जाने भोजपुरी का रोचक इतिहास.. लोकप्रियता में सबसे आगे क्यूँ है ये बोली? .. कहाँ तक है विस्तार?

भोजपुरी भाषा का उद्भव

राष्ट्र भाषा हिन्दी की परिधि में हिन्दी की अन्य बोलियों की अपेक्षा बोली, विभाषा और भाषा के रूप में भोजपुरी का विशिष्ट स्थान है 50,000 वर्गमील विस्तीर्ण और लगभग छः करोड़ भाषा-भाषियों द्वारा व्यवहृत यह क्षेत्रीय लोकभाषा है, जो संख्या की दृष्टि से संसार की बोलियों में परिगणित है। ग्रियर्सन ने इसे मागधी परिवार की पश्चिमी शाखा बिहारी के अन्तर्गत रखा है, जिसकी मगही, मैथिली तथा भोजपुरी तीन बोलियाँ हैं। डॉ0 जयकान्त मिश्र ने अपने शोध-प्रबन्ध में इसका खण्डन किया है। उनका तर्क है कि भोजपुरी का सम्बन्ध बिहार की अपेक्षा उत्तर प्रदेश से अधिक है उन्होंने डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी के इस मत को आधार बनाकर अपने मत की पुष्टि की है कि भोजपुरी क्षेत्र पर सदा पश्चिम का प्रभाव रहा है। डॉ0 ग्रियर्सन ने यह स्वीकार किया है कि मैथिली और मगही का पारस्परिक सम्बन्ध जितना घनिष्ठ है, उतना उनमें से किसी का भी भोजपुरी के साथ नहीं है। एक ओर मैथिली और मगही और दूसरी ओर भोजपुरी के धातुरूपों में जो स्पष्ट भेद है, उसको दृष्टि में रखते हुए डॉ0 सुनीति कुमार चटर्जी ने भोजपुरी को मैथिली-मगही से भिन्न एक पृथक वर्ग पश्चिमी मागधी' के अन्तर्गत रखा है। डॉ० उदय नारायण तिवारी भी ग्रियर्सन के मत का समर्थन करते हुए भोजपुरी को 'बिहारी वर्ग में रखते हैं। उनका कथन है कि भोजपुरी पूर्वी मागधी परिवार की सबसे पश्चिमी बोली है। ग्रियर्सन ने पश्चिमी मागधी को बिहारी के नाम से अभिहित किया है। बिहारी से ग्रियर्सन का उस एक भाषा से तात्पर्य है जिसकी मगही, मैथिली तथा भोजपुरी तीन बोलियाँ हैं। इन मतों से भिन्न मत रखते हुए डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने ग्रामीण हिंदी में भोजपुरी को हिन्दी क्षेत्र में माना है, जबकि पं0 ज्वाला प्रसाद जायसवाल ने 'कोशिका का व्याकरण लिखकर यह सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है कि भोजपुरी अवधी की सगी बहन नहीं तो कम से कम सौतेली बहिन अवश्य है। डॉ० विश्वनाथ प्रसाद ने भोजपुरी भाषा के ऐतिहासिक और रूपगत अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि भोजपुरी' प्राच्य भाषा वर्ग के अन्तर्गत आती है, जिसके पश्चिमी रूप अर्धमागधी और पूर्वी रुप मागधी के बीच के प्रदेश से सम्बद्ध होने के कारण उसमें अंशतः दोनों के लक्षण पाये जाते हैं। इस विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत डॉ0 विश्वनाथ प्रसाद के उपर्युक्त में से साम्य रखता है। इस प्रकार भोजपुरी बोली का सम्बन्ध अर्द्ध-मागधी और मागधी दोनों अपभ्रंशों से है, किन्तु भोजपुरी को पूर्णतः न तो अर्द्ध-मागधी और न मागधी से ही विकसित माना जा सकता है।

भोजपुरी नामकरण

भोजपुरी भाषा के नामकरण का इतिहास बड़ा ही रोचक है। इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। नामकरण को लेकर जो भी तर्क दिये गये हैं, उनमें निम्न चार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं -

