कंस को उसकी बहन देवकी ने अपनी संतानों की हत्या के लिये कर दिया था माफ : DINESH MALVIYA


स्टोरी हाइलाइट्स

कंस को उसकी बहन देवकी ने अपनी संतानों की हत्या के लिये कर दिया था माफ, भाई के लिये बहन के स्नेह की अनूठी मिसाल.Kansa Was Forgiven By His Sister

कंस को उसकी बहन देवकी ने अपनी संतानों की हत्या के लिये कर दिया था माफ भाई के लिये बहन के स्नेह की अनूठी मिसाल आज हम आपके सामने एक ऐसा प्रसंग लेकर आये हैं, जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। मित्रों, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि द्वापर युग में मथुरा का राजा कंस हुआ। वह उस समय के सबसे क्रूर आतताइयों में शामिल था। मगध का राजा महाबलशाली दुष्ट जरासंध उसका ससुर था। कंस ने अपने ही पिता शूरसेन को बंदी बना कर राज्य हथिया लिया था। उसके राज्य में अन्याय और अत्याचार का बोलबाला था। लेकिन बुरे से बुरे व्यक्ति में किसी के प्रति स्नेह और प्रेम अवश्य होता है। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। इन भाई बहन का प्रेम एक आदर्श था। कंस के बहन के प्रति स्नेह का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वसुदेव के साथ विवाह के बाद जिस रथ में देवकी अपनी ससुराल जा रही थी उसे स्वयं कंस ने खींचा था। लेकिन कहते हैं न कि हर संबंध की एक एक्सपायरी डेट होती है। कौन अपना कब शत्रु हो जाये और कौन शत्रु कब मित्र बन जाये, कहा नहीं जा सकता। जीवन कहीं भी नाटकीय मोड़ ले सकता है। इस प्रसंग में भी ऐसा ही हुआ। आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी। वहाँ उपस्थित एक ऋषि ने भी इसकी पुष्टि की। यह सुनते ही कंस का रूप विकराल हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागृह मे डाल दिया। उसने उनकी हत्या नहीं की, क्योंकि वसुदेव ने उसे वचन दिया कि वह उनसे होने वाली हर संतान को तुरंत उसके हवाले कर देंगे। इस प्रकार वसुदेव और देवकी की छह संतानों को जन्म के तुरंत बाद ही कंस ने शिला पर पटककर मार दिया। इस स्थिति मे फिर एक नाटकीय मोड़ आया। वसुदेव और देवकी की सातवीं संतान कन्या हुयी। वह कन्या दिव्य थी। जैसे ही कंस ने उसे शिला पर पटक कर मारने के लिये उठाया, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश मे चली गयी। कन्या ने कहा कि हे कंस! तूने मुझे मारने का प्रयास किया। जिस समय शत्रु तुझे घसीट रहा होगा, मैं तेरे शरीर का गर्म ख़ून पियूँगी। जो व्यक्ति दूसरों को डराता है, वह स्वयं भीतर से बहुत डरा हुआ होता है। जो व्यक्ति दूसरों को मौत के घाट उतारने मे ज़रा भी संकोच नहीं करता, वह ख़ुद अपनी मौत से बहुत डरता है। कंस के साथ भी ऐसा ही हुआ। कन्या की बात से वह बहुत ख़ौफज़दा हो गया। हरिवंश पुराण के अनुसार वह भागा भागा देवकी के पास गया। उसने कहा कि बहन! मैंने अपनी मृत्यु से बचने के लिये तुम्हारी संतानों को मार डाला। मैंने यह कार्य बहुत क्रूरता से किया। बहन! अपने पुत्रों की मृत्यु से होने वाले संताप को त्याग दो। काल ही उनके विपरीत हो गया था। मैं तो उनके वध मे निमित्त मात्र था। काल ही मनुष्य का शत्रु है, जो मनुष्य को क्षण भर मे एक अवस्था से दूसरी अवस्था मे ला देता है।  कंस ने बहन से रोष को त्याग ने का अनुरोध किया। बहन का प्रेम बहुत अद्भुत होता है। भाई के बड़े से बड़े अपराध को वह माँ की तरह पल भर मे क्षमा कर देती है। देवकी भी रो पड़ी। उसने मातृवत स्नेह के साथ कहा कि मेरी संतानों की मृत्यु का कारण तुम अकेले नहीं हो। काल भी इसका कारण है। आज तुम्हारे द्वारा किये गये पश्चाताप के कारण मे इस कष्ट को सह लूँगी। मृत्यु तो गर्भ मे ही निश्चित हो जाती है। किसी भी आयु मे विधि के विधान के अनुसार मनुष्य को मृत्यु आ सकती है। तुम्हारे जैसे लोग तो निमित्त मात्र होते हैं। अत: तुम जाओ मुझे संतानों की मृत्यु के कारण जो दुःख हुआ है उसके लिये विचार मत करो। इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैं तुम्हें क्षमा करती हूँ। इस प्रकार हम देखते हैं कि बहन का हृदय कितना विशाल होता है। वो लोग भाग्यशाली हैं, जिनकी बहनें होती हैं। कैसी भी परिस्थिति में बहन को दुखी मत कीजिये। वह माँ का स्वरूप होती है। उसका निश्छल प्रेम बहुत बड़ी दौलत है।