क्या गीता का ज्ञान आज भी प्रासंगिक है?

क्या गीता का ज्ञान आज भी प्रासंगिक है?

 

श्रीमद भगवत गीता श्रुति स्मृति वेद वेदांत उपनिषद और शास्त्र पुराणों का मंथन है, इन सब का सार है| गीता के 700 श्लोकों में भारतीय दर्शन के सर्वोच्च सिद्धांतों का समावेश है|गीता हमें कर्म करने को प्रेरित करती है| गीता कहती है कि परमात्मा के इस सृष्टि चक्र में सहयोग करना मानव का धर्म है|
गीता विरक्ति की बात नहीं करती, गीता निरत होने को कहती है, यानी कर्म करते हुए भी उसमें आसक्ति नहीं रखना|गीता भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति दोनों में संतुलन की बात करती है|

 

 

गीता योनि भेद, जाति-भेद, और श्रेण-भेद के खिलाफ है|  इसलिए गीता हर व्यक्ति को समान महत्व देने की बात करती है| गीता पशु पक्षियों और जीव-जंतुओं को भी सामान दृष्टि से देखने  का संदेश देती है|गीता किसी में भेद नहीं करती| गीता भौतिक वादियों और  अध्यात्म वादियों दोनों को ही अमृत्व का प्रसाद देने की बात करती है|
 गीता सभी प्रचलित धर्म और उनके प्रवर्तक व अवतारों का समर्थन करती है| गीता कहती है श्रद्धा से व्यक्ति जिसकी भी पूजा करता है वह परमात्मा की ही पूजा करता है|गीता सभी धर्म मत पंथ संप्रदायों को एक सूत्र में बांधती है|
गीता व्यक्ति को वेद पुराण या अन्य किसी धार्मिक किताब में बंधने को नहीं कहती, गीता कहती है कि व्यक्ति गीता से भी ऊपर उठने का प्रयास करे|  और जब व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेता है गीता सहित सभी धार्मिक किताबों की उतनी ही जरूरत रह जाती है, जितनी चारों ओर पानी से भरे रहने पर कुए की|
गीता सर्वोच्च परमेश्वर की बात करती है|  गीता सभी तरह की उपासना पद्धतियों को स्वीकार करती है|  गीता कहती है कि व्यक्ति अपनी श्रद्धा के मुताबिक किसी को भी प्रतीक मानकर उसकी सेवा पूजा करे, परमात्मा उसकी बात जरूर पहुंचती है|

 

गीता इस जगत को ही जगदीश्वर कहती है, जनता को ही जनार्दन और मानवता को ही महादेव मानते हुए उनकी सेवा करने  का सृजनात्मक संदेश देती है|गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मैं यह नहीं कहता कि तू मेरे बताए मार्ग पर चल या मेरे कहने पर इसे मान ले, मैं तो केवल इतना ही कहता हूं कि इस पर विचार करके  अपनी इच्छा के अनुसार चल|
गीता अनीश्वरवादियों का भी विरोध नहीं करती| गीता का धार्मिक सिद्धांत केवल इतना है कि समस्त विश्व में जो कुछ भी है वह एकमात्र आत्म तत्व ही है और यह आत्मा घट घट में व्याप्त है|देश दुनिया के बड़े-बड़े विद्वान दार्शनिक और वैज्ञानिक विश्व में जिस तरह की एकता की बात करते हैं, ज्ञान और विज्ञान में समन्वय की जरूरत बताते हैं वह सारा भाव गीता में समाहित है|
वसुधैव कुटुंबकम यानी पूरी धरती एक कुटुंब है, पशु पक्षी सहित  सबके हित का उपदेश देने वाली गीता किसी धर्म, संप्रदाय और देश, काल तक सीमित नहीं है|गीता सीमाओं से परे मानव-मात्र का धर्म भाव है|
गीता का ज्ञान न तो विज्ञान का विरोधी है न भौतिक उन्नति का, ना ही वह संसार से विरक्त होने का उपदेश देती है| गीता में बार-बार ज्ञान के साथ विज्ञान पर भी जोर दिया गया है| गीता में तो ब्रह्म ज्ञान तक के लिए विज्ञान की जरूरत बताई गई है|
 गीता में धर्म-मर्यादा के भीतर अर्थ उपार्जन करके संयम के साथ काम उपभोग करने की आज्ञा दी गई है|गीता हमें अभय का  संदेश देती है|
गीता का संदेश सीधा सपाट भी है और बहुत गूढ़ भी| यह दर्पण की तरह है यदि आप अच्छे हैं तो आप इसमें से अमृत प्राप्त करेंगे, यदि आप बुरे हैं तो आपको इसमें से  वे सूत्र भी मिल सकते हैं जो आपके गलत कार्यों को सहायता देते दिखाई दें, लेकिन इसमें गीता की कोई गलती नहीं होगी, इसमें दोष आपका है जो उसके अर्थ को आप अनर्थ कर रहे हैं|


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