जैनिज़्म: दस धर्म :धर्म तो एक ही है, किन्तु धर्म का स्वरुप दसलक्षण रूप है

दस धर्म
Jainism

दसलक्षण-पर्व :-

- जिस प्रकार वृक्षों में कल्पवृक्ष, धातुओं में स्वर्ण, मणियों में चिंतामणि, आप्तों में तीर्थंकर, देवों में इंद्र महान और श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पर्वों में यह "दसलक्षण पर्व" श्रेष्ठ है !
- दसलक्षण पर्व को पर्युषण-पर्व भी कहते हैं ! पर्युषण-पर्व 10 दिन तक मनाया जाता है !


- पर्युषण-पर्व वर्ष में तीन बार (माघ, चैत्र और भाद्रपद महीनों में ) आते हैं !
- जो प्राणियों को संसार के दुःख से उठाकर उत्तम सुख (मोक्ष) की ओर ले जाए, उसे "धर्म" कहते हैं ! धर्म तो एक ही है, किन्तु धर्म का स्वरुप दसलक्षण रूप है, इन्ही दस लक्षणों के द्वारा अंतरंग धर्म जाना जाता है !

१- उत्तम क्षमा धर्मं - क्रोध कषाय का अभाव होना
२- उत्तम मार्दव धर्म - मान कषाय का अभाव होना
३- उत्तम आर्जव धर्म - माया कषाय का अभाव होना
४- उत्तम शौच धर्म - लोभ कषाय का अभाव होना
५- उत्तम सत्य धर्म - असत्य का अभाव होना
६- उत्तम संयम धर्म - अपनी इंद्रियों को वश मे करना
७- उत्तम तप धर्म - इच्छाओं का निरोध करना
८- उत्तम त्याग धर्म - विषय-कषायों का अभाव, चार प्रकार का दान देना
९- उत्तम अकिंचन धर्म - परिग्रह का अभाव होना !
१०- उत्तम ब्रहमचर्य धर्म - कुशील का अभाव होना !

1- उत्तम क्षमा :-

- क्रोध रूप बैरी को जीतना उत्तम क्षमा धर्म को अंगीकार करना है !
- क्रोध का अभाव होना ही क्षमा धर्म है !
- केवल कुछ क्षण का क्रोध भी इस जीव के संयमभाव, सन्तोषभाव, निराकुलताभाव, सम्यक्दर्शन जैसे रत्नों के भण्डार को जलाने के लिए काफी है !
- हमने कितने ही कहानियाँ/उदाहरण पढ़े हुए हैं जिनमे क्रोध के आवेश में आकर उस जीव ने समस्त धर्मों का, मानवता का, यहाँ तक की अपनी मनुष्य पर्याय तक का लोप कर दिया !
- क्रोधी जीव से तो उसके अपने परिजन भी भयभीत होकर रहते हैं, न जाने कब उसे गुस्सा आ जाए और क्या करदे !
- ऐसे व्यक्ति कि कहीं कोई इज़्ज़त नहीं होती !
- तीव्र क्रोधी जीव तो दूसरे और स्वयं के प्राण लेने में भी संकोच नहीं करता !
- क्रोध के सन्दर्भ में द्वीपयान महामुनिराज का कथानक भी हम सभी ने पढ़ा है !
कैसा है ये क्रोध जो इक छठे गुणस्थानवर्ती महान तपस्वी जीव को नरकों में पटक देता है ???

क्रोध उत्त्पत्ति के कारण :-

क्रोध याने गुस्सा.
- क्रोध का कारक है "प्रतिकूलता", मतलब की क्रोध हमे हमेशा तब आएगा जब परिस्थितियां विपरीत होंगी, जैसा हम चाह रहे होंगे उसके उलट होंगी !
यह भी कह सकते हैं की, अपेक्षायें और आशायें ही क्रोध का मूल कारण हैं !
- दुष्ट लोगों के द्वारा तिरस्कार, हास्य, ताडन, मारन इत्यादि व अन्य क्रोध उत्त्पत्ति के कारण उदय होने पर भी क्रोध न करना सो क्षमा धर्म है !
क्षमा बलहीनों के नहीं होती, अपितु दंड देने/पलटवार करने कि शक्ति होते हुए भी जो दूसरों को क्षमा करता है, उसके क्षमा धर्म कहा है !
शास्त्रों में लिखा भी है "क्षमा वीरस्य भूषणम्" ...
- क्रोध दोनों लोकों का नाश करने वाला है, महापाप का बंध करके नरक पहुंचाने वाला है, बुद्धि भ्रष्ट कर सही-गलत का ज्ञान भी छीन लेता है !