(1) मालवा के राजा भोजदेव के नाम पर भोजपुर -

जार्ज ग्रियर्सन", श्री दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह और शाहाबाद गजेटियर" के अनुसार जब मालवा के अन्तिम राजा भोजदेव ने इस क्षेत्र को जीता तो उन्होंने भोजपुर की नींव रखी, जो आजकल नवका भोजपुर तथा 'पुरनका भोजपुर के नाम से प्रसिद्ध है। राजा भोज के किले का भग्नावशेष आज भी पुरनका भोजपुर के रूप में अवशिष्ट है।

(2) गुर्जर प्रतिहार मिहिर भोज के नाम पर भोजपुर -

श्री पृथ्वी सिंह मेहता ने ग्रियर्सन के मत का खण्डन करते हुए यह तर्क दिया है कि मालवा का राजा भोज महमूद गजनवी का समकालीन था। वह बिहार कभी नहीं आया था। उनके अनुसार गुर्जर प्रतिहार मिहिर भोज ने अपने नाम से भोजपुर किले की स्थापना की और उसी नाम से आसपास की बोली प्रसिद्ध हुई।

(3) उज्जैन के भोजन के नाम पर भोजपुर

डॉ0 उदयनारायण तिवारी और डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय के मत से भोजपुरी बोली का नामकरण शाहाबाद जिले के भोजपुर परगना के आधार पर हुआ है। कहते हैं कि शाहाबाद जिले में भ्रमण करते हुए डॉ० बुकनन सन् 1812 ई0 में भोजपुर आये थे। उन्होंने मालवा के भोजवंशी उज्जैन राजपूतों के हाथों चेरों जाति के पराजय की घटना के सम्बन्ध में लिखा है। 

(4) विश्वामित्र के यजमान भोजन के नाम पर भोजपुर

डॉ0 ए0 बनर्जी शास्त्री का तर्क है कि भोजपुर का नामकरण मालवा या उज्जैन के राजा भोज के नाम पर नहीं हुआ है, वरन् विश्वामित्र के यजमान भोजों के नामानुसार हुआ है। डॉ0 ए0 बनर्जी शास्त्री का कथन है कि विश्वामित्र जिन लोगों के बीच अपने यज्ञ कराते थे, उन्होंने उन्हें 'इमे भोजाः कहा है। ऐतरेय ब्राह्मण में राजपरिवार द्वारा भोज' उपाधि धारण करने का उल्लेख मिलता है।" डॉ० बनर्जी का मत ऋग्वेद" पर आधारित है, जो इस प्रकार है -

इमे राजा अंगिरसो विरूपा द्विवस्युत्रासो असुरस्य वीराः । विश्वामित्राय ददतो मधानि हसावे प्रतिरन्त आयुः।।

