धर्माधर्म का निर्णय मानव बुद्धि से सम्भव नही

धर्माधर्म का निर्णय मानव बुद्धि से सम्भव नहीं

Judgment of religion is not possible with human intellect
कुछ बुद्धिमान् मनुष्य का कहना है कि 'जिस कर्म से स्वको सुख हो, उस कर्म को धर्म कहते हैं।' उनका यह कथन ठीक नहीं, कारण यह है कि रोगी मनुष्य कुपथ्य सेवन-काल में स्वको सुखी मानता है, तो भी उसके उस कर्म को कोई सामान्य मनुष्य भी धर्म नहीं मानता। यदि कहें कि 'जो कर्म कालान्तर में भी दुःख न दे; उसे धर्म कहते हैं।' यह लक्षण भी ठीक नहीं; क्योंकि जो रोगी चोरी करके सुपथ्य का सेवन करता है तथा चोरी का रहस्य प्रकट न होने से कालान्तर में भी दुःख नहीं पाता, तो भी उसके उस चोरी रूप कर्म को धर्म कोई नहीं मानता।

कुछ मनीषी मनुष्य का कहना है कि मनुष्य सर्वोत्कृष्ट प्राणी है, अत: इसे स्वसुख की अपेक्षा परसुख को ही अधिक महत्त्व देना चाहिये, चोरी रूप कर्म से परसुखका नाश होता है। अतः धर्म का शुद्ध स्वरूप यह है कि 'जिस कर्मसे दूसरेको सुख हो, वह कर्म धर्म है।' यह कथन भी सारहीन है; क्योंकि इसके लक्षण के अनुसार तो सुयोग्य वैद्यद्वारा रोगीको मनोवांछित कुपथ्य-दानरूप कर्म को भी धर्म मानना होगा, परन्तु कुपथ्य-दानरूप कर्म को धर्म तो अल्पबुद्धि मनुष्य भी नहीं मान सकते।

अन्य मननशील मानव का कथन है कि कुपथ्यदानरूप कर्मसे रोगीको सुख होनेपर भी सुयोग्य वैद्यको दुःख होता है। अत: धर्म का परिशुद्ध स्वरूप यह है कि 'जिससे स्व और पर दोनोंको सुख हो, वह कर्म धर्म है'। यह लक्षण भी अतितुच्छ है; क्योंकि मानवबुद्धि से धर्माधर्म का निर्णय करने वाले तथा धर्माधर्म में वेद प्रमाण को कपोलकल्पना कहने वालों के प्रति आचार्य कुमारिल भट्ट कहा है

अनुग्रह (सुख)-से धर्म और पीड़ा से अधर्म होता है, ऐसा कहने वालों के मतानुसार तो जप करने से धर्म और मद्यपान से अधर्म ये दोनों ही नहीं होंगे इतना ही नहीं, किंतु हृदयके आक्रोशयुक्त (कम्पयुक्त) होने पर भी गुरुदाराभिगमन करने वालों को महान् धर्म तथा महती परोपकारिता की प्राप्ति होगी। यहाँ तक जो विचार किया गया है, वह तो धर्माधर्म को केवल दृष्ट फलप्रद मानकर किया गया है, इसका ही जब मानव बुद्धि से निर्णय नहीं हो सकता, तब अदृष्ट फलप्रद धर्माधर्म का निर्णय तो मानव-बुद्धि से किसी प्रकार भी नहीं हो सकता।


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