क्या योग धर्म कर्म से जुड़ा है?

योग- समाज के प्रत्येक वर्ग एवं संसार के प्रत्येक धर्म के लिए योग उपयोगी है | क्योंकि यह एक ऐसी साधना पद्धति है जिसको विश्व का कोई भी धर्म किसी न किसी रूप में अपनाये ही हुए है | चाहे वह ईसाई हो, सिख हो, हिन्दू हो, बोद्ध हो, मुस्लिम हो, पारसी हो, यहूदी हो या अन्य किसी भी धर्म का हो या फिर धर्म को न माननेवाला हो चाहे कम्मुनिस्ट हो फासिस्ट हो या नास्तिक हो | क्योंकि धर्म का और इसका कोई सम्बन्ध नहीं है |  इसका सम्बन्ध तो आत्म चेतना एवं स्वास्थ्य से है | फिर स्वास्थ्य चाहे वह शरीर का हो या मन का हो या आत्म का वह सभी प्राणियों में एक सा होता है|  उसी स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए यह योग है |
योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है- जोड़ और दूसरा है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुँचना कठिन होगा। योग दर्शन या धर्म नहीं, गणित से कुछ ज्यादा है। दो में दो मिलाओ चार ही आएँगे। चाहे विश्वास करो या मत करो, सिर्फ करके देख लो। आग में हाथ डालने से हाथ जलेंगे ही, यह विश्वास का मामला नहीं है।
योग है विज्ञान : ‘योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है-राजपथ। दरअसल धर्म लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है।’-ओशो
जैसे बाहरी विज्ञान की दुनिया में आइंस्टीन का नाम सर्वोपरि है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन हैं पतंजलि। जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त दर्शनों, विधियों, नीतियों, नियमों, धर्मों और व्यवस्थाओं में योग श्रेष्ठ है।
योग मुख्यत: हम पतंजलि के योग सूत्र को मानकर चलते हैं | और उसमे भी हम अष्टांग योग को मुख्य मानते हैं | जिसमे यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी यह इसके प्रमुख आठ अंग हैं | यह आठ अंग की प्रकार हमारी आत्म चेतना एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं?
इस अष्टांग योग में आठ अंग हैं-
यम
नियम
आसन
प्राणायाम
प्रत्याहार
धारणा
ध्यान
समाधी

 

