काश हर हिन्दुस्तानी इन्दौरी हो जाए! -दिनेश मालवीय

काश हर हिन्दुस्तानी इन्दौरी हो जाए!

-दिनेश मालवीय

भारत के स्वच्छता सर्वेक्षण में लगातार चौथी बार प्रथम रहने का गौरव हासिल कर इंदौर ने एक कीर्तिमान स्थापित किया है. यह सिर्फ इंदौर के लिए नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश के लिए गर्व की बात है. भोपाल तो पिछले तीन साल से लगातार पहले क्रम में आने के लिए इंदौर के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कर रहा है, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. बहरहाल इस साल भोपाल को सबसे सुंदर राजधानी नगर होने का रूतबा ज़रूर हासिल हो गया है. लेकिन स्वच्छता की दिशा में इंदौर को पीछे छोड़ना बहुत मुश्किल है.

इसके पीछे रहस्य यह है कि इंदौर ने लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव सिर्फ सरकार और नगर पालिक निगम या जिला प्रशासन के दम पर ही हासिल नहीं किया है. बेशक इनके प्रयास के बिना यह संभव नहीं होता, लेकिन एक ऐसा मूलमंत्र है, जिसके कारण यह संभव हो सका. वह मूलमंत्र है शहर को स्वच्छ रखने के लिए आम इन्दोरियों की जागरूकता और सक्रिय सहयोग.

मैं कुछ दिनों पहले इंदौर में अपनी बहन के घर गया था. रात को भोजन के बाद मेरे भानजा बोला कि चलो मामाजी आपको इंदौर की मशहूर पान की दुकान से पान खिलाकर लाते हैं. उसका स्वाद आप हमेशा याद रखोगे. मैं सहर्ष तैयार हो गया. उसने अपनी गाड़ी निकाली और बहुत लम्बा चक्कर लगाकर मुझे उस दुकान तक ले गया. मालवा की मशहूर सुहानी शाम में का नज़ारा देखकर मुझे इतना आनंद आया कि मैं मदमस्त हो गया. इस आनंद का आनंद लेते हुए हम उस दुकान तक गए.

भानजे ने कहा कि मामाजी आप गाड़ी में ही बैठो, मैं पान लेकर आता हूँ. मैं गाड़ी में बैठा हुआ कभी आते-जाते लोगों को देखता तो कभी निरभ्र आकाश में तारों को देखते हुए और मदमस्त होने लगा. भानजा पान लेकर आया. पान को बहुत तरतीब के साथ सुंदर कागज में पैक किया गया था. मैंने कागज़ मैं से पान निकाला, मुंह में डाला और कागज को गाड़ी से बाहर सड़क पर फैंक दिया.

भानजे ने मुझे ऐसे देखा जैसे कि मैं कोई अजीब जंतु हूँ. फिर वह गाड़ी से उतरा और उसने वह कागज उठाकर रोड के किनारे रखी डस्टबिन में डाल दिया और गाड़ी में वापस आ गया. मैं ठहरा भोपाली. मुझे अपना यह काम कुछ अजीब नहीं लगा, लेकिन भानजे के इस व्यवहार को देखकर मुझे एक सुखद आश्चर्य ज़रूर हुआ.

पूछने पर उसने बताया कि इंदौर में कोई भी इस तरह कोई कागज या दूसरा कचरा सड़क पर नहीं फैंकता. मैंने पूछा कि क्या ऐसा करने पर कोई सजा मिलती है? वह बोला कि सजा की बात अपनी जगह है, लेकिन इंदौर के लोगों ने यह अनुशासन स्वयं पाल रखा है. इतना ही नहीं, आपको कोई भी “ जहाँ कहीं दिखी जगह” की तर्ज पर मूत्र त्याग करते नहीं मिलेगा. हर कोई बाकायदा जगह-जगह बनाए गये मूत्रालयों में ही यह करता है.

मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. मेरी समझ में यह बात आ गयी कि जब तक आम शहरी किसी काम में सक्रिय सहयोग नहीं, करे तो कोई भी शहर स्वच्छ नहीं रह सकता. सिर्फ स्वच्छता तक ही सीमित क्यों रहा जाए. कोई भी सार्जनिक काम नागरिकों के भीतर इस तरह के जज्बे के बिना मुमकिन नहीं है. मैंने भानजे की बहुत तारीफ़ की और इन्दौरियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया.

पान सचमुच बहुत गजब का स्वादिष्ट था. हम पान के जायके का आनंद लेते हुए घर की ओर वापस चल पड़े. रास्ते भर मैं इंदौर के लोगों के जज्बे की सरहाना करते हुए सोचता रहा कि काश मेरे भोपाल में भी ऐसा हो जाए! भोपाल हीक्यों, पूरे देश में ऐसा हो जाए.

 

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