क्रोध बैरी को जीतने का उपाय :-

- उदय में आई इन स्थितियों को "पूर्वोपार्जित कर्मों के फल जानकर" समभाव से सहना ही जीतने का उपाय है !
यह मानना कि यह हमारे द्वारा पूर्व जन्मों में बांधे हुए कर्मों का उदय है सो स्वत ही टल जाना है ! मैं यदि इसमें अब भी लिप्त होऊंगा तो कभी मुक्त ही नहीं हो पाउँगा !
- ज्ञानीपुरुष तो असहनीय दुःख उत्त्पन्न होने पर भी अपने पूर्व कर्म का नाश होना जानकर हर्षित ही होते हैं !
- क्षमा करना आत्मा का मूल स्वभाव है, उसका गुण है !
- जिसके अंदर क्षमा भाव प्रकट हो गया उसकी अन्य कषाय स्वतः ही विनश जाती हैं !
- जो लोक में पुण्यवान हैं, महा भाग्यवान हैं, जिनके संसार का अंत निकट है उन्ही के उत्तमक्षमा प्रकट होता है !
- उत्तमक्षमा तीन लोक में सार है, संसार समुद्र से तारने वाली है, रत्नत्रय को धारण कराने वाली है, दुर्गतियों से मुक्त कराने वाली है !
"दिन रात मेरे स्वामी स्वामी, मैं भावना ये भाऊ ...
देहांत के समय में, तुमको ना भूल जाऊं ...
शत्रु अगर हो कोई, सबसे क्षमा कराऊँ !!!"

2-उत्तम मार्दव धर्म

अब आगे धर्म के दसलक्षणों के क्रम में दूसरा है "मार्दव धर्म" और चार कषायों के क्रम में दूसरी है "मान कषाय"
माने,
- मान के अभाव को मार्दव धर्म कहते हैं !
- मार्दव का अर्थ होता है, मृदुता(कोमलता) का होना या मृदु होने की अवस्था/भाव का होना ।
याने,
कोमलता का भाव होने और मान/मद/अभिमान/अहंकार का अभाव होने को "उत्तम मार्दव" धर्म कहते हैं !
- किसी अहंकारी व्यक्ति की तुलना एक नशे में चूर व्यक्ति से की जाती है,
मद = मदिरा क्यूँ ?
- क्यूंकि इस मद के आश्रय को पाकर यह जीव सब कुछ भूल जाता है ।
जैसे नशे में धुत व्यक्ति को कोई समझा नहीं सकता औरों की तो बात ही क्या उसके सगे-सम्बन्धी जन भी उसे समझाने में असमर्थ हैं, उसी प्रकार अभिमानी व्यक्ति को कोई समझा नहीं सकता ।
- सम्यक् दर्शन को दूषित करने वाले, मलिन करने वाले भावों का नाम है 'मद' ।
- अर्हन्त भगवान् जिन 18 दोषों से रहित हैं उनमे एक है 'मद' ।
- हमने जब "मद" पढ़े तो मद के 8 प्रकार पढ़े थे :-

ज्ञानं पूजां कुलं जाति, वलमर्द्वि तपो वपुः ।
अष्ठा वाश्रित्य मानित्वं, स्मयमा दुर्गतस्मया: ।।

१ - ज्ञान का मद,
२ - पूजा/प्रतिष्ठा/ऐश्वर्य का मद,
३ - कुल का मद,
४ - जाति का मद,
५ - बल का मद,
६ - ऋद्धि का मद,
७ - तप का मद और
८ - शरीर/रूप का मद
- ऊपर कहे आठ प्रकार का मद न करना, धर्मात्मा, व्रती, गुरुजनों व विद्वानों को देखकर उनकी विनय करना !
- देव-शास्त्र-गुरु की मन-वचन-काय से सत्कार करना उत्तम मार्दव धर्म है !
- मान कषाय तो अनंत संसार बढ़ाने वाली है, किन्तु मार्दव संसार परिभ्रमण का नाश करने वाला है !
- यह मार्दव गुण "दयाधर्म" का कारण है !

#याद रखिये :-

- जिनके मार्दव गुण है, उन्ही का व्रत पालना, संयम धारण करना, तप-त्याग-स्वाध्याय-दान इत्यादि करना सफल है, अभिमानी का सब निष्फल है !
- अभिमानी के बिना अपराध किये ही सब लोग उसके बैरी हो जाते हैं, सभी लोग अभिमानी की निंदा करते हैं और प्रतिपल उसका पतन होते देखना चाहते हैं !
- ऐसे मेरे निज स्वभाव के घातक इस मान कषाय का अभाव हो मै अपने मार्दव गुण को प्रगटाऊं, तो ही आज का दिन सार्थक होगा !
नोट - एक बार आठ मद भी अवश्य पढ़ें !