जिसमे यम पांच हैं-
अहिंसा
सत्य
अस्तेय
ब्रह्मचर्य
अपरिग्रह
अहिंसा- अहिंसा एक बड़ा ही व्यापक शब्द है. सारे विश्व में जितने भी साम्राज्य स्थापित किये गए हैं वह सब हिंसा के द्वारा ही स्थापित किये गए हैं. किन्तु जब बात आती है अपने आपके आत्मिक साम्राज्य की तो वहां पर हिंसा नहीं अहिंसा ही काम आती है. इसलिए योग के मार्ग पर जो भी चले हैं, चाहे वह कितने बड़े से बड़े हिंसक रहे हों वह सारे अहिंसक हों जाते हैं. इस तरह से यह अहिंसा एक प्रकार से आत्मा चेतना एवं स्वास्थ्य दोनों के लिए उपयोगी है, क्यूंकि अहिंसक रहने से दूसरे के शरीर की हानि नहीं होती है और उसको मारकर अपने आत्मा में जो आत्मग्लानि होती है वह भी नहीं होती है. अतः ऐसा माना जाये की अहिंसा आत्म चेतना एवं स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी है|
सत्य- सत्य एक ऐसा शब्द है जो की आत्म चेतना को बहुत उचाईयों तक ले जानेवाला है किन्तु इसकी साधना सबसे कठिन है. इसकी साधना करने के सम्बन्ध में राजा हरिश्चंद्र की गाथा सबसे कारगर सिद्ध होती है. सत्य जैसा अष्टांग योग के एक अंग का एक भाग मात्र ही व्यक्ति के जीवन में उसकी आत्म चेतना को बहुत ऊंचाई तक पहुंचानेवाला होता है, किन्तु सत्य का साधक संसार में कोई विरला ही देखने में आता है|
अस्तेय- अस्तेय यानी चोरी न करना. यह आत्म चेतना के विकास का मंत्र है, इस छोटे से शब्द को समझने वाले की आत्म का विकास धीरे-धीरे होता है किन्तु जो भी होता है वह बहुत ही मजबूत एवं उसका अपना होता है|
ब्रह्मचर्य- यम के अंतर्गत ब्रह्मचर्य अपने आपमें सब कुछ समाये हुए है.  सबसे पहले इसको समझने की बात है. इसके सम्बन्ध में विश्व भर में कई प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं, सारे योग का आधार इसी एक चीज पर टिका है. इसलिए इसको बहुत सूक्ष्मता एवं गहनता से समझना होगा, क्यूंकि यह आत्म को ब्रह्म बना देता है. यानी सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी भगवन बना देता है. पुरुष को भी पुरुषोत्तम बना देता है. यह शारीर के स्वास्थ्य से लेकर के और आत्म के चैतन्य तक इसी का बोलवाला है. यह शारीर एवं चेतना को एक रखता है. इसके आभाव में शारीर अलग और चेतना अलग से प्रतीत होने लगते हैं और चेतना को शारीर बोझ लगने लगता है. इसलिए योग के साधक की चर्या ब्रह्म के जैसे होनी चाहिए|
अपरिग्रह- अपरिग्रह में आवश्यकता से अधिक वस्तुवों का संग्रह न करे. साधक जिससे उसकी आत्म चेतना की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़ेगी. क्यूंकि अगर साधक ज्यादा वस्तुवों का संग्रह करेगा तो वो चोरों को आमंत्रण देगा. और सदा ही उसकी चेतना में चोरी होने का भय रहेगा, जिससे वह साधना में न लग पायेगा. साधक को चाहिए की वह अपरिग्रह का पालन करे|
नियम भी पांच होते हैं-
शौच
संतोष
तप
स्वाध्याय
ईश्वर प्रणिधान
शौच-  शारीर की शुद्धि एवं स्वास्थ्य के लिए है|
संतोष- आत्म की संतुष्टि के लिए|
तप-  तप से साधक, असाध्य वस्तु को भी साध्य बना लेता है|
स्वाध्याय- स्वाध्याय से वह आत्म चिंतन करता है|
ईश्वर प्रणिधान-  यह सारे कार्य ईश्वर के अधीन होने से सब कार्यों का साक्षी एवं करता ईश्वर को ही बनाया जाता है, इससे ईश्वर प्रणिधान है|
आसन- साधक के शारीर सम्बन्धी अवयवों को चुस्त-दुरुस्त रखने का काम करता है| संसार में ८४ लाख योनियों हैं तो उतने ही आसन हैं, किन्तु योग सूत्र में कुछ खास आसनों को ही लिया गया है इन आसनों के प्रभाव से शारीर में लचीलापन एवं ताजगी रहती है तथा साधक थकावट महसूस नहीं करता है|
प्राणायाम- प्राणायाम शारीर एवं आत्म का सेतु है यह शारीर और आत्म दोनों को जोड़ता है तथा साथ-साथ में उनमें एकत्व को लाता है. जिसमे प्राण अधिक होता है उस साधक को यह नहीं लगता कि शारीर और आत्म अलग-अलग हैं. उसको यह प्रतीत होता है कि दो है ही नहीं वही आत्मा है और वही शारीर है. प्राण बलवर्धक है यह साधक को बल प्रदान करता है. इसलिए प्राण का उपयोग बड़ी सावधानी के साथ करना चाहिए क्यूंकि यह साधक को निर्धारित मात्रा में मिला हुआ है| और बहुत ही संवेदनशील है|  प्राण का सही उपयोग साधक को साधना में बहुत उन्नति प्रदान करता है और गलत उपयोग शारीर और आत्मा को बहुत नुक्सान पहुंचता है, जिसका फिर कहीं पर भी उपचार उपलब्ध नहीं है|
प्रत्याहार- प्रत्याहार एक ऐसी अवस्था है जो साधक कि चेतना को और चेतनता प्रदान करती है और साधक अन्य जनों से एक अलग ही पहचान रखने लगता है, क्यूंकि यम, नियम, आसन, और प्राणायाम के लगातार उपयोग से साधक में चेतना का संचार बड़ जाता है| जिससे साधक के शारीर एवं आत्म में अमूल चूल परिवर्तन होने लगता है और विश्व कि प्रत्येक वस्तु उसे आसानी से उपलब्ध होने लगती है, यही पर साधक कि परीक्षा शुरू होती है कि वह विश्व को चाहता है कि आत्म को चाहता है, अगर साधक विश्व को चाहता है तो वह विश्व कि सारी वस्तुओं को एकत्र करने लगता है, और धीरे-धीरे उन्हीं को सत्य मानने लगता है और उसी में अपनी साधना का सम्पूर्ण श्रम लगा देता है . जिससे उसकी साधना कमजोर पड़ जाती है. और उसे पुनः यहाँ तक पहुँचने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. किन्तु जो साधक विश्व कि वस्तुवों को एकत्र नहीं करता है और अपनी साधना को और आगे बढाता जाता है तो उसे धारणा कि उपलब्धि होती है|
धारणा- जब साधक सम्पूर्ण रूप से चेतना कि साधना को करने लगता है तो उसकी चेतना एक विशेष स्थान पर एकत्र हों जाती है, और शक्ति को धारण करती है, उसी को धारणा कहते हैं. इसमें आत्म चेतना का विस्तृत विकास होता है जो कि साधक के शारीर से दिखाई पड़ता है. एवं साधक में स्थिरता आने लगती है और वह एक ऐसे स्थान कि खोज में होता है, जहाँ वह आगे वाले पद यानी ध्यान को सार्थक कर सके. धारणा से धीरे-धीरे साधक समाज से कटने सा लगता है और अंतर्मुखी हो जाता है, यही अंतर्मुखी कि साधना उसे ध्यान तक पहुंचती है |
ध्यान- ध्यान के सम्बन्ध का जो सूत्र दिया गया है वह है तत्र प्रत्यैक्तानता ध्यानम अर्थात साधक का एक तान में लग जाना ही ध्यान है, ध्यान में साधक अब शारीर एवं आत्म, दो अलग नहीं रहे वह दोनों एक हों गए हैं और इस एकत्व के कारण साधक को किसी अन्य प्रकार कि अवस्था का भान भी नहीं होता, वह सम्पूर्ण रूप से एक ही तान में लगा रहता है, उस साधक में एक ही धुन बजती है, उसी को वह तान देता है इसी का नाम ध्यान है|
समाधि- इस सम्पूर्ण साधना का फल, समाधि है अब सब कुछ सम हो गया, साधक अब आनंद में है|

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