ईश्वर पिता है या माता?  जगत ईश्वर से बाहर है या उसके अंदर?  P ATUL VINOD

ईश्वर पिता है या माता?  जगत ईश्वर से बाहर है या उसके अंदर?  P ATUL VINOD

ईश्वर पुरुष है या स्त्री?  हम भगवान की पुरुष रूप में उपासना करें या स्त्री रूप में? दोनों में कौन बेहतर है? 

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कौन शक्तिशाली है देवी या देवता?

कोई शक्ति उपासक है तो कोई शिव का उपासक है|

ईश्वर में यह भेद हमारी नज़रिये के कारण है| हमने पुरुष और स्त्री को अलग अलग इकाई मानते हुए उन्हें छोटे बड़े में तोड़ लिया| दरअसल हमारी नज़र ईश्वर को भी साधारण मेल-फीमेल की तरह देखती है|

ईश्वरीय पुरुष और स्त्री स्वरूप मानवीय संरचना की तरह नही हैं| न ही दोनों में कोई डिफरेंस है|

आदिकाल में किसी ऋषि से जब पूछा गया कि हमें किस देवता की आराधना करनी चाहिए? तब उन्होंने जो जवाब दिया वो ऋग्वेद में दिया गया है| इसे आपने भारत एक खोज सीरियल में दशकों पहले दूरदर्शन में टाइटल सॉन्ग के रूप में कई बार सुना होगा|

“हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत ।

“सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं … याद आया?

इसे आगे विस्तार से दिया जायेगा … इसमें साफ़ कहा गया है कि हमे उस ईश्वर की आराधना करनी चाहिए जिसकी शक्ति से पूरी दुनिया चलती है, जिसके शरीर से सृष्टि पैदा होती है और उसमे ही लीन हो जाती है|

“हिरन्यगर्भ” हिरण्य पुरुष है और गर्भ उसकी प्रकृति … शिव-शक्ति हिरण्यमय पुरुष अपनी प्रकृति से मिलकर एक अंडाकार गर्भ का निर्माण करते हैं| विज्ञान कहता है सृष्टि के आरम्भ में विश्व की समस्त उर्जा एक ही पिंड में सिमट जाती है| इसी पिंड को हम शिवलिंग कहते हैं|

वही पिता ज्यूपिटर, ज्यूस पिटर, जेहोवा, यवेह नाम से पुकारा जाता है|

उस पिता शिव की शक्ति ही अदिति है| जो हमे प्रकृति, भौतिक रूप में दिखाई देती है वही हमें अपनी शक्ति से संचालित भी करती है|

यहाँ विश्व पिता और विश्व माता एक ही हैं पिता की ही शक्ति माता है| दोनों में कोई अंतर नहीं|

हम सोचते हैं विश्व पिता अलग है जिसने अपने हाथों से प्रकृति की रचना की|

समझ बढ़ने के साथ ये पता चलता है कि ईश्वर अपनी शक्ति प्रकृति से अलग नहीं है| ईश्वर ही पुरुष है और उसमे से पैदा हुयी सृष्टि ही उसकी प्रकृति/ स्त्री/शक्ति है|

ईश्वर कोई कारपेंटर नहीं जो बाहर के सामान से कोई आकृति बनाता है|

ईश्वर तो उस मकड़ी की तरह है जो मकड़ी की तरह सब कुछ अपने महास्वरुप से निकालता है|

पुरुष और प्रकृति| कारण और कर्ता| शिव और शक्ति उसके अंदर ही हैं|

उसी में आकाशगंगाएं हैं उसी में ब्लैक होल|

एक सनातन देव ही अलग अलग रूपों में एक्सप्रेस हो रहा है|

विज्ञान भी यही कहता है, एक आदि पिंड में विश्व की समस्त उर्जा थी जो किसी विस्फोट से पूरे संसार में फ़ैल गयी| कुछ ही सेकेंड में बिगबैंग से गृह नक्षत्र तारे आकाशगंगाएं और यूनिवर्स बन गये|

ये दुनिया एक व्यवस्थित संरचना है| आज विज्ञान मानता है कि कोई अद्रश्य पदार्थ इस सबको नियोजित रखता है| उस अद्रश्य पदार्थ के अंदर ही दृश्य पदार्थ व्यवस्थित रूप से कार्य करता है|

