जैन शांति पाठ अर्थ सहित

जैन शांति पाठ अर्थ सहित

Shanti path

शांतिनाथ पाठ

पञ्च परमेष्ठी भगवंतों की जय!
विश्व धर्म ‘शाश्वत जैन धर्म की जय !
संत श्रोमणि विद्यासागर महाराजजी की जय!
षष्टमपट्टाचार्यश्रीज्ञानसागरमहाराज की जय!

आपके उत्साहपूर्वक दर्शन,अभिषेक,पूजादि की श्रंखला में मंगलाष्टक, दर्शन, पूजन, अभिषेक विधि के पश्चात आचर्य माघ नन्दि द्वारा विरचित), विनयपाठ, पूजापीठिका, चत्तरि दण्डक, पञ्चकल्याणकअर्घ, पूजाप्रतिज्ञा पाठ,परमऋषि स्वस्तिमंगलपाठ, देव,शास्त्र,गुरु की सम्मुचय पूजा,देव,शास्त्र, गुरु की पूजा (आचर्य माघनन्दी) के, ‘नवदेवता की पूजा’,पंच परमेष्ठी,”समुच्च्य चौबीसी पूजा”,भगवान आदिनाथ जी, चन्द्रप्रभ भगवान, श्री शांतिनाथ भगवान जी ,श्रीपार्श्वनाथभगवान जी,श्री महावीर भगवान ,श्री शांतिनाथ जिन की पूजन(कविवर वृन्दावन दास जी रचित) की पूजन के अर्थ एवं भावों सहित प्रस्तुति के बाद, इसी क्रम में आगे’ शांतिनाथ qqqका अर्थ एवं भावों सहित आरम्भ करते हुए इस पूजा से संबंधित श्रंखला का समापन करते है

शांतिनाथ पाठ

शांतिनाथ मुख शशि उनहारि ,शील गुणव्रत संयमधारी !
लखन एक सौ आठ विराजैं ,निरखत नयन कमलदल लाजैं !!

शब्दार्थ:-उनहारि-समान,लखन-लक्षण,निरखत-देखते ही,लाजैं-लज्जित होता है,विराजैं-सुशोभित

अर्थ:-शांतिनाथ का मुख चंद्रमा के समान है,वे शील,गुणों,व्रतों और संयमधारी हैं!आपका शरीर १०८ लक्षणो से सुशोभित हैं,आपके नयनों को देखते ही कमलों का दल भी लज्जित होता है अर्थात आपके नेत्र कमल से भी अधिक सुंदर है !

नोट:-भगवन के शरीर में १००८ लक्षण कहे है,यहाँ १०८ कहने का कारण है कि ९०० छोटे चिन्ह तिल आदि होते हैं औए बड़े १०८ ही होते है अत:यहाँ १०८ चिन्हों का वर्णन किया गया है!

पंचम चक्रवर्ती पदधारी, सोलम तीर्थंकर सुखकारी !
इंद्र नरेंद्र पूज्य जिन नायक,नमो शांतिहित शांति विधायक !!

शब्दार्थ:- विधायक-करने वाले,

अर्थ:-पंचम चक्रवर्ती पद के धारक एवं सोलहवे तीर्थंकर के सुख करने वाले थे,जिन के नायक इंद्र और राजा आपकी पूजा शान्तिके लिए करते थे,शांतिनाथ भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ !

दिव्य विटप पहुपन की वरषा ,दुंदुभि आसन वाणी सरसा !
छत्र चमर भामंडल भारी ,ये तुव प्रातिहार्य मनहारी !!