3- उत्तम आर्जव धर्म

आर्जव के शाब्दिक अर्थ हैं :- 

साधापन । सरलता । सुगमता । व्यवहार आदि की सरलता या साधुता । स्ट्रेट-फार्वर्डनेस इत्यादि !
- मन-वचन और काय की कुटिलता को त्याग कर परिणाम सरल रखना, अर्थात कभी छल-कपट नहीं करना, जैसा मन में है वैसा ही वचनों से कहना और जैसा कहा है वैसा ही काया से करना, सो उत्तम आर्जव धर्म है !
याने,
सोच-कथनी और करनी (मन-वचन-काय) में अंतर न होना आर्जव धर्म है !
- दूसरों की चुगली करना, दोष उजागर करना, धोखा देना, झूठ बोलना, ठगी करना मायाचारी है !
- अगर सोचें की कौनसा जीव मायाचारी करता है, तो उत्तर मिलता है कि :- जो धन, सम्पदा, कुटुंब आदि को अपनाता है वही छल-कपट-ठगाई का मार्ग चुनता है, क्यूंकि जिसने जिन धर्म को अपना लिया, भेद-विज्ञान कर लिया, जिसे अब संसारी पदार्थों में रूचि नहीं रही उसे मायाचारी करने की क्या आवश्यकता है उसके तो स्वत ही आर्जव धर्म प्रकट हो जाता है !
- हम अक़सर मायाचारी करके सोचते हैं कि हमने अपना भला कर लिया, कोई बड़ा लाभ कर लिया अपितु सत्य तो यह है कि मायाचारी करके हम अपनी आत्मा का भयंकर नुक्सान ही करते हैं, और कुछ भी नही !

मायाचारी का प्रमुख कारण :-

# "धन-संपत्ति" एक प्रमुख कारण है जिसकी चाह में आकर यह जीव मायाचारी तक करने को विवश हो उठता है !
किन्तु विचार करने वाली बात यह है कि अरे जब महान चक्रवर्ती, बड़े-बड़े राजा-महाराजा, यहाँ तक की हमारे स्वयं के दादा-परदादा अपने साथ कुछ नहीं ले जा सके, तो क्यों फिर मैं इतनी मायाचारी, छल-कपट और बेईमानी करके धन को अर्जित करूँ ?
व्यवहार में धन-संपत्ति आजीविका चलाने के लिए आवश्यक है, सो उसका अर्जन करना भी ज़रूरी है, किन्तु वह भी सिर्फ न्यायिक तरीके से ही मायाचारी से नहीं !
याद रखिये- मायाचारी से कमाए हुए करोड़ों-अरबों रुपयों का दान भी निष्फल ही होता है !

मायाचारी का निश्चित फल :-

- परम पूजनीय पूर्वाचार्य श्री उमास्वामी जी महाराज ने "तत्वार्थ-सूत्र जी" के छठे अध्याय के सोलहवें सूत्र में लिखा है :-

# "माया तैर्यग्योनस्य"
याने,
मायाचारी करने से तिर्यंच गति का बंध होता है !
- भगवान कहते हैं कि हमारी धन-संपत्ति तो हमारा ज्ञान और दर्शन है, मैं अब उसी को पाने के लिए रत होऊं तो ही आज का उत्तम आर्जव धर्म का दिन सार्थक हो सकेगा !

4- उत्तम शौच धर्म

- अब तक हमने पढ़ा कि,
- क्रोध कषाय का अभाव होना - क्षमा धर्म है ...
- मान कषाय का अभाव होना - मार्दव धर्म है ...
- माया कषाय का अभाव होना - आर्जव धर्म है ...
अब आगे धर्म के दसलक्षणों के क्रम में चौथा है "शौच धर्म" और चार कषायों के क्रम में चौथी है "लोभ कषाय"
याने,
- लोभ कषाय के अभाव होने को शौच धर्म कहते हैं !

