जब ऋषियों ने शबरी से क्षमा माँगी -दिनेश मालवीय

जब ऋषियों ने शबरी से क्षमा माँगी

-दिनेश मालवीय

यह कथा हमारी उस श्रेष्ठ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें व्यक्ति की जाति, कुल और वर्ग से अधिक उसके गुणों को महत्त्व दिया जाता है. शबरी ने भगवान की सच्ची भक्ति से चित्त की ऐसी ऊँची अवस्था प्राप्त कर ली थी, जिसके आगे ऋषियों को भी उसके आगे नतमस्तक होकर भगवान श्री राम के सामने उससे क्षमा माँगनी पड़ी. इसी प्रसंग का सम्बन्ध छत्तीसगढ़ के प्रसिद्द शबरी नारायण मंदिर से भी है.

हुआ यूँ था कि महर्षि मतंग ने भी लजाति में उत्पन्न शबरी के उत्तम भक्ति-भाव और चित्त की अच्छी अवस्था को देखकर अपने ही आश्रम में उसे पर्णकुटी बनवाकर रहने की अनुमति दे दी थी. आस पास रहने वाले कुछ ऋषियों को यह बात अच्छी नहीं लगी थी, क्योंकि वे ऋषियों की तरह रह अवश्य रहे थे, लेकिन उनके चित्त की शुद्धि नहीं हुयी थी. लेकिन मतंग ऋषि का प्रभाव इतनाथा कि सब मन मसोस कर रह गये.

महर्षि मतंग जब परम धाम चले गये, तब शबरी उनके कहे अनुसार भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा में अपने शरीर को रखे रही. वह पहले की तरह ही सुबह बहुत जल्दी उठ कर उस मार्ग को झाड़-बुहार देती थी, जिससे होकर ऋषिगण सरोवर में स्नान करने जाते थे. एक दिन उसे किसी कारण से देर हो गयी. ऋषि लोग जब बिना बुहारे हुए मार्ग से जाने लगे तब शबरी को बहुत कष्ट हुआ. मार्ग संकीर्ण था, जिसके कारण किसी ऋषि का कोई अंग शबरी से ज़रा-सा छूगया. ऋषियों ने उसे बहुत बुरा-भला कहकर उसका अपमान किया. शबरी भागकर अपनी कुटी में आ गयी.

ऋषि लोग पुन: स्नान करने के लिए गये, तो सरोवर में प्रवेश करते ही उसका जल अनेक कीड़ों से भरा हुआ खून के समान हो गया. इससे ऋषियों को लगा कि शबरी का स्पर्श करने से सरोवर का जल अपवित्र हो गया है. उन्हें यह रहस्य समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ. वे सरोवर को पवित्र करने के लिए यज्ञ-हवन आदि करने पर विचार करने लगे. फिर उन्होंने सोचा कि श्रीराम इस मार्ग से आने वाले हैं, लिहाजा उन्हीं से सरोवर के अपवित्र होने का कारण और उसे शुद्ध करने का उपाय पूछेंगे.

भगवान श्रीराम शबरी की कुटिया में पधारे. ऋषियों को इसका पता चलते ही वे तुरंत वहाँ पहुँच गये. उन्होंने भगवान से सरोवर को शुद्ध करने का उपाय पूछा. भगवान ने कहा कि आप शबरी का चरण-स्पर्श करिए. उसके बाद सरोवर के जल से इनके चरणों का स्पर्श कराइए. जल तुरंत पवित्र हो जाएगा. भगवान की आज्ञा मानकर ऋषियों ने ऐसा ही किया. सरोवर का जल तत्काल पहले से भी अधिक निर्मल हो गया. भक्ति की ऐसी महिमा देखकर ऋषियों के ह्रदय प्रेम से द्रवित हो गये.

शबरी की इस महिमा को देखकर ऋषियों ने भगवान के सामने शबरी से और इस अपराध के लिए भगवान से क्षमा माँगी. भगवान ने शबरी-नारायण मंदिर बनाने और सेवा-पूजा करने की आज्ञा दी. छत्तीसगढ़ में आज भी वह शबरी नारायण मंदिर मौजूद है, जहाँ बड़ी संख्या में लोग बहुत श्रद्धा के साथ दर्शन-अर्चन करने के लिए आते हैं. यह बहुत प्रसिद्ध पर्यटक स्थल भी है.

इस कथा के सन्देश के समर्थन में बृहद नारदीय पुराण का एक श्लोक सहज ही याद आता है कि-

"चाण्डालोअपि मुनिश्रेष्ठविष्णुभक्तोद्विजाधिक: /विष्णुभक्तिविहीनश्च श्वपचवाधिक:"

अर्थात ईश्वर के प्रति एकान्तिक भक्ति के कारण भक्तिमान चाण्डाल भी ब्राह्मण से बढ़कर है और ईश्वर भक्ति विहीन ब्राहमण भी चाण्डालाधम  है.

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