हम विश्व को पिता भी कह सकते हैं और माता भी|

वो पिता आदि ईश्वर है और माता उस ब्रह्मांड की अधीश्वरी|  वो माता ऐश्वर्य देने वाली चेतन और सर्वज्ञ है एक होते हुए भी अपनी शक्ति से अलग-अलग रूप में भाषित होती है|

ऋग्वेद में कहा गया है कि उस जगत जननी के अंदर ही हम जीवन धारण करते हैं|  वही सब की प्रेरणा है वही कर्ता है और वही कारण है| वही सत्य और असत्य से परे  है, वो पाप और पुण्य से ऊपर है| वह ना तो अच्छी है ना बुरी| हम अपने दृष्टिकोण के कारण उसमें अच्छाई और बुराई देखते हैं| वही संसार की रचना के लिए विरोधी स्वरूप धारण करती है|

हिंदू धर्म में इसी जगत-जननी को दुर्गा, काली, भवानी के रूप में पूजा जाता है|

हम सब उसकी स्तुति इस रूप में करते हैं “हे माता तुम सनातन हो, तुम ही मूल स्रोत हो, तुम ही अलग अलग नाम से अभिव्यक्त होती हो, तुम्हारी माया के कारण ही हम तुम्हें भूल जाते हैं, लेकिन तुम्हारी शरण में आने पर हम अज्ञान के पर्दे को हटाकर, तुम्हारे ही ज्ञान के शुद्ध प्रकाश को देखने लगते हैं|

शक्ति और शक्तिमान में कोई अंतर नहीं हो सकता| शिव “शक्ति” के कारण ही शक्तिमान बने हैं|

अब आपको ऋग्वेद में वर्णित वो सूक्त बताते हैं जिसमे किस देवता की पूजा करें का उत्तर दिया गया है|

“हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत । स दाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवायहविषा विधेम ॥ य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्यदेवाः । यस्य छायामृतं यस्य मर्त्युः कस्मै देवायहविषा विधेम ॥ यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषाविधेम ॥ यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । यस्येमाः परदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषाविधेम ॥ येन दयौरुग्रा पर्थिवी च दर्ळ्हा येन सव सतभितं येननाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवायहविषा विधेम ॥ यं करन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसारेजमाने । यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवायहविषा विधेम ॥ आपो ह यद बर्हतीर्विश्वमायन गर्भं दधानाजनयन्तीरग्निम । ततो देवानां समवर्ततासुरेकःकस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद दक्षं दधानाजनयन्तीर्यज्ञम । यो देवेष्वधि देव एक आसीत कस्मैदेवाय हविषा विधेम ॥ मा नो हिंसीज्जनिता यः पर्थिव्या यो वा दिवंसत्यधर्मा जजान। यश्चापश्चन्द्रा बर्हतीर्जजानकस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ परजापते न तवदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ताबभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन नो अस्तु वयं सयाम पतयोरयीणाम॥”

 —ऋग्वेद १०-१२१ भावार्थ:: “सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं.. अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था! छिपा था क्या, कहाँ, किसने ढ़ँक दिया था? उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था! सृष्टि का कौन है कर्ता? कर्ता है या विकर्ता? ऊंचे आकाश में रहता। सदा अध्यक्ष बना रहता। वही सच में जानता.. या नहीं भी जानता था! हैं किसी को नहीं पता, नहीं पता, नहीं है पता, नहीं है पता…!!” “वोह था हिरण्य गर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान। वो ही तो सारे भूत जाति का स्वामी महान। जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर। ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर? जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर। पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर। स्वर्ग और सूरज भी स्थिर। ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर? गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर, व्याप था जल इधर उधर नीचे ऊपर, जगा चुके वो का एकमेव प्राण बनकर, ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर? ॐ !

सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचयिता पूर्वज रक्षा कर। सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर। फैली हैं दिशाएं बहु जैसी उसकी सब में सब पर, ऐसे ही देवता की उपासना करे हम हवी देकर, ऐसे ही देवता की उपासना करे हम हवी देकर।”

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