लोभ/लालच कषाय :-

- विषयों के प्रति आसक्ति, भोग की वस्तुओं के प्रति आवश्यकता से अधिक झुकाव को लोभ कहते हैं !
- लोभ या लालच का संबंध केवल पैसे से ही नही है, अपितु किसी भी वस्तु के प्रति अधिक आसक्ति लोभ है !
- लोभ को "पाप का बाप" बताया है, सारे पापों की जड़ यह लालच ही है, कहा भी है कि "लालच बुरी बला है" !
हम जानते ही हैं की लालची जीव किसी भी अवस्था में संतुष्टि को प्राप्त नहीं होता वह तो सदैव ही असंतुष्ट रहता है, और असंतुष्ट जीव की आशाएं,अपेक्षाएं और संसार कभी ख़त्म नहीं हो सकते !
- यह भी सहज ही है कि जो लालची होगा वह अपनी विषय पूर्ति के लिए समय आने पर चोरी, मायाचारी, छल-कपट, हिंसा, परिग्रह, बैर-भाव भी करता ही रहेगा !
यही कारण है की इस लोभ से बचना परम आवश्यक है !

- "शौच/शुचि" का अर्थ होता है "शुद्धि/पवित्रता" !
- सबसे पहली बात तो यह जान लेना चाहिए कि "गंगादि में हज़ारों स्नान करने से" शौचधर्म नहीं होता है !
- वह मिथ्यादृष्टि हैं जो इस शरीर को स्नानादि से साफ़ कर लेने को शौच मानते हैं, जबकि ज्ञानी-जन कहते हैं कि शरीर को शुद्ध मानना वृथा है !
- विचार करने वाली बात है कि जो चीज़ स्वयं ही मल से बनी है, मल जिसमे से नियमित रिसता रहता है, क्या वह कभी शुद्ध हो सकती है ? कदापि नहीं हो सकती !
- शौचधर्म का प्रयोजन तो "आत्मा को" पवित्र करने से होता है, इसका इस देह से कोई सम्बन्ध नहीं मानना !
- अनादि काल से यह आत्मा लोभ रूपी मल से मलिन हो रखा है उसे पवित्र करना तथा करने का भाव आना ही शौचधर्म है !

लोभ 4 प्रकार होता है :-

१ - जीवन को लोभ
२ - निरोगता का लोभ
३ - इन्द्रियों का लोभ
४ - भोग्य सामग्री का लोभ
- इन सभी ४ प्रकार लोभ का अत्यंत अभाव हो जाना ही शौच धर्म है !

लोभ-रूप मैल को धोने का जल -

- जो
"समभाव"
और
"संतोष"
रूपी जल से इस लोभरूपी मल को धोता है, उसी के निर्मल शौचधर्म होता है !

- दूसरे का वैभव, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, पुण्य का उदय, प्रभाव, स्त्री, संतान, धन, संपत्ति इत्यादि देख कर कभी ईर्ष्या नहीं रखना, अपनी अत्यन्त ही दुर्लभ इस मनुष्य पर्याय में जो है जितना है उसी में संतोष कर अशुभ भावों का अभाव करके आत्मा कि शुचि को करो !

# आत्मा की शुचि/निर्मलता ही मोक्ष का मार्ग है !
- "संतोषी सदा सुखी" !

5- उत्तम सत्य धर्म

- जैसा देखा या सुना हो, उसे वैसा नहीं कहना/बताना ही झूठ है !
- जिन वचनों से किसी धर्मात्मा या निर्दोष प्राणी का घात हो, ऐसे सत्य वचन बोलना भी झूठ कि श्रेणी में आता है !!!
- छल-कपट, राग-द्वेष रहित वचन बोलना, सर्व हितकारी, प्रामाणिक, मितकारी, कोमल वचन बोलना, धर्म की हानि या कलक लगाने वाले , प्राणियों को दुःख पहुचाने वाले वचन न कहना "उत्तम सत्य धर्म" है !
- जहाँ बोलने से धर्म की रक्षा होती हो, प्राणियों का उपकार होता हो, वहां बिना पूछे ही बोलना और जहाँ आपका व अन्य का हित नहीं हो वहां मौन ही रहना उचित कहा है !
# सत्य ही मनुष्य जीवन कि शोभा है !

