जो न बावरे – दिनेश मालवीय “अश्क”

Kavita-02Aug-Newspuran

जो न बावरे..

जो न बावरे होते जग में
नगर प्रेम का निर्जन होता
बस अरण्य जैसा रहता मन
जीवन कांटों का वन होता

इन झरनों के बहने में संगीत न होता
सूनापन मिलता बस खग के गानों में
तान बांसुरी की नीरसता पहने रहती
भ्रमर बांटते सन्नाटे इन उद्यानों मे

धवल चांदनी तप-तप तपती
वन्दन का स्वर क्रन्दन होता

स्वाति-बूंद के लिये न चातक प्यासा रहता
और न कोकिल कूह कूह की टेर लगाता
नहीं चांद को यूं चकोर तकता रजनी भर
नहीं शाम के लिये सवेरा फेर लगाता।

नहीं मचल कर चलती नदिया
नहीं मोर का नर्तन होता

वीणाओं के तार न अक्सर झंकृत होते
किसी लेखनी से न काव्य-रस झरता कोई
कहीं तूलिका रंग न भरती किसी चित्र में
और नाचने को न पांव थिरकता कोई।

याद न रहता जग को गोकुल
हृदय नहीं वृन्दावन होता

 

DineshSir-13-a


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