दूसरों को अपनी बात समझाना बहुत बड़ी कला, जाइए स्वामी विवेकानंद क्या कहते हैं.. दिनेश मालवीय

दूसरों को अपनी बात समझाना बहुत बड़ी कला, जाइए स्वामी विवेकानंद क्या कहते हैं.. दिनेश मालवीय
dineshअपनी बात, अपने भाव, अपना पक्ष और अपना मकसद दूसरों को समझाना बहुत बड़ी कला है. यह ऐसा हुनर है कि, जिसके पास होता है, उसकी कामयाबी की राह आसान हो जाती है. अनेक लोग ऐसे मिलते हैं, जिनके पास बहुत ज्ञान होता है, लेकिन वे इसे दूसरों को नहीं समझा पाते. कई बार ऐसा भी होता है कि, व्यक्ति की किसी बात का वह आशय नहीं होता, जो दूसरे समझ लेते हैं. वह बहुत कोशिश करने पर भी अपना आशय नहीं समझा पाता. वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं होता. किसी बात या विषय को ख़ुद समझना और बात है और उसे दूसरों को समझाना बिल्कुल अलग बात. यही बात शिक्षकों के मामले में बहुत स्पष्ट हो जाती है. कुछ शिक्षक ऐसे होते हैं, जो विषय को इस तरह समझाते हैं, कि क्लास का को विद्यार्थी यह नहीं कह सकता कि, उसके समझ में नहीं आया. महान उर्दू शायर फिराख गोरखपुरी यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे. लेकिन जब वह पढ़ाते थे, तो क्लास के बाहर वे विद्यार्थी भी खड़े होकर उन्हें सुनते थे, जो अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थी नहीं होते थे. वहीं ऐसे भी उबाऊ शिक्षक होते हैं, जिनके विद्यार्थी उनका पीरियड ख़त्म होने का इंतज़ार करते हैं.

अपनी बात दूसरों तक ठीक से पहुँचाने को ही आज की भाषा में communication skill कहा जाता है. कोई किसी भी फील्ड में हो, अगर उसकी यह skill अच्छी है, तो उनकी सफलता  पक्की है. किसी भी बड़े काम को करने के लिए एक टीम होती है. टीम के हरसदस्य तक यदि लीडर अपनी बात ठीक से पहुंचाता है, तो कार्य की सफलता में कोई संदेह नहीं रहता. स्वामी विवेकानंद में अपनी बात को समझाने कि अद्भुत कला थी. अपनी इसी कला के कारण वह अमेरिका के शिकागो में आयोजित “धर्म संसद” में उपस्थित उस समय के महान विद्वानों और प्रबुद्ध श्रोताओं को अपनी बात इस प्रकार समझा सके कि, हर कोई उनका और भारत के धर्म-दर्शन की ऊंचाई का कायल हो गया. इसके बाद तो उन्होंने अनेक देशों में वेदांत दर्शन को समझाकर भारत के सम्बन्ध में लोगों की गलत धारणाओं को निर्मूल किया.

स्वामी विवेकानंद १

स्वामीजी कहता थे कि, अपने कौशल से दूसरों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए.  दूसरों को समझाने का हुनर यदि हमारे पास हो, तो हम दूसरों को किसी ख़ास तरीके से काम करने के लिए मोटिवेट कर सकते हैं. टीम के सभी सदस्यों को अपनी-अपनी भूमिका आपको बहुत अच्छी तरह  बता सकते हैं. वह कहते हैं कि, समझाना और चतुराई करना एक ही बात नहीं है. समझाना एक सकारात्मक प्रक्रिया है, जबकी चतुराई से काम करवाना एक नकारात्मक तरीका. स्वामीजी अपनी बात को ठीक से संप्रेषित करने में कहानियों और रूपकों के उपयोग को बहुत अहम् मानते हैं. हम स्वयं देखते हैं कि, जो प्रवचन करने वाले या व्याख्यान देने वाले लोग सुन्दर प्रासंगिक कहानियाँ सुनाते हैं, वे बहुत लोकप्रिय  हो जाते हैं. भारत में वेदों के मर्म को आम लोगों को समझाने के लिए ही पुराणों में कथाओं को सबसे प्रमुख स्थान दिया गया है. स्वामीजी एक और मंत्र यह देते हैं कि, हमें किसीके पीछे नहीं पड़ना चाहिए. किसी को बलपूर्वक दबाना भी नहीं चाहिए.  स्वामी विवेकानद सलाह देते हैं कि आप निर्भीक शेर की तरह दृढ़ता से काम करो, लेकिन इसके साथ ही आपका मन फूल की तरह कोमल होना चाहिए.

स्वामी विवेकानंद

दूसरों को समझाने के लिए वह कुछ बहुत प्रभावी सुझाव देते हैं. उनके अनुसार पहले लोगों का विशवास  अर्जित कर उन्हें इतना अपना बना लेना चाहिए कि, आप उनसे अधिकारपूर्वक कुछ कह सकें.  उन्हें आपकी सदाशयता के प्रति आश्वस्त होना चाहिए. जिन लोगों को आप कुछ समझा रहे हैं, यदि उनका आप पर विश्वास नहीं है, तो आपकी बात उनके मन में नहीं बैठ पाएगी. उन्हें आपकी क्षमता पर भी भी भरोसा होना चाहिये कि, जो  आप समझा रहे हैं, उसे स्वयं भी ठीक से समझते हैं और करने में सक्षम हैं. इसके अलावा, व्यावहारिक दक्षता बहुत ज़रूरी है. कब किससे क्या और कैसे बात करना है, और कब क्या नहीं कहना या करना चाहिए, यह बहुत अच्छी तरह समझना ज़रूरी है. हमें यह समझना चाहिए कि, हमारी किसी बात या व्यवहार से किसी का अपमान तो नहीं हो रहा.

स्वामीजी ने पूरी दुनिया के दर्शन और साहित्य का गहरा और व्यापक अध्ययन किया था,इसीलिए उनका मानसिक क्षितिज बहुत व्यापक था. वह सभी से अधिक से अधिक अध्ययन करने के लिए कहते हैं. स्वामीजी लोगों से अच्छा वक्ता बनने के लिए अभ्यास करने को कहते हैं. यह ऎसी कला है जो सभी को आपकी ओर सहज ही आकर्षित कर लेती है. इसमें बनावट नहीं हो, लेकिन अभ्यास से इसे आकर्षक ज़रूर बनाना चाहिए. इसके अलावा, आप पहले जो कर चुके हैं, उस पर भी समीक्षात्मक विचार करने की ज़रुरत है. आपको हमेशा ऐसा नहीं सोचना चाहिए
कि, आपने जो कह दिया, बस वही सही है. आप अपने द्वारा कही हुयी बात के प्रभाव के आधार पर समीक्षा भी करें. यदि आवश्यक हो तो उसमें सुधार भी करें. यह बात आज बड़े-बड़े शिक्षण संस्थाओं में भी बतायी जाती है कि अपनी बात को कैसे बेहतर तरीके से कम्यूनिकेट करें. इसके लिए बाकायदा पाठ्यक्रम और समय निर्धारित हैं. यूं समझना चाहिए कि, किसी भी फील्ड में यह skill सबसे बड़ी आवश्यकता है.


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