ज़रा सोचिये :-

हम अनन्तानन्त काल तो निगोद में ही रहे, वहां पर "वचनरूप वर्गणा" ही ग्रहण नहीं की ! जैसे तैसे निकल वहां से फिर अनंत समय तक पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक बने, वहां तो जिह्वा इन्द्रिय/बोलने की शक्ति ही नहीं पाई !
फिर वहां से निकल कर दोइन्द्रिय, तीनीन्द्रिय, चतुरिंद्रिय और पंचेन्द्रिय तिर्यंच में जन्म लिया तो वहां जिह्वा इन्द्रिय तो पाई किन्तु अक्षर स्वरुप शब्दों का उच्चारण करने की सामर्थ्य नहीं मिली !
फिर कहीं जाकर अत्यंत दुर्लभ इस मनुष्य पर्याय में जन्म लिया, एक मनुष्यपने में ही वचन बोलने की शक्ति प्रकट होती है !
- ऐसी दुर्लभ वचन बोलने की सामर्थ्य को पाकर उसे असत्य/झूठ वचन बोलकर बिगाड़ लेना, इससे बड़ा अनर्थ अपने साथ मैं और क्या कर सकता हूँ भला ???
- आँख, नाक, कान, मुख तो जानवरों को भी होते हैं, खाना-पीना, काम-भोग इत्यादि तो जानवरों को भी प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु वचन कहने, सुनने, समझने, पढ़ने-पढ़ाने की शक्ति को पाकर भी यदि मैंने जिनवाणी का श्रद्धान नहीं किया, तो अपना घोर अहित किया !
- सत्य बोलने से समस्त विद्याएं सिद्ध हो जाती हैं !
- सत्य के प्रभाव से अग्नि, जल, विष, सिंह, सर्प, दुष्ट, देव, मनुष्यादि बाधा नहीं कर सकते !
- सत्य के प्रभाव से देव भी सेवा करते हैं !
- जहाँ सत्य नहीं वहां अणुव्रत-महाव्रत नहीं हो सकते !
- झूठ बोलने वाले का तो परिजन भी तिरस्कार करते हैं ! उसकी घर-समाज कहीं कोई साख नहीं होती ! उसकी बातों का कहीं कोई मोल नहीं होता !
- झूठ बोलने वाले जीव नियम से ही नरक-तिर्यंच आदि खोटी गतियों में जाते है, और जिह्वा छेदन, सर्व धन हरण जैसे दंड भुगतने पड़ते हैं !
- हितोपदेशी भगवान कहते हैं कि यह जो मनुष्य पर्याय मिली है अब सत्य के प्रभाव से यहाँ उज्जवल यश, वचन की सिद्धि, द्वादशांग श्रुत का ज्ञान पाकर, फिर इन्द्रादि देव होकर, तीर्थंकर आदि उत्तम पद की प्राप्ति कर निर्वाण को प्राप्त होऊं !
ऐसी भावना निरंतर भाते हुए अब आगे के बचे हुए जीवन में सत्य वचन बोलने का दृढ़ता से अभ्यास करूँ !

6- उत्तम संयम धर्म :-

- संयम = सम्यक् + नियम ! - संयम = नियंत्रण !
- संयम = "बड़ी सावधानी से" अपनी इंद्रियों को वश मे करना, संयम है.
- व्रत व समिति का पालन करना, मन-वचन-काय की अशुभ प्रवत्तियों का त्याग करना, इन्द्रियों को वश में करना उत्तम संयम धर्म है !

#संयम २ प्रकार का कहा है :-

१- प्राणी संयम :- सभी जीवों की रक्षा करना तथा करने का भाव निरंतर होना, प्राणी संयम है !
२- इन्द्रिय संयम :- पांच इन्द्रियों व मन को नियंत्रण में रखना तथा रखने का निरंतर भाव होना, इन्द्रिय संयम है !
- आज के दिन हमे कुछ समय निकाल कर विचार करना ही चाहिए कि क्या हम, हमारी क्रियाएँ, हमारे भाव संयमित हैं, हमारे जीवन में संयम का कितना प्रभाव है !

~अपने से बलहीन कोई टकरा गया तो उसकी हिंसा तन व वचन से करदी, कहीं कोई बलशाली टकरा गया तो भावों से ही उसकी हिंसा करली ...
~भूख लगी, जो मिला खा लिया ...
~प्यास लगी, जो मिला पी लिया ...
~किसी से कलह हुई, तो मुँह में आया कह दिया ...
~जो मन-भाया खरीद लिया ...
~जो मन आया उठा लिया, जो मन आया यहाँ-तहाँ फेंक दिया !
इस सबमें संयम कहाँ है ?
- संयम जिस जीव में हो, उसके पहले के बाकी धर्म तो स्वत: ही सिद्ध हो जाते हैं क्यूंकि सोचने वाली बात है कि संयमित जीव को :-
क्रोध किस बात पर आएगा ?
अभिमान किस बात का दिखाएगा ?
वह मायाचारी क्या पाने के लिए करेगा ?
वह लोभ किस पदार्थ के प्रति धरेगा ?
झूठ का सहारा क्यूँ लेगा ?