शब्दार्थ:-विटप-वृक्षों,पहुपन-पुष्पों,सरसा-आनंद दायक ,तुव-आपकी,

अर्थ:-दिव्य(अशोक) वृक्ष के (भगवान् समबशरण में उपस्थित समस्त जीवों को शोक रहित होने का प्रतीक, अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान होते है) पुष्पों की वर्षा देवों द्वारा होती है)

दुंदुभि/बाजे (देवों द्वारा बाजे बजाये जाते है) , आसान-सिंहासन का होना(भगवान समवशरण में सिंहासन के ऊपर रखे कमल से चार अंगुल ऊपर अंतरिक्ष में विराजमान होते है),

वाणी-(आत्मा को दिव्य ज्ञान द्वारा आनंदित करने वाली दिव्य ध्वनि का खिरना), तीन छत्रों का होना (भगवान् के त्रिलोक के स्वामी के उद्घोषक, उनके सिर के ऊपर तीन छत्र होते है,सबसे ऊपर छोटा ,सबसे नीचे सबसे बड़ा और बीच में मंझला),

चमर-(देवताओं /इन्द्रों द्वारा ६४ चमर भगवन के ऊपर डोरे जाते हैं !)

भामंडल-(यह आभा मंडल विशेष होता है,( भगवानजी का औरा होता है),जिसमे समवशरण में उपस्थित प्रत्येक भव्यजीव को अपने अपने सात भव;-३ भूत,१ वर्त्तमान और ३ भविष्यत स्पष्ट दीखते है)ये आपके प्रातिहार्य मनोहर/मन को हरने वाले है !,

विशेष :-इन पंक्तियों में बताया है कि समवशरण में जब आप विराजमन होते है तो वहाँ उपस्थित प्रत्येक जीव को अष्टप्रातिहार्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होते है!

प्रातिहार्य-सामान्य लोगो में नहीं पाये जाने वाली विशेषताओं को प्रातिहार्य कहते है !ये देवों द्वारा बनाये जाते है!चक्रवर्ती मात्र मध्यलोक के स्वामी होने के कारण उनके सिर के ऊपर एक छत्र लगाया जाता है !

शांति जिनेश शांति सुखदाई ,जगत्पूज्य पूजौ शिर नाई !
परम शान्ति दीजै हम सब को,पढैं तिन्हें पुनि चार संघ को!!

शब्दार्थ:-जगत्पूज्य-तीनों लोकों में,पूज्य,पूजौ-मैं पूजा करता हूँ,नाई-नवाकर/झुका कर

अर्थ-हे शांतिनाथ जिनेश!आप शांति और सुख प्रदान करने वाले है,तीनोलोकों में पूज्य है,मैं मस्तक झुका कर आपकी पूजा करता हूँ!भगवन हम सब को जो ये शांति पाठ पढ़ रहे है और चतुरसंघ; मुनि,आर्यिका श्रावक, श्राविका को परम शान्ति प्रदान कीजिये !

पूजै जिन्हें मुकुटहार किरीट लाके इन्द्रादि देव अरु पदाब्ज जाके!
सो शांतिनाथ वर वंश जगत्प्रदीप,मेरे लिए करहिं शान्ति सदा अनूप !!

शब्दार्थ-किरीट-रत्न के धारक,पदाब्ज-कमल चरणोंकी,वर-श्रेष्ठ,जगत्प्रदीप-संसार को दीपकवत प्रकाशित करने वाले,अनूप-अनुपम

अर्थ-मुकुट,हार,रत्नों आदि के धारक इन्द्रादि देव, जिनके कमल चरणों की पूजा करते है,ऐसे शांतिनाथ भगवान् जो श्रेष्ठ वंश मे उत्पन्न हुए ,संसार को दीपक के समान प्रकाशित करने वाले दीपक के समान ,मेरे को अनुपम शांति सदा प्रदान करे !

संजूपकों को प्रतिपालकों को, यतिन को यतिनायकों को!
राजा प्रजा राष्ट्र सुदेश को ले कीजे सुखी हे जिन!शांति को दे !!

ये पढ़ कर जल छोड़े!

शब्दार्थ:-संजूपकों-सभी पूजा करने वालो को,प्रतिपालकों-हमारे रक्षकों को,यतिन-मुनिमहाराज को, यतिनायकों-आचार्यों को,सुदेश-देश !

अर्थ:-हे शांतिनाथ जिनेन्द्र भगवन आप सभी पूजा करने वाले ,हमारे रक्षकों ,मुनियों और आचार्यों को, राजा, प्रजा और राष्ट्र ,देश को शांति प्रदान कर सुखी कीजिये !

