ईश्वर को बाहर नही अन्दर खोजे: आचार्य सरयूनंदन

ईश्वर को बाहर नही अन्दर खोजे

विश्वास का अज्ञान हटाए, फिर शुरू होगी जिज्ञासा की यात्रा

आचार्य सरयूनंदन

Religion newspuranईश्वर की खोज मानव सभ्यता के साथ ही प्रारंभ हुई है| अनेक ध्यानी, ज्ञानी, आध्यात्मिक और धार्मिक लोग इस खोज में लगे हुए हैं हमारे वेद पुराण और दूसरे धार्मिक ग्रन्थ ईश्वर के स्वरूप की ओर इंगित करते हैं| 
इन्हीं से एक विश्वास बना और सनातन धर्म के धर्मावलंबियों की पीढ़ियों से यह मान्यता रही है कि ईश्वर निराकार है ईश्वर ने ही ब्रह्मांड की रचना की है, आत्मा अमर है आत्मा कभी नहीं मरती है, जन्म और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है, यह सारी मान्यताएं धार्मिक ग्रंथों और पूर्वजों से हमने ग्रहण की है| यह मान्यताएं सही है, ऐसा विश्वास हम सभी करते हैं|



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विज्ञान प्रयोग के बाद परिणाम की अनुभूति और अनुभव को ही स्वीकार करता है| हमारे अनेक ऋषि-मुनि देवता सिद्ध पुरुषों ने अपनी तपस्या और ध्यान से ऐसी अनुभूतियां पाई है जो उन्हें ईश्वर के स्वरूप का दर्शन कराती है|
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईश्वर सर्वव्यापी है| हमारे आसपास ही ऐसे तथ्य उपस्थित हैं उनको यदि हम वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो ईश्वर की उपस्थिति का साफ एहसास होता है|




God Newspuranबागवानी करते हुए जब आप भी बीज लगाते हैं तो बीज में छिपा वृक्ष दिखाई नहीं देता| इसी प्रकार दूध से घी बनता है लेकिन दूध में घी दिखाई नहीं देता, तिल मैं तेल क्या दिखाई देता है| फूल की खुशबू क्या दिखाई देती है| शरीर में कोई रोग हो तो क्या उसकी पीड़ा दिखाई देती है| हवा क्या दिखाई देती है| अग्नि जलने के पहले क्या दिखाई देती है| जेल की शीतलता क्या दिखाई देती है| 

यह सारी चीजें हमारे आस-पास होती हैं हम उनका उपयोग और उपभोग करते हैं लेकिन एक प्रक्रिया करने के बाद यह उपभोग के लिए हमें मिलती है| हमारे शरीर में ऊर्जा है वह क्या दिखाई देती है| यह सब चीजें दिखाई नहीं देती फिर भी है इसी प्रकार ईश्वर दिखाई नहीं देता, लेकिन ईश्वर है


Ramayana Newspuranईश्वर के होने में कोई संदेह नहीं है लेकिन अब प्रश्न यह है कि हमारे शास्त्र हमारे देवता हमारे धर्म ग्रंथ जो हमें बता रहे हैं उनको हम मान ले या शास्त्रों के ज्ञान को महसूस करने के लिए हम अपनी खोज करें अपना प्रयास करें और फिर जो अनुभव करें जो अनुभूति हो वह हमारी हो और हम अपने अनुभव से यह दावा कर सकें कि ईश्वर कहां है और कैसे हैं| जो हमने महसूस किया है और अनुभूत किया है वही सत्य है| ईश्वर और सत्य खोजने के रास्ते का पहला सवाल है कि मैं कौन हूं| 

तमाम सारी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद आज भी हम जन्म और मृत्यु के रहस्य को समझने में नाकाम रहे इसी रहस्य के साथ हमारा पूरा जीवन जुड़ा हुआ है इस रहस्य को कोई वैज्ञानिक शायद ही खोज पाए| यह तो हर इंसान अपने प्रयास से ही कर सकता है| अभी क्या हो रहा है कि हम कौन हैं इस प्रश्न के उत्तर शास्त्रों में और हमारे धर्म ग्रंथों में इंगित है इन्हीं पर विश्वास कर हम अपनी मान्यता और धारणा बना लेते हैं और हम समझ ही नहीं पाते कि मैं कौन हूं| मेरा इस धरती पर आने का उद्देश्य क्या है और मेरी मृत्यु होगी तो उसके बाद क्या होगा| यह सारे प्रश्न खोज का विषय है| यह तभी संभव होगा जब आपने प्रबल जिज्ञासा होगी और जिज्ञासा कब होगी जब आप जो भी आपको ज्ञान या जानकारी दी गई है या आप ने पढ़ा है वह भूल जाएंगे तभी तो आपका मस्तिष्क विचार करेगा कि मैं कौन हूँ जब पहले से ही उसका उत्तर आपके पास उपलब्ध होगा तो फिर खोज आप क्यों करेंगे|

