खाण्डेराव बाबा जिला- बड़वानी : दुःखियों के दु:खड़े दूर करने चमत्कारी देव

खाण्डेराव बाबा

जिला- बड़वानी

निमाड़ी भाषा में खाण्डे का अर्थ तलवार होता है, अर्थात् जो देव तलवार (खाण्डा) को धारण करे, वह खाण्डेराव कहलाता है। खाण्डेराव जी का जन्म महाराष्ट्र में पूना जिले के जेजूरी ग्राम में हुआ था। ये बचपन से ही बड़े विलक्षण बालक थे। बड़े होने पर गरीब और पीड़ितों की पीड़ा हरने लगे। दुःखियों के दु:खड़े दूर करने से इनकी ख्याति पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। तब ये जेजूरी से शिरपुर में आ गये। शिरपुर में भी रोगियों की मदद करते-करते इतनी भीड़ बढ़ती गई कि इनकी दैनिक ईश्वर आराधना और पूजा-पाठ में व्यवधान होने लगा तो ये शिरपुर से निमाड़ में नर्मदा तट पर कठोरा गाँव में आ गये। लोक मान्यता है कि कठोरा में इनकी मुलाकात ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से होती है। इस स्थान पर दोनों ने अपने-अपने आराध्यों की पूजा इबारत की। दोनों बाद में ग्यारह लिंगी घाट (कठोरा) से रवाना होकर बड़वानी जिले के ग्राम- ठीकरी में आ गये। 

देवा तुझी सोन्याची जेजुरी - पोस्ट | Facebook
जिनके घर ठहरे उन माता के घर पर एक कुंवारी गाय (केड़ी) थी। उस केड़ी को देखकर ये दोनों बोले माता! हम दोनों इस केड़ी का दूध पीना चाहते हैं। तब उसने कहा- नहीं बाबाजी ! मैं अन्यत्र से दूध माँग लाती हूँ। यह कुँआरी गाय है दूध नहीं देगी। तब दोनों ने माता को जनता के सामने ही कुँआरी गाय को दुहने का आदेश दिया और कहा कि खाण्डेराव बाबा का नाम लेकर दूध दुहना, यह गाय अवश्य दूध देगी। तब उस माता ने वैसा ही किया, गाय ने भी दूध दिया। दोनों ने दूध पिया और अन्यों को भी पिला दिया। सब लोग यह देखकर दंग रह गये। फिर उस गाय ने गोबर किया तो उस गोबर के आधे भाग में खाण्डेराव की मूर्ति तथा आधे गोबर में ख्वाजा की मूर्ति निकली। यह देखकर जन समुदाय दोनों की जय-जयकार करने लगा। दोनों ने जाते समय एक व्यक्ति को आशीर्वाद दिया और कहा कि पाँच दिन तक बैठक करो, विवाह जैसा उत्सव मनाओ, हल्दी लगवाओ, उपवास कर फिर ठीकरी गाँव में हमारे नाम से गाड़े खींचो तथा इस परम्परा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करते रहना व जीवित रखना। 

तभी से आज तक ठीकरी में उनके नाम से गाड़े खींचे जा रहे हैं। ग्राम-ठीकरी में खाण्डेराव बाबा का मन्दिर भी है और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी बनी है। खाण्डेराव की मूर्ति पत्थर पर उत्कीर्ण है, जिसमें घोड़े पर तलवार धारण किए हुए खाण्डेराव बाबा हैं। फागुन माह की पूर्णिमा के पूर्व की तेरस को मन्दिर में परिवार वाले और अन्य व्यक्ति तेरह किलो तिल्ली लेकर तेली के यहाँ से घाणे में तेल निकालकर लाते हैं। आने-जाने में बाजे-गाजे से काम करते हैं। इसी तेल से मन्दिर में दीपक जलाते हैं। जो बड़वा गाड़े खींचता है, उसे भी इसी दिन से हल्दी में यही तिल्ली तेल मिलाकर दूल्हे की भाँति नहलाते हैं। इस दिन से बड़वा उपवास चालू कर देता है।

इस दिन से धुलेड़ी तक भक्त जनों का आना-जाना, मन्दिर में विवाह जैसी चहल-पहल, बाजे-गाजे, खाना-पीना आदि चलता रहता है। फिर धुलेण्डी के दिन 21 या 31 गाड़े बड़वे द्वारा खीचें जाते हैं। आगे की गाड़ी की जोड़ी (जुआ) चन्दन की लकड़ी की होती है। जो बड़वा गाड़े खींचता है उसको खाण्डेराव बाबा की सवारी आ जाती है। वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को भी आवाज लगाकर स्मरण करता है। यह भी माना जाता है कि खाण्डेराव व ख्वाजा की स्मृति में 850 वर्षों से अनवरत गाड़े खींचे जा रहे हैं। इस दृश्य को देखने आसपास के गाँवों से लोग आते हैं। फागुन की धुलेण्डी के दिन पूरी ठीकरी खाण्डेराव बाबा की जयकारों से गुंजायमान हो जाती है। इनके नाम से मेला भी लगता है। निमाड़ी में खाण्डेराव की शिव मल्हार नाम से गाथा भी हैं।


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