जाने भारतीय जीवन मूल्यों का मर्म : भौतिकवाद बनाम अध्यात्मवाद

भारत के लोगों की तासीर दूसरे लोगों से अलग है| भारत अकेला देश है जहां पर लोगों ने बाहर की यात्रा से ज्यादा भीतर की यात्रा पर जोर दिया| ऐसा सभी के साथ नहीं है| लेकिन भारत के ज्यादातर लोग मानते हैं कि खुदको जानना ही जीवन का सबसे बड़ा मकसद है और इसी को ईश्वर प्राप्ति माना गया है|

भारत में हजारों साल से लाखों लोगों ने अपनी जिंदगी को सांसारिक सुख-सुविधाओं से हटाकर सिर्फ और सिर्फ आत्मज्ञान की प्राप्ति में लगा दिया| कुछ लोगों ने तो तत्व-दर्शन के लिए पूरी जिंदगी गुफा, कंदरा, बर्फीली वादियों और घनघोर जंगलों में तपस्या /साधना करते हुए बिता दी|

हमारे देश में आज भी ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने भौतिक संसाधनों से ज्यादा आध्यात्मिक साधन को महत्व दिया है| अध्यात्म हमारी जड़ों में है और आध्यात्मिक  समृद्धि भारतीय दर्शन के केंद्र में | आज भी सामाजिक बंधनों में बंधे लोग आंतरिक उन्नति के लिए बाहरी चीजों का त्याग करने में पीछे नहीं हटते | यही वजह है कि भारत में इतनी महान चेतनाएं पैदा हुयी, जिनकी  त्याग, तपस्या और साधना का प्रतिफल आज भी इस भारत भूमि पर मौजूद है|

मानव सभ्यता में सबसे ज्यादा तपस्वी भारत भूमि पर हुए| और उन सब की तपस्याओं का प्रतिफल आज भी इस धरती की चेतना में मौजूद है| इसलिए जब भी कोई साधारण व्यक्ति आध्यात्मिक साधना के पथ पर आगे बढ़ता है तो उसे वह वाइब्रेशन  महसूस होने लगते हैं|

इस देश में न जाने कितने लोगों ने चेतना की चरम अनुभूति प्राप्त की| भाव और भक्ति से भी आत्मा का साक्षात्कार किया| यहाँ अंधविश्वास भी है और रूढ़ीवाद भी,  इन बुराइयों के पीछे देश का पिछले दो ढाई हजार साल का वह इतिहास है जब देश की विरासत को विदेशी आक्रमणों ने छिन्न-भिन्न कर दिया इसके बावजूद  इस देश की अध्यात्म की मूल चेतना आज भी मौजूद है और लगातार बढ़ रही है| रूढ़िवादी, अंधविश्वासी किस देश, धर्म, मत और संप्रदाय में नहीं है?

सत्य का साक्षात्कार करना कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं हैं | दुनिया में सत्य को लेकर बातें बहुत होती है, तर्क वितर्क और दर्शन की किताबों के ढेर लगा दिए जाते हैं| लेकिन सत्य पढ़ लिख कर या तर्क वितर्क से, चर्चाओं से हासिल नहीं होता| सत्य को प्राप्त करने का साधन साधना ही है, और साधना के लिए त्याग की जरूरत होती है| त्याग वही कर सकता है जो इसका महत्व जानता है| भारत के लोगों ने उस सत्य को जानने के लिए कष्ट, बीमारियां देखे , भूख सही, भीख भी मांगी, महलों को भी छोड़ा|

हम जानते हैं कि बाहरी संसाधनों का मोल बहुत ज्यादा नहीं है,  क्योंकि एक व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी में जो कुछ भी इकट्ठा करता है एक दिन उसे वह सब कुछ छोड़ देना पड़ता है| भारतीय दर्शन ने कहा कि जिन चीजों को एक दिन छोड़ना ही है, उन चीजों के पीछे पूरी जिंदगी को खपा देने में कोई होशियारी नहीं|  ऐसी चीज को प्राप्त करने में अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लगाओ जो एक बार मिल जाए तो उसे खोना नहीं पड़े| ये संपदा चिरस्थाई होगी, अगले जन्म में जब भी तुम इस धरती पर आओगे तो तुम उसके आगे की यात्रा ही करोगे|

इसका अर्थ ये नहीं है कि भारत ने भौतिक और लौकिक जीवन को नाकारा है या भारत का धर्म जीवन के प्रति नकारात्मक है|  भारत में अध्यात्म के साथ भौतिक जीवन को साधते हुए अध्यात्मिक मूल्यों पर चलने का सन्देश दिया गया है |

राजा जनक ने चक्रवर्ती होते हुए भी आत्मतत्व को जाना| श्री कृष्ण द्वारकाधीश थे लेकिन महाराजा होते हुए भी योगेश्वर कहे जाते है|

भौतिक सम्पत्ति आपके शरीर के साथ छूट जाती है लेकिन आपके द्वारा अर्जित अध्यात्मिक संपदा अगले जन्म में भी आपके साथ जाती है|

जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम् ईशा वास्यम्। तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः। कस्यस्वित् धनं मा गृधः ॥

इस एक मंत्र में भारतीय दर्शन समाहित है| ईश्वर सर्वव्यापक है, भौतिक जगत में रहते हुए भी अध्यात्म के लक्ष्य को न भूलना, और सांसारिक लोभ लालच में न फसना|

“सब तज हरि भज” इसका अर्थ ये नहीं कि घर बार ही छोड़ दिया जाये आशय यह है कि घरबार में रहते हुए भी अपने परम लक्ष्य को न भूलना| अपने कर्म को भी साधन बनाते हुए उस सत्य की तरफ आगे बढ़ते रहना|

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें

तुलसीदास जी कि इन चौपाइयों से