होवै सारी प्रजा को सुख बलयुत हो धर्मधारी नरेशा!
होवै वर्षा समै पै तिलभर न रहे व्याधियों का अंदेशा !!
होवै चोरी न जारी सुसमय वरतै हो न दुष्काल मारी!
सारे ही देश धारैं जिनवर वृषको जो सदा सौख्यकारी !!

शब्दार्थ:-बलयुत-बलवान,जारी-आग लगना,जिनवर वृष-जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रणीत धर्म,अर्थात जैन धर्म!व्याधियां-रोगों,मारी-हैज़ा आदि बीमारी न फैले

अर्थ:-हे भगवन समस्त प्रजा सुखी,राजा धर्मधारी और बलवान समुचित वर्षा समय पर हीनाधिक नहीं ,रंचमात्र भी रोगो का अंदेशा नहीं,चोरी नहीं हो और आग नहीं लगे,सारे में अच्छा समय वरते (रहे),अकाल कभी नहीं पड़े ,हैज़ा आदि भी नहीं फैले,सारे देश अर्थात विश्व सदा सुखकारी जैन धर्म को धारण करे !

घातिकर्म जिन नाश करि,पायो केवलज्ञान!
शांति करो सब जगत में,वृषभादिक जिनराज !!

(यह पढ़कर चंदन अर्पित करें!)

अर्थ-ऋषभादि भगवान्,जिन्होंने घातिया कर्मो का नाश कर केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया है वे समस्त जगत को शांति प्रदान करे !

शास्त्रों का हो पठन सुखदा लाभ सत्संगती का!
सद्वृत्तों का सुजस कहके। दोष ढाकूँ सभी का !!
बोलूँ प्यारे वचन हित के आपका रूप ध्याऊँ !
तो लों सेऊ चरण जिनके मोक्ष जो लों न पाऊँ !!

शब्दार्थ-सद्वृत्तों-अच्छे आचरण करने वालों का ,सेऊ -सेवा करूं

अर्थ-भक्त भगवान् से प्रार्थना कर रहा है कि,शास्त्रों को पढ़ कर लोग सुखी हो!सत्संगती का सब को लाभ हो,अच्छे आचरणों वालों की प्रशंसा करे,सभी के दोषो को ढकूं,जब भी बोलू हितकारी प्यारे वचन बोलूँ, अपकी वीतराग मुद्रा का निरंतर चिंतवन करूँ।मैं तब तक आपके चरणों की सेवा करता रहूँ जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाए !!

तव पद मेरे हिय में मम हिय तेरे पुनीत चरणों में !
तब लौं लीन रहौ प्रभु ,जब लौं पाया न मुक्ति पद मैंने !

अर्थ-प्रभु ,आपके चरण मेरे हृदय में और मेरा हृदय आपके पवित्र चरणों में तब तक लीन रहे जब तक मुझे मुक्ति प्राप्त न हो जाए!

अक्षर पद मात्रा से,दूषित जो कुछ कहा गया मुझसे!
क्षमा करो प्रभु सो सब ,करुणा करि पुनि छुड़ाहु भव दुख से !!
हे जगबंधु जिनेश्वर ,पाऊँ तव चरण शरण बलिहारी !
मरण समाधि सु दुर्लभ ,कर्मों का क्षय सुबोध सुखकारी !!

शब्दार्थ -बलिहारी -न्यौछावर,सुबोध -रत्न त्रय (सम्यग्दर्शन ,सम्यग्ज्ञान,सम्यक्चारित्र )

अर्थ -प्रभु,मैंनेअभिषेक पूजन और शांति पाठ किया है ,इनमे मेरे से जो अक्षर ,पद और मात्रा में दूषित कहा गया हो उन सब दोषों के लिए मुझे क्षमा कीजिये तथा करुणा कर संसार के दुखो से छुड़वा दीजिये! हे संसार के बंधु जिनेश्वर मैं आपके चरणों की शरण में अपना सब कुछ न्यौछावर,समर्पित करता हूँ,आपके चरणों की शरण के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए! भगवन मेरी अत्यंत कठिन समाधि मरण हो मेरे कर्मों का क्षय हो,सुखकारी रत्न त्रय की प्राप्ति हो!

राकेश कुमार जैन


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