हमारी सार्वभौमिक धर्म ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं सब जगह समान रूप से विद्यमान हैं परंतु सबके हृदय में मेरी विशेष उपस्थिति है| यजुर्वेद और उपनिषद में भी ऐसी ही बातें कही गई हैं कि ईश्वर एक ही है और वह सब प्राणियों में अंदर छिपा हुआ है| ऐसा माना जाता है कि आत्मा के रूप में हर प्राणियों में ईश्वर उपस्थित है यदि आप ईश्वर को खोजने के लिए लालायित हैं तो आपको अपने सारे ज्ञान और विश्वास को तिलांजलि देना होगा खुद से यह प्रश्न करना होगा कि मैं कौन हूं| 

यह प्रश्न आपके मन को विचार एवं ध्यान मग्न करेगा| इस प्रक्रिया में जितनी गहराई में आप जाते जाएंगे तो आपको रास्ता अपने आप मिलता और खुलता जाएगा| एक महान संत हुए हैं उनकी प्रसिद्ध कहानी है वह एक बार किसी गांव के चातुर्मास कर रहे थे आस-पास के गांव में उनकी काफी प्रसिद्धि हो गई थी| वहां के कुछ प्रबुद्ध लोगों के मन में आया कि पहुंचे हुए संत भाग्य से मिले हैं क्यों नहीं इनसे ईश्वर तक पहुंचने के मार्ग को जान जाए|

Sant Newspuranगांव के कुछ लोग आये और उन्हें मंदिर में ले गए और पूछा कि ईश्वर कहां रहता है और कैसे मिलेगा संत ने प्रश्न किया कि आपकी पहचान क्या है सभी ने अपने अपने नाम बताएं अपनी पद प्रतिष्ठा का विवरण दिया फिर संत ने पूछा आप के सबसे करीब क्या है किसी ने कपड़े बताए किसी ने साँस बताई किसी ने किसी आत्मा बताई| 

फिर संत ने आत्मा के बारे में जब पूछा तो सब ने कहा की आत्मा अमर है आत्मा कभी नहीं मरती, शरीर मरता है| संत ने फिर सवाल किया कि आप जो कह रहे हैं इसका क्या आपने अनुभव किया है सबने एक साथ उत्तर दिया नहीं हमने तो अपने शास्त्रों में और अपने बुजुर्गों से जो सुना है वह आपसे निवेदन कर रहे हैं संत ने कहा, जब आपको ऐसा विश्वास है तो फिर आप को खोजने की क्या जरूरत है| अगर आप खुद ईश्वर को जानना चाहते हैं तो फिर विश्वास के इस अज्ञान को हटाना पड़ेगा|

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ऐसी ही एक और कहानी है जो ईश्वर से जुड़े हुई हैं आजकल हम ईश्वर से अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान की मांग करते हैं पूरे विश्व से आ रही मांगों को देखते हुए ईश्वर परेशान हो गया ईश्वर ने सोचा की अब ऐसी कौन सी जगह पर हैं जहां हमें लोग परेशान नहीं करें| हम शांति से रहे सोच विचार कर ईश्वर ने यही डिसाइड किया कि हम मनुष्य के हृदय मैं ही रहने लगते हैं| 

ईश्वर मनुष्य के हृदय में रहने लगा और मनुष्य ईश्वर को शास्त्रों, तीर्थों और न जाने कहां कहां खोजने लगा| ईश्वर हृदय में है उसको खोजने के लिए अपने हृदय में झांकना पड़ेगा| ऐसी साधना और ध्यान करना पड़ेगा जैसे दूध से घी बनाने के लिए दूध को उबाला जाता है दही बनाई जाती है दही को मथा जाता है फिर भी निकलता है हमें राग द्वेष पाखंड को छोड़ते हुए अपने अंदर झांकना होगा हमें ईश्वर अंदर ही मिलेगा शास्त्र या तीर्थों में ईश्वर नहीं मिलेगा|

Priyam Mishra



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