जड़ भरत-दिनेश मालवीय

जड़ भरत

-दिनेश मालवीय

सनातन धर्म के साहित्य में में ‘जड़ भरत’ की कथा बहुत प्रसिद्ध है. इस कथा का संदेश यह है कि व्यक्ति को जीवन में थोड़ा-सा भी मोह नहीं पालना चाहिए. जीवन में वांछित भोग करते हुए और सारे रिश्ते-नाते निभाते हुए भी किसी भी वस्तु, व्यक्ति अथवा सम्बन्ध में आसक्त नहीं होना चाहिए.

प्राचीन काल में भरत नाम के एक महाप्रतापी राजा हुए, जो भगवान के अनन्य भक्त भी थे. उनके नाम से ही इस देश का नाम ‘भारत वर्ष’ पड़ा. वृद्ध होने पर वह राजपाट अपने पुत्रों को सौंपकर शालग्राम वन में तपस्या करने चले गये. एक बार उन्हें नदी में डूबता एक मृग दिखा. उन्होंने उसे बचा लिया और अपने आश्रम में रख लिया. उन्हें उससे बहुत आसक्ति हो गयी. मरते समय जैसा भाव होता है, वैसा ही अगला जन्म होता है. भरत को मृत्यु के समय हिरण के प्रति बहुत आसक्ति थी.

लिहाजा उन्हें मरने के बाद हिरण का शरीर मिला. हिरण का शरीर त्यागने पर वह एक उत्तम ब्राह्मण कुल में जड़ भरत के रूप में जन्मे. उनके पिता अंगिरस गोत्र के वेदपाठी, सदाचारी और आत्मज्ञानी व्यक्ति थे. भगवान् की कृपा से जड़ भरत को अपना पिछले जन्म की स्मृति रही. फिर से मोहजाल न फंसें, इसके लिए उन्होंने बचपन से ही वैराग्यपूर्ण जीवन को अपना लिया. उन्होंने अपना स्वरूप जान-बूझकर उन्मत्त, जड़, अंधे और बहरे के समान बना लिया. वह इसी तरह निश्चिन्त होकर इधर-उधर भ्रमण करते थे. पिता ने समय आने पर उनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर और उन्हें शौचाचार की शिक्षा दी. लेकिन आत्मनिष्ठ भरत जान-बूझ कर पिता की इच्छा के विपरीत आचरण करते थे.

पिता हार गए और अपने पुत्र को विद्वान बनाने की आशा के साथ ही दुनिया से चल बसे. पिता की मृत्यु के बाद इनके अज्ञान से ग्रस्त सौतेले भाइयों ने इन्हें निकम्मा समझकर उनके हाल पर छोड़ दिया. उनके वास्तविक स्वरूप को न जानकार लोग उन्हें जड़, उन्मत्त आदि कहकर इनकी अवहेलना करने लगे. वह परमहंस वृत्ति में रहते थे. जो मिल जाए सो खा लिया, जो काम मिला सो कर लिया, मन हुआ तो भिक्षा माँग कर पेट भर लिया. उन्हें भोजन के स्वाद तथा इन्द्रियों की तृप्ति में कोई रुचि नहीं थी. वह मान-अपमान, जय-पराजय, लाभ-हानि आदि के द्वंद्व से ऊपर थे. सुख-दुःख, गरमी-सर्दी आदि उन्हें विचलित नहीं करते थे. शरीर पर ध्यान न देने के कारण उनका वेष मलिन हो गया. लेकिन उनके भीतर ब्रह्मतेज था. लोग उनका तिरस्कार करते थे, लेकिन वह इससे बिल्कुल विचलित नहीं होते थे.

एक दिन लुटेरों के सरदार ने संतान की कामना से देवी भद्रकाली को नरबलि का संकल्प लिया. उसने इसके लिए किसी मनुष्य को पकड़कर मँगवाया, लेकिन वह भय के कारण भाग निकला. उसे ढूँढने निकले लोगों की नज़र जड़ भरत पर पड़ी, जो टांड पर खड़े कर हिरण, सूअर आदि जानवरों से खेत की रखवाली कर रहे थे. उन्होंने जड़ भरत को पकड़ लिया और बांधकर देवी के मंदिर में ले गए. उन्होंने उनकी बलि की तैयारी कर ली. उन्हें नहला-धुलाकर, पुष्पों आदि से सज्जित कर देवी के आगे ले जाकर बैठा दिया. इसके बाद पुरोहित ने मंत्र पढ़ना शुरू किया. उसने उनकी गर्दन काटने के लिए तलवार उठायी. लेकिन उसी समय मूर्ति में से एक भयंकर शब्द हुआ और साक्षात भद्रकाली ने मूर्ति से प्रकट होकर पुरोहित के हाथ से तलवार छीन ली और उसीसे पुरोहित का सिर काट दिया.

एक दिन सिन्धुसौवीर देशों का राजा रहूगण तत्वज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से कपिलमुनि के आश्रम जा रहा था. इक्षुमती नदी के तट पर पालकी उठाने वालों में एक कहार की कमी पड़ गयी. दैवयोग से वहाँ महात्मा जड़ भरत आ पहुँचे. कहारों ने देखा कि यह स्वस्थ नौजवान पालकी ढोने के लिए उपयुक्त होगा. वे उन्हें जबरदस्ती पकड़ कर ले गये और अपने साथ पालकी ढोने के काम में लगा दिया.  पालकी उठाकर चलने में हिंसा न हो जाए, इस भय से जड़ भरत वाण भर आगे की जमीन देखकर चलते थे, कि उनके पाँव के नीचे आकर कोई कीड़ा न मर जाए. इस कारण इनकी गति दूसरे कहारों से कम होती थी. राजा पालकी उठानेवालों बार क्रोध कर उन्हें डाँटने लगा. उन्होंने कहा कि हम तो ठीक चल रहे हैं, लेकिन यह युवक ठीक नहीं चल रहा. यह सुनकर राजा रहूगण तमतमा उठा और जड़ भरत को बुरा-भला कहने लगा.

राजा ने कहा कि अरे मोटे, तू जीते ही मरे के समान है. तू आलसी है. मैं अभी तेरा इलाज किये देता हूँ.

जड़ भरत उसकी बातों को बड़ी शान्ति के साथ सुनते रहे. अंत में उन्होंने उसकी बातों का बड़ा सुंदर और ज्ञानपूर्ण उत्तर दिया.  उन्होंने कहा कि भार नाम की कोई वस्तु है, तो ढोने वाले के लिए है. मोटापन शरीर का ही है.  यह सब शरीर के लिए कहा जाता है, आत्म के लिए नहीं. ज्ञानीजन ऐसी बातें नहीं करते. आधि, व्याधि, भूख-प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, क्रोध, अभिमान, शोक आदि शरीर को लगते हैं. इसका आत्मा से को सम्बन्ध नहीं है. भूख-प्यास प्राणों को लगते हैं. शोक और मोह मन को होता है. न तुम हमेशा राजा रहोगे न कोई हमेशा प्रजा रहेगा.

राजा रहूगण भी उत्तम श्रद्धावान होने के कारण तत्व ज्ञान का अधिकारी था. जब उसने इस सुंदर उत्तर को सुना तो उसे समझ में आ गया कि यह कोई छुपा महात्मा है. वह अपना अभिमान त्यागकर तुरंत पालकी से नीचे उतरा और उनके चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगा. तब जड़ भरत ने राजा को अध्यात्मतत्व का बड़ा सुंदर उपदेश दिया, जिसे सुनकर राजा कृतकृत्य हो गया और अपने को धन्य मानने लगा.

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