- और धर्म के इस लक्षण को धारे बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते क्यूंकि संयम को
"तप की पहली सीढ़ी कहा है" ...
जिसके संयम नहीं है, जो असंयमित है वह तप धर्म को अंगीकार कदापि नहीं कर सकता !
- जिनागम में संयम-धारण केवल मुनिराजों को ही नहीं अपितु गृहस्थों को भी "गृहस्थ के 6 आवश्यक" के रूप में परमावश्यक बताया है !
- अब हमे अपनी क्षमतानुसार जितना हो सके अपनी इन्द्रियों और मन को संयमित करके अपना संसार-सागर से मुक्ति रूप ध्येय साधना चाहिए !
हमे प्रतिदिन मंदिर जी मे नियम लेने चाहियें की आज मैं इतनी बार भोजन करूँगा, इतने पदार्थ ग्रहण करूँगा, खेल नही खेलूँगा, सिनेमा नही देखूँगा या जो भी आवश्यक लगे ... ऐसे भाव आने लगे तो ही आज के इस "उत्तम संयम-धर्म" का दिन सार्थक है !

7- उत्तम तप धर्म

"इच्छा निरोध: तप:"

माने,
- इच्छाओं का निरोध करना तप है !
- जिस प्रकार सोने को तपाने पर वह समस्त मैल छोड़ कर शुद्ध हो जाता है और चमकने लगता है;
जिस प्रकार सरोवर में रुका/जमा हुआ जल, सूरज की गर्मी में तपने के कारण सूखकर उड़ जाता है,
उसी प्रकार सांसारिक विषय-भोगों की अभिलाषा से विरक्त होकर अनादि कर्म बंध से सिद्ध-स्वरुप निर्मल आत्मा को अनशनादि बारह प्रकार के तप से तपाकर कर्म-मल रहित करना, उत्तम तप है!

# तप से "निर्जरा" होती है ! कर्मों का क्षय करने के लिए तप करना आवश्यक है !

- ध्यान दें :-

शरीर को पंचाग्नि में तपाना, शरीर पर फसल उगा लेना, उसे जलाना, पानी में डूबे रह कर गलाना, ऐसे कार्यों को "मिथ्यादृष्टि जीव" तप मानता है !
तप का अर्थ है, "ज्ञानपूर्वक" आत्मा को कर्मों के बंधन से छुड़ाना !
- तप 2 भेद से कुल 12 प्रकार के होते हैं ! जिनके विषय में हम पहले पढ़ चुके !

# 6 बहिरंग तप -

अनशन, उनोदर, व्रत-परिसंख्यान, रस-परित्याग, विविक्त-शयनासन और काय-क्लेश.

# 6 अंतरंग तप -
प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्ति , स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान...

- यद्यपि तप की प्रधानता मुनीश्वरों के ही होती है, किन्तु गृहस्थों को भी निरंतर तप करते रहना चाहिए !
गृहस्थ भी यदि तप भावना भाता रहे तो रोगादि कष्ट आने पर उसे फिर डर नहीं लगता, इन्द्रियों पर विजय पा लेता है, तप का अभ्यास हो जाने के कारण वृद्ध अवस्था आने पर उसकी बुद्धि चलित नहीं होती, संतोष प्रवृत्ति प्रकट होती है, दीनता का अभाव हो जाता है, परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और आगे संसार सागर से पार लगता है !
- तीर्थंकर प्रकृति का बँध कराने वाली, 16 कारण भावनाओं में सांतवी है "शक्तिस्तप भावना" !
शक्ति के अनुसार तप करने की भावना को शक्तिस्तप भावना कहते हैं. मुनीराज निरंतर तप करते हैं, यह भावना भाते हैं, किंतु गृहस्थ के आत्म-कल्याण के लिए भी यह परम-आवश्यक है.
- जो व्यक्ति निरंतर तप करते हुए चिन्त्वन करता है कि मैं अपने तप की निरंतर वृद्धि करूँ, वह शीघ्र ही इस संसार से पार पाता है !
- विचार करने वाली बात है, की जब उसी भव से मोक्ष जिनका सुनिश्चित था, ऐसे परमवंदनीय तीर्थंकर के जीवों को भी तप करना पड़ा, तो हम और आप यदि इस अत्यंत दुर्लभ मनुष्य जीवन में तप धारण नहीं करते, तो इसका अर्थ इस पर्याय को व्यर्थ गवाना ही है, और कुछ भी नहीं !!!

नोट - एक बार तप भी अवश्य पढ़ें ! और शक्ति अनुसार जितना भी, जैसा भी संभव हो आज के दिन धारण करने का प्रयत्न करें !

