महाराज युधिष्ठिर ने दिया त्याग का परिचय

महाराज युधिष्ठिर ने दिया त्याग का परिचय

स्वर्गारोहण के समय की कथा है, महाराज युधिष्ठिर हिमालय पर चढ़ने गये। द्रौपदी तथा उनके चारों भाई एक-एक करके बर्फ में गिरकर मर गये। किसी प्रकार साथ का एक कुत्ता बच गया था, वही धर्मराज युधिष्ठिर का अनुसरण करता जा रहा था। उसी समय देवराज इन्द्र रथ लेकर महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख उपस्थित हुए। उन्होंने महाराज युधिष्ठिर को रथ पर बैठने के लिये आज्ञा दी। युधिष्ठिरने कहा—'यह कुत्ता अबतक मेरे साथ चला आ रहा है। यह भी मेरे साथ स्वर्ग चलेगा। देवराज इन्द्रने कहा-'नहीं, कुत्ता रखने वालों के लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तुम कुत्ते को छोड़ दो।' इसपर महाराज युधिष्ठिर ने कहा-'देवराज ! आप यह क्या कह रहे है ? भक्तों का त्याग करना ब्रह्महत्या के समान महापातक बतलाया गया है। इसलिये मैं अपने सुख के लिये इस कुत्ते को किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता। डरे हुए को, भक्त को, 'मेरा कोई नहीं है' ऐसा कहनेवाले शरणागत को, निर्बल को तथा प्राणरक्षा चाहने वाले को छोड़ने की चेष्टा मैं कभी नहीं कर सकता, चाहे मेरे प्राण भी क्यों न चले जायेँं। यह मेरा सदाका दृढ़ व्रत है। यह सुनकर देवराज इन्द्रने कहा -हे युधिष्ठिर ।



जब तुमने अपने भाइयों को छोड़ दिया, धर्म पालनी प्यारी द्रौपदी छोड़ दी, फिर इस कुत्तेपर तुम्हारी इतनी ममता क्यों है ?' युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- 'देवराज !' उन लोगों का त्याग मैंने उनके मरने पर किया है, जीवित अवस्था में नहीं। मरे हुए को जीवनदान देने की क्षमता मुझमें नहीं है।

मैं आपसे फिर निवेदन करता हूं कि मरणागत भय दिखलाना, स्त्री का वध करना, ब्राह्मण का धन हरण कर लेना और मित्रों से द्रोह करना, इन चार पापा के बराबर केवल एक भक्त के त्याग का पाप है ऐसी मेरी सम्मति है। अतः मैं इस कुते को किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता। युधिष्ठिर के इन दृढ़ वचन को सुनकर साक्षात् धर्म, जो कि कुत्ते के रूप में विद्यमान थे, प्रकट हो गये उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से कहा-'युधिष्ठिर । कुत्ते को तुमने अपना भक्त बतलाकर स्वर्ग तक का परित्याग कर दिया। अतः तुम्हारे त्याग की बराबरी कोई स्वर्गवासी भी नहीं कर सकता। तुमको दिव्य उतम गति मिल चुकी। इस प्रकार साक्षात धर्म तथा उपस्थित इन्द्रादि देवता महाराज युधिष्ठिर की प्रशंसा की और वे प्रसन्नतापूर्वक महाराज युधिष्ठिर का रथ में बैठकर स्वर्ग में ले गये।

पाठक ! तनिक आधुनिक जगत्की ओर तो ध्यान दे। आज भी सहस्रों नर-नारी बदरिकाश्रम आदि तीर्थ की यात्रा करते है, परन्तु साथियों के प्रति उनका व्यवहार कैसा होता है? कुत्ते आदि जानवरों की बात छोड़ दें, आजकल के तीर्थ-यात्रियों को यदि निकट सम्बन्धी भी संयोगवश मार्गमें बीमार पड़ जाते है तो थे उन्हें वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। उनके करुणक्रन्दनकी उपेक्षा करके वे मुक्ति की खोज में चले जाते हैं। परन्तु यह उनका भ्रममात्र है। दयामय भगवान केवल भाव के भूखे हैं। भावरहित के लिये उनका द्वार सदाबंद है। यथार्थ बात तो यह है कि भगवान हमारी परीक्षा के लिये ही ऐसे अवसर उपस्थित करते हैं। यदि ऐसा अवसर प्राप्त हो जाय तो हम लोगों को बड़ी प्रसन्नता से प्रेमपूर्वक भगवान की आज्ञा समझकर अनाथों, व्याधिपीड़ितों और दुःख प्रस्तों की सहायता करनी चाहिये। उन्हें मार्ग में छोड़ जाना तो स्वयं अपने हाथों से मंगलमय भगवान के पवित्र धामके पटको बंद कर देना है यदि हम अपने इन कर्तव्योंका पालन करते हुए तीर्थयात्रा करें तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस प्रकार धर्म के लिये कुत्ते को अपनाने के कारण महाराज युधिष्ठिर के सामने साक्षात् धर्म प्रकट हो गये थे, ठीक उसी प्रकार हमारे सामने भगवान् भी प्रकट हो सकते हैं।


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