डॉ० ए० बनर्जी शास्त्री के मत का उल्लेख करते हुए डॉ० श्रीधर मिश्र का अनुमान है- सम्भव है कि विश्वामित्र के ये यजमान भोज कहलाये हों और उनका निवास स्थान भोजन की पुरी कहलाई हो और फिर उसी से भोजपुर हो गया हो नामकरण सम्बन्धी इन मतों में डॉ0 उदयनारायण तिवारी ने आईने-अकबरी' के एक वृत्तान्त का उल्लेख करते हुए प्रमाणित किया है कि उज्जैन के भोजों के नाम पर ही भोजपुर नाम पड़ा, जिन्होंने प्राचीन काल में इस क्षेत्र को विजित कर उस पर शासनस्थापित किया था। डुमरांव के निकट भोजपुर नगर ही इनकी राजधानी थी। नवरत्नदुर्ग का ध्वंशावशेष अब भी वहां वर्तमान है। इसके स्थापत्य से यह स्पष्ट हो जाता हैकि यह मध्य युग की निर्मिति है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राचीन नगर भोजपुर के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम भी भोजपुर पड़ गया, जो आगे चलकर इस नाम के परगने तथा जिले के नामकरण का आधार बना। भोजपुर नगर के दक्षिण तथा वर्तमान आरा जिले के उत्तर का आधा भाग प्राचीन काल में इस प्रदेश की सीमा थी। इस बात का उल्लेख मिलता है कि 18वीं शताब्दी में भोजपुर एक प्रान्त था। धीरे-धीरे इसका विशेषण भोजपुरी, इस प्रदेश के निवासियों तथा उनकी बोली के लिए भी प्रयुक्त होने लगा, चूंकि इस क्षेत्र (प्रान्त) की बोली ही इसके उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम में भी बोली जाती थी, इसलिए भौगोलिक दृष्टि से भोजपुर प्रान्त से बाहर होने पर भी वहाँ की जनता तथा उसकी भाषा के लिए भोजपुरी शब्द ही प्रचलित हो चला। इस सन्दर्भ में डॉ० तिवारी निष्कर्ष है- 'यह एक विशेष बात है कि भोजपुर के चारों ओर की ढाई करोड़ से अधिक जनता की बोली का भोजपुरी हो गया। प्राचीन काल में भोजपुरी का यह गोत्र काशी मल्ल ता चश मगध एवं झारखण्ड (वर्तमान छोटा नागपुर) के अन्तर्गत भा मुगलों के राजत्व काल में जब भोजपुर के राजपूतों ने अपनी वीरता तथा सामरिक शन्ति का विशेष परिचय दिया, तब एक ओर जहाँ भोजपुरी शब्द जनता तथा भाषा दोनों का वाथक बचकगोरत का द्योतन करने लगा, वहीं दूसरी ओर वह एक भाषा के नाम पर प्राचीन काल के तीन प्रान्तों को एक प्रान्त में गूंथने में भी समर्थ हुआ!

भोजपुरी की व्याप्ति

भोजपुरी एक जीवन्त भाषा है। यह भाषा लगभग 50 हजार वर्गभील में फैली ह है। इसकी सीमान्त रेखाएँ किसी एक प्रान्त की राजनैतिक सीमा से सम्ब्द नह) है। इस भाषा के क्षेत्र के अन्तर्गत वर्तमान भारतवर्ष को चार राज्यों के भू-भाग आते है। विधार प्रान्त के चंपारण, बेतिया, सारन, सीवान, गोपालगंज, शाहाबाद, झारखण्ड राज्य को रांची, छोटा नागपुर और पलामू जिले के अधिकांश क्षेत्रों में भोजपुरी बोली जाती है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, वाराणसी, मिर्जापुर, जौनपुर के अधिकांश पूर्वी भाग आजमगढ़, गोरखपुर, देवरिया और बस्ती जिले के अधिकांश पूर्वी भाग भोजपुरी भाषाभापी हैं। बस्ती जिले के उत्तर चम, नेपाल की में स्थित, यह सीमा 'जरवा' तक चली जाती है। यहाँ पर भोजपुरी की सीमा एक ऐसी पट्टी बनाती है, जिसका कुछ भाग नेपाल की सीमा के अन्तर्गत तथा कुछ भारतीय सीमा के अन्तर्गत आता है। यह सीमा बहराइच तक चली गयी है। इसमें 'थारू बोली' बोली जाती है. जिसमें भोजपुरी के ही रूप मिलते हैं। मध्य-प्रदेश के बहुत से क्षेत्रों में भोजपुरी भाषा का प्रसार है।

भोजपुरी जनसंख्या

ग्रियर्सन ने ब्रिटिश भारत के 32 जिलों में विकसित भोजपुरी भाषा-भाषियों की संख्या 3, 86, 878 बतलाई है। वर्तमान समय तक इस ऑकड़े में वृद्धि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। आज भारत के अतिरिक्त मारीशस तथा फिजी द्वीपों में प्रवसित 70 प्रतिशत जनसंख्या भोजपुरी भाषा भाषी है दक्षिण अफ्रीका, केनिया राणा गुना में भी भोजपुरी भाषा व्यवहार होती है इस प्रकार बिहार और उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त भारत के अन्य प्रदेशों में तथा विदेशों में भी भोजपुरी भाषाभाषियों की कुल संख्या साढ़े पांच करोड़ से भी अधिक ठहरती है|


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