8- उत्तम त्याग धर्म

-- अंतरंग और बहिरंग दोनों प्रकार के परिग्रहों का त्याग उत्तम त्याग है !

#व्यवहार से :-

साधु, मुनि, व्रती, गुरु जान आदि को उनके दर्शन, ज्ञान और चरित्र की वृद्धि के लिए "भक्तिभाव से" और दुखित, भूखे, अंगहीन, हीनदरिद्रियों को "करुणाभाव से" भूख-प्यास में आहार-जल देना, रोग अवस्था में शुद्ध औषधि देना, विद्याविलाषियों को शास्त्र देना और भयभीत जीवों को अभय दान देना, उत्तम त्याग धर्म है !

#निश्चय से :-

अपनी आत्मा से अनादिकाल से लगे हुए राग-द्वेष-मोहादि परभावों, जिनके कारण वह अनंत काल से संसार में भटक रहा है, से छुड़ाकर मुक्त कर देना ही उत्तम त्याग धर्म कहा है !

 जिनागम में 4 प्रकार का दान बतलाया है :-

१ :- आहार दान
२ :- औषधि दान
३ :- शास्त्र दान
४ :- अभय दान

- त्यागी और साधुओं को चारों प्रकार का दान देना, विषय-कषायों को त्यागना उत्तम त्याग है !
- परोपकार के लिए अपने साधन(द्रव्य आदि) का त्याग भी इसी श्रेणी में आता है !

#ध्यान दें :-

दान के सन्दर्भ में :
- पात्र - जिसे दान दिया जा रहा है !
- दाता - जो दान दे रहा है !
- द्रव्य - जो दान दिया जा रहा है !
और,
- विधि का विशेष महत्व है !

#पुनः: ध्यान दें :-

- दान या त्याग में किसी भी प्रकार का आकांक्षा, पछतावा, प्रदर्शन, अहंकार, हिंसा और किसी भी प्रकार का कोई उदेश्य यदि हो तो वह दान नहीं, त्याग नहीं !
- जिस वस्तु की अब मुझे ज़रूरत नहीं उसे किसी को दे देना त्याग नहीं है !

हम पहले भी पढ़ चुके हैँ कि :-

- मंदिर जी में ५,००० रुपये दान दिये अपना नाम शिला पर अंकित करा लिया !
- मंदिर जी में पंखा देने वाले पंखे की पंखुड़ी पर अपना नाम लिखवा देते हैं !
- पत्थर लगवाने वाले, फर्श पर, दीवारों पर अपना नाम लिखवा देते हैं !
- वेदी बनवाने के लिए कुछ पैसे दे दिए, तो वेदी पर ही नाम अंकित करवा दिया !
- अलमारी/चौकी/मेज/बर्तन जो दिए उसपर ही नाम लिखवा दिया !
= याद रखें = मेरा नाम हो, के अभिप्राय से दिया हुआ अरबों-खरबों का दान भी निष्फल है, कु-दान है !
- हमे प्रतिदिन अपनी यथा-शक्ति अनुसार आहार, औषधि, अभय और ज्ञान-दान धर्म-पात्रों को भक्ति भाव से देना चाहिए.
अपनी कमाई मे से कुछ हिस्सा हमे ज़रूर दान करना चाहिए.
- जो पाप हम परिग्रह के संचय मे तथा आरंभ कार्यों मे लिप्त होने क कारण इक्कट्ठे करते हैं, दान उस पाप के भार को हल्का करता है...
- जहाँ त्याग की भावना होगी वहां क्रोध-मान-माया और लोभ स्वयं ही विनश जायेगा !
- चोरी-कुशील-परिग्रह रूपी पाँचों पाप भावों का अभाव हो सुखमयी संतोष प्रकट हो जायेगा !

9- उत्तम आकिंचन्य धर्म

दसलक्षण रूप धर्म का नवाँ लक्षण है, उत्तम आकिंचन्य !
आकिंचन्य धर्म को समझने से पहले परिग्रह को समझकर चलते हैं !

परिग्रह :-

- पदार्थों के प्रति ममत्व का भाव रखना परिग्रह है !
- संसारी चीज़ों (ज़मीन,मकान,पैसा,पशु,गाड़ियां, कपड़े इत्यादि) को आवश्यकता से अधिक रखना और इन्हे और ज्यादा बढ़ाने/पाने की इच्छा रखना परिग्रह है !

