विकलांगता का मजाक उड़ाने वालों को इरा सिंघल ने दिया आत्मीयता से जवाब

विकलांगता का मजाक उड़ाने वालों को इरा सिंघल ने दिया आत्मीयता से जवाब

बात कुछ साल भर से भी ज्यादा पुरानी है.अपनी आत्म शक्ति, खुद की मेहनत और शरीर की विकलांगता को पीछे छोड़ते हुए आईएस बनी इरा सिंघल. उन्ही IAS इरा सिंघल को सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने “कुबड़ी” कहा था. इस पर जवाब देते हुए सिंघल ने उसे सबक सिखाने की बजाए देश में शिक्षा को बेहतर और मानवीय बनाए जाने की ओर ध्यान दिलाया.

शरीर से अंधा, बहरा, लंगड़ा, कुबड़ा. ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो मनुष्य की शारीरिक विकलांगता के बारे में बताते हैं लेकिन उनके सामर्थ्य और मेहनत के बारे में नहीं. विकलांगता की इतना महत्व होता तो इरा सिंघल, सामान्य श्रेणी से आईएएस परीक्षा टॉप करने वाली देश की एकमात्र उम्मीदवार न बनतीं. उनकी प्रतिभा और जीवटता के सामने उनकी कथित शारीरिक अक्षमता कभी आड़े नहीं आई लेकिन 2014 में इतिहास बनाने के बाद इन दिनों जब वो आईएएस के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं तो इसी दौरान सोशल मीडिया इंटरएक्शन में उन्हें खासी निर्ममता से अपने "कुबड़ेपन” की याद दिला दी गई.

इरा परेशान नहीं हुई बल्कि उन्होंने उस कड़वे और बेहूदे कमेंट की परिभाषा ही बदल दी, उन्होंने उस बात को लोगों को  प्रेरित और दिशा दिखाने वाले एक संवेदनशील अवसर में बदल दिया- उन्होंने कहा की अगर स्कूली शिक्षा समावेशी बन जाए और हर तरह के बच्चे एक साथ एक जगह पर पढना और लिखना करें,  तो अक्षमता का मजाक उड़ाने वाली धारणाएं मिटाई जा सकती हैं. इस भद्दे कमेंट के लेकर जब इरा के प्रति सहानुभूति दिखाई और कहा गया के कमेंट करने वालो को सजा देनी चाहिए.  तो इरा ने इसका जवाब भी संतुलित और सुसंयत तरीके से देते हुए कहा कि ये सजा का नहीं सजगता का मामला है, विवेक के इम्तहान का भी मामला है.

  इरा सिंघल ने एक घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि विकलांग व्यक्ति के बारे में ये सोचना कि उन्हें कुछ सहना नहीं पड़ता, क्योंकि उनके लिए दुनिया भली और दयालु है तो शायद ऐसा नहीं है. इरा के कहने के आशय को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि श्रेष्ठता ग्रंथि की परिचायक ऐसी शिक्षा भला किस काम की जो शरीर, रंग, जाति, नस्ल आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव और पूर्वाग्रह को चिंहित और प्रतिरोध के लिए तैयार न कर पाती हो. कहा जा सकता है कि उपरोक्त तमाम कमजोरियों से मुक्त व्यवहार और मानसिकता की शिक्षा दरअसल घर और परिवार से शुरू होनी चाहिए. घरों में अगर बच्चों को शुरू से ही कथित शारीरिक अक्षमताओं, देह के रंग, जाति, अमीरी गरीबी के बारे में संवेदनशील बनाया जाए और उन्हें पारिवारिक और सामाजिक रुढ़ियों में न जकड़ कर रखा जाए तो वे खुले ढंग से विकास कर सकते हैं. व्यवहारिक ही नहीं मानसिक स्तर पर भी वे बेहतर बनेंगे और उनमें बराबरी, न्याय और करुणा जैसे मूल्यों को अपनाने में दिक्कत नहीं जाएगी .

 बड़ी दुःख की बात ये है की ऐसा हो नहीं पाता मगर इरा सिंघल जैसे विशिष्ट लोगों द्वारा इस हालात को बदलने की पैरवी करती है. वैसे ऐसी विमुखता और बेरहमी झेलनी वाली वो न पहली व्यक्ति है न पहली महिला और न ही पहली शख्सियत. फिल्म उद्योग से जुड़ी महिला अदाकारों और मीडिया से लेकर अदालतों, अकादमिक जगत से लेकर सेना, इंजीनियरिंग, ड्राइविंग और अन्य पेशों में कार्यरत महिलाओं को भी कमोबेश ऐसी ही टिप्पणियों और जबानी हमलों का निशाना बनाया जाता है.

इरा सिंघल ने सीधे शब्दों में बस इतना ही कहा है कि अंधा, बहरा, कुबड़ा अपने आप में कोई खराब शब्द नहीं हैं. खराब तब है जब इन शब्दों को बोलते हुए किसी कमी या नीचता का अहसास दिलाया जाए यानी गलत नीयत से इनका प्रयोग किया जाए. ये वास्तव में गलत है और इसके लिए उपचार की जरूरत है और वो उपचार शिक्षा में निहित है. स्कूल से पहले घर पर. अगर कुबड़ापन ही इरा की सफलता की गारंटी होती तो वो विकलांग कोटे से भी करियर बनाकर सफल हो सकती थी लेकिन सामान्य श्रेणी में टॉप कर उन्होंने न सिर्फ अपनी शारीरिक अक्षमता को दरकिनार किया बल्कि समाज को भी संदेश दिया कि संघर्षों के सामने कूबड़ नहीं सिर्फ लक्ष्य होते हैं. जिसके अंदर अपने लक्ष्य को पाने की इच्छा होती है उसके सामने किसी भी प्रकार की समस्या मायेने नहीं रखती है. इंसान शरीर से कैसा भी हो मगर दिमाग और मन से उसको हमेशा दुरुस्त और साफ़  रहना चाहिए.


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