल कब तक खैर मनाएंगे एक दिन तो उम्र की दहलीज पर पंहुच जायेंगे? बुजुर्ग इस धरती पर बोझ नहीं है बल्कि बुजुर्ग वो वृक्ष है जो हम सबको छाया दे रहे हैं| आज दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी युवाओं की है| लेकिन इस वसुंधरा को सही दिशा  देने का काम बुजुर्ग कर रहे हैं| दुनिया में 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 5 साल से कम उम्र के बच्चों से ज्यादा हो गई है| इतना ही नहीं बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है 2050 तक बुजुर्गों की संख्या 3 गुना तक बढ़ जाएगी | आज हमे युवावस्था को लेकर और सम्वेदनशील होना होगा| क्यूंकि बुजुर्ग बढ़ते जायेंगे| लेकिन ये वो समाज है जहां व्यक्ति हर दम अपने आपको भूला हुआ रहता है| सच्चाई से भागता हुआ उस बुजुर्ग का अपमान करता है जो उसका जन्मदाता है| जो उसका भविष्य है| यह जो छत मयस्सर है यह किसकी वजह से? क्यों भूल जाते हैं ? बुजुर्ग से ही तो घर की शान है| बुजुर्ग ना हो तो घर घर नहीं रहता| हर दौर में बुजुर्ग ने झिडकियां सही हैं| शायद कभी उन्होंने भी ऐसा ही किया होगा? ये परिपाटी किसने बनायीं? जो आज बुजुर्ग था वो कभी युवा था जो आज युवा है कभी वृद्ध होगा| अपने साए से कब तक भागेंगे? आज उनके जुबा पर बंदिश लगा रहे हैं कल हमारे ही बच्चे हम पर भी जंजीरें बांध कर ताले लगायेंगे| बड़ो के सम्मान से ही दुआ मिलती है| उनके आँखों में ख़ुशी हो तो दिल को तसल्ली मिलती है| हर बात आउट डेटेड हो ज़रूरी नहीं तजुर्बा और अनुभव कभी पुराना नहीं होता| तकनीक बदलती है लेकिन जीवन के सूत्र हमेशा जस के तस रहते हैं|  बुजुर्ग बरगद के पेड़ हैं| वो छाँव हैं| उनके जीने का अपना तरीका है| न जाने ये सठियाना शब्द किसने निकाला है| सठियाने का मतलब है पक जाना| जीवन के भंवर से निकल कर अनुभवों के मोती से परिवार को पिरोकर संस्कार, आशीर्वाद से बगिया को सींचना| और अब तो साठ के बाद ही उनके छिपी प्रतिभा सामने आ रही है| सुकून देने वाली बात ये है की बुजुर्गों के प्रति नयी पीढ़ी का नज़रिया बदल रहा है| इतना ही नहीं बुजुर्गों की आबादी बढ रही है लेकिन वे खुद भी जागरूक हो रहे हैं वे भार नहीं सम्पत्ति बन रहे हैं| आज धरती पर लगभग 15 करोड़ बुजुर्ग निवास करते हैं| सुखद बात यह है कि जनसंख्या नियंत्रण के नतीजे दिखाई दे रहे हैं और विश्व की औसत जन्म दर कम हुई है| 65 साल से ऊपर उन लोगों की बढ़ती आबादी यह नहीं कहती कि दुनिया में बूढ़ों की तादाद बढ़ रही है| रोचक यह है 65 साल से ऊपर के बुजुर्ग भी पहले से ज्यादा सेहतमंद,  खुश और प्रोडक्टिव हैं| ये बुजुर्ग बाजार के लिए अच्छे उपभोक्ता भी हैं| अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभदायक हैं| क्योंकि इनकी जरूरतें है और खर्च करने की क्षमता भी| भारत में जीवन को चार हिस्सों में बांटा गया है| औसत उम्र को लगभग 100 साल मानकर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ वानप्रस्थ और सन्यास|  बीच में एक दौर ऐसा आया जब औसत उम्र 60 के लगभग रह गई और यह वर्गीकरण अप्रासंगिक