#अंतरंग और बहिरंग के भेदों से परिग्रह 24 प्रकार का है :-

(क) अंतरंग परिग्रह :- रागादि रूप अंतरंग परिग्रह 14 प्रकार का होता है !
1- मिथ्यात्व,
4- कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) और,
9- नो-कषाय (हास्य, रति, आरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद)

(ख) बहिरंग परिग्रह :- सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति रखना ... यह 10 प्रकार का होता है !
1:- क्षेत्र (खेत, भूमि),
2:- वास्तु (मकान),
3: -हिरण्य (चांदी,रुपया),
4:- स्वर्ण (सोना),
5:- पशुधन (गाय,भैंस आदि),
6:- धान्य (अन्नादि),
7:- दासी (नौकरानी),
8:- दास (नौकर),
9:- कुप्य (कपडे) और
1०:- भांड (बर्तन)

*** समस्त पापों का मूल कारण परिग्रह है !!!

"न किंचनयस्य स: अकिंचन"

माने,
- जिसके कुछ भी नहीं है, वह आकिंचन्य है !
- परिग्रह को महादुःख तथा बंध का कारण जानकर छोड़ना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है !
- अंतरंग और बहिरंग के भेद से 24 प्रकार के परिग्रहों और शरीर से ममत्व को त्यागना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है !
- जिस प्रकार सुनार अपने निरंतर अभ्यास, दर्शन और ज्ञान के बल पर एक मणियों के हार के लगे हीरों को और बाकी मणियों को अलग-अलग जान लेता है, उसी प्रकार "परमागम के" निरंतर अभ्यास से मेरे ज्ञान स्वभाव में मिले हुए राग-द्वेष-मोह-कामादि मैल को भिन्न और अपने ज्ञायक स्वरुप को भिन्न जानना है !
यदि, महापुण्य के उदय से मिले इस मनुष्य जन्म को भी संसार के पदार्थों-विषय-भोगों को पाने और अपनाने में बिता दिया, तो फिर आगे तो दुःख ही दुःख है, घोर दुःख है !
- कर्मों के उदय से प्राप्त हुए विनाशीक शरीर, परिवार, मित्र, धन, सम्पदा, वाहन, भूमि, इत्यादि परिग्रह में मुझे ममताबुद्धि कभी न उत्त्पन्न हो !
- यह आकिंचन्य भाव मुझे अनादिकाल से नहीं हुए हैं, मैं सभी पर्यायों को अपना रूप मानता रहा, सभी विकारों को अपना स्वभाव मानता रहा, अब मैं तीन लोक में किसी अन्य वस्तु को नहीं मांगता, अब यह अकिंचन्यपना ही संसार-समुद्र से तारने का जहाज हो जाए, इस प्रकार से आकिंचन्य भावना भाता हूँ ! !

10- उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

"ब्रह्माणि आत्मनि चरितीति ब्रह्मचर्य:"

माने, ब्रह्म का आचरण करना, आत्मा में लीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है ! ऐसे भी समझ सकते हैं कि, 
ब्रह्मचर्य = ब्रह्म + चर्य;
ब्रह्म = आत्मा,
चर्य = प्रवृत्ति
याने,
- अपनी ज्ञायक स्वभाव आत्मा में प्रवृत्ति करना ही निश्चय ब्रह्मचर्य अर्थात उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है !
और,
- व्यवहार से तो "कुशील के अभाव" को ब्रह्मचर्य धर्म कहा है ! 
- स्पर्शन इन्द्रिय के विषयों, मैथुन कर्म से सर्वथा विमुख हो जाने को ब्रह्मचर्य कहते हैं !
- किन्तु काम केवल स्पर्शन इन्द्रिय का ही विषय नहीं है, किसी सुन्दर शरीर, वेश्यानृत्य, अश्लील चित्र, आदि को आँखों से देखना, कामोत्तेजक गीतों को कानों से सुनना, भीनी गंध वाले इत्र आदि को नासिका से सूंघना इत्यादि इन्द्रियों से किये हुए कार्यों से भी शील का घात करने वाली हैं !
- कुशील महापाप है, संसार परिभ्रमण का बीज है !
- ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना सभी तप, त्याग और संयम निस्सार हैं !
- जब तक बाह्य इन्द्रियों के सुख से नहीं विरक्त हुए तब तक अंतरंग विरक्ति असंभव ही है !
- जो आत्मा के हित का इच्छुक है उसका प्रयास होना चाहिए कि उक्त प्रकार की क्रियाओं के पीछे न पढ़कर अपने शील और ब्रह्मचर्य की रक्षा करे !

साभार: जैनसार

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