यह ‘ग्रीन ब्लड’ पीना है अमृतपान जैसा -दिनेश मालवीय

यह ‘ग्रीन ब्लड’ पीना है अमृतपान जैसा

-दिनेश मालवीय

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हमारे आसपास बहुत-सी ऎसी चीज़ें होती हैं, जिनके  महत्त्व को हम नहीं जानते. उनके गुणों को न जानकार हम उनके लाभ से वंचित हो जाते हैं. हमारे बुजुर्ग इनके गुणों को जानते थे और इनका भरपूर उपयोग कर प्राकृतिक रूप से सेहतमंद रहते थे. उस वक्त न तो इतने डॉक्टर थे और न इतनी मेडिकल फेसिलिटीज. एलोपेथी चिकित्सा पद्धति तो बहुत बाद में आयी. इसके विस्तार के साथ सेहत पर इसके बुरे प्रभावे भी सामने आ गये. हमारे बुजुर्ग सेहतमंद रहने के लिए आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी-बूटियों के उपयोग पर ही ज्यादा निर्भर रहते थे.
Green Blood
ऐसी बहुत बहुमूल्य और गुणकारी चीज़ों में गेहूँ के छोटे-छोटे पौधों का रस यानी wheat grass juice शामिल है. अनेक अनुसंधानों में इसके गुणों की पुष्टि की जा चुकी है. यह बहुत anti oxident और अपने गंभीर रोगों में बहुत राहत देने वाला रस है. इसको पीने से भगंदर, बवासीर, शुगर, गठिया, पीलिया, दमा के साथ ही अनेक पुराने रोगों को ठीक किया जा सकता है. बुढ़ापे कि कमज़ोरी को दूर करने में तो इसका जबाव ही नहीं है.

इसके अद्भुत चिकित्सकीय गुणों को देखते हुए इसे ‘ग्रीन ब्लड’ कहा जाता है. कहते हैं कि गेहूँ के छोटे पौधों का रस मनुष्य के खून से लगभग 40 प्रतिशत मेल खाता है. इस रस को तैयार करने का तरीका बहुत आसान है. इसे हर कोई अपने घर में बहुत सरलता से बना सकता है. रोज़ ताज़ा रस निकालिए और पीजिये.

मिट्टी के गमलों या चीड़ के बक्सों में अच्छी मिट्टी भरकर उसमें बारी-बारी से कुछ अच्छी गुणवत्ता के गेहूँ के दाने बो दीजिये. बर्तन को छाया में या कमरे में रखकर थोड़ा-थोड़ा पानी देते रहिये. इसे धूप मत लगने दीजिये. करीब चार दिन में पौधे उग आएँगे. आठ-दस दिन में इनकी ऊँचाई करीब 7-8 इंच हो जाएगी. उस वक्त आप उनमें से पहले दिन के बोये हुए 35-40 पौधे जड़ के साथ काटकर फेंक दीजिये. बचे हुए डंठल और पत्तियों यानी ग्रीन ग्रास को धोकर साफ़ पत्थर पर थोड़े पानी के साथ पीसकर करीब आधा गिलास रस निकाल लीजिये. ताज़ा रस पीजिये या रोगी को पिलाइए. कुछ ही दिनों में मरीज़ को नया जीवन मिलने जैसा अहसास होगा. वह पूरी तरह सेहतमंद भी हो सकता है.

अगर आप रस निकालने में कठिनाई महसूस करें, तो इन पौधों को चाकू से बारीक काटकर खाने के साथ सलाद के रूप में भी खा सकते हैं. बहरहाल इसके साथ कोई फल आदि न मिलाएँ. शाक-सब्जी मिलाई जा सकती है. यह कुदरत की ऐसी देन है, जिसके आगे बहुत महंगी दवाएँ और डॉक्टर भी फीके पड़ जाएँगे. लेकिन एक बात का ध्यान रखना ज़रूरी है कि पौधे 8 इंच से ज्यादा हो जाने पर उपयोग के लायक नहीं रह जाते. इसलिए इन्हें 10-12 गमलों या चीड़ के बक्सों में रखकर बारी-बारी से रोजाना एक-दो गमलों से दाने बोना होगा. जैसे-जैसे गमले खाली होते जाएँ, वैसे-वैसे दाने बोते चले जाइए. इस प्रकार इस तरह के पौधे पूरे साल उगाये जा सकते हैं.

रस निकालकर ज्यादा देर नहीं रखना चाइये. इसे ताज़ा पीना ही लाभदायक है. कुछ घंटे रखे रहने पर इसकी गुणवत्ता ख़त्म हो जाती है. इसके अलावा, एक काम और किया जा सकता है. आधा कप गेहूँ लेकर धो लें. उसे किसी बर्तन में डालकर दो कप पानी डाल दें. बारह घंटे बाद वह पानी निकलकर सुबह-शाम पीया जा सकता है. बचे हुए गेहूँ को स्वादिष्ट बनाकर वैसे भी खाया जा सकता है. कुछ लोग इसका हलवा भी बना लेते हैं. कुछ लोग इन्हें सुखाकर आटा पिसवा लेते हैं. इस तरह ‘आमके आम गुठलियों दे दाम’ की कहावत चरितार्थ हो जाती है.

इस अमृत जैसे रस के महत्त्व और इसे तैयार करने की विधि दूसरों को बताकर समाज की बहुत बड़ी सेवा की जा सकती है.

हमारे ऋषियों ने सेहतमंद चीज़ों को पूजा-पाठ में शामिल कर उनके महत्त्व को प्रतिपादित किया है, ताकि लोग इन्हें भूल न जाएँ. इनमें तुलसीदल, बेलपत्र, चन्दन, गंगाजल, गोमूत्र, तिल, शहद, रुद्राक्ष इत्यादि शामिल हैं.


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