हो गया| वयस्क जीवन का तीसरा आश्रम ही पूरा नहीं हो रहा था तो चौथा तो बहुत कम के नसीब होता था| औसत उम्र बढ़ने के साथ अब जीवन को समग्र रूप से देखने की दृष्टि बढ़ी है| पाश्चात्य देश भी सेहतमंद बुजुर्गों की बढ़ती तादाद के बाद जीवन के तीसरे और चौथे चरण की गुणवत्ता पर विचार विमर्श करने लगे हैं| पाश्चात्य संस्कृति में भी जीवन को चार हिस्सों में बांटा जा रहा है| 0 से 21 साल 21 साल से 40 साल 40 से 60 साल और 60 से 80 साल, हर हिस्से में लगभग 8000 दिन होते हैं| जो लोग 60 साल के बाद भी अच्छी सेहत के साथ सरवाइव कर रहे हैं उनके पास अगले 8000 दिन होने की पूरी संभावना है| यह 8000 दिन वह दिन होंगे, जहां आपकी अपेक्षाएं तौर तरीके बदल चुके होंगे| जीवन का यह चरण अर्थव्यवस्था में बेहतर भागीदारी के लिए है|बल्कि समाज को भी कुछ अच्छा मिलने की उम्मीद बढ़ गई है| क्योंकि इस दौर में ज्यादातर लोग ईमानदार हो जाते हैं, स्वार्थ से परे हो जाते हैं और सेवा व परमार्थ के प्रति आकर्षित होते हैं| इसलिए वह अपने अनुभवों और जमा किए गए आर्थिक संसाधनों का समाज के हित में उपयोग करने पर सोचने लगते हैं| अमेरिका में 50 साल से ज्यादा उम्र के लोग देश के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं| वे सालाना लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक गतिविधियां पैदा करते हैं| बुजुर्गों के कारण घरेलू सामग्रियों की मांग भी बढ़ी है| यह मांग बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण ही इंक्रीज हुई है| अनुमान है कि अगले 10 साल तक उपभोक्ता खर्चे  का आधा हिस्सा 55 साल से ज्यादा उम्र की आबादी के कारण होगा| जापान में 55 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी लगभग 67 फ़ीसदी हैं और जर्मनी में 86 फ़ीसदी| पहले समाज में बुढ़ापा बढ़ने को आर्थिक सेहत के लिए खराब माना जाता था| अब सेहतमंद और एक्टिव बुजुर्ग अर्थव्यवस्था में भी एक अच्छी भूमिका निभा रहे हैं| अब बुजुर्गों पहले से ज्यादा सजग सतर्क और आनंद भोगी हो गए हैं| ऑनलाइन बाजार में भी बुजुर्ग तेजी से अपनी भागीदारी बढ़ा रहे हैं| बुजुर्ग आनंद के लिए भी पहले से ज्यादा सक्रिय हैं| स्विमिंग पूल से लेकर पैकेज होलीडे और व्यायाम कक्षाओं तक में बुजुर्ग युवा पीढ़ी के साथ दिखते हैं| टूरिस्ट गतिविधि हो या ऑनलाइन एक्टिविटी हर जगह बुजुर्गों युवाओं के साथ दिखाई दे रही है| आज फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर बुजुर्ग युवाओं से ज्यादा सक्रिय है| आप भी अपनी उम्र बढ़ने के कारण चिंतित ना हों| भले ही आपका शरीर उम्रदराज हो रहा है लेकिन आप चिर-युवा की तरह महसूस करके अपने आप को फिट रख सकते हैं| जिंदगी के इस दौर में भी पूरा मजा ले सकते हैं| भारतीय आश्रम व्यवस्था बुजुर्गों की पीढ़ी के लिए एक कारगर विकल्प है|अपने जीवन को जीते जी कैसे संवारें और अगले जीवन की तैयारी कैसे करें? भारतीय दर्शन में यह बहुत अच्छी तरह बताया गया है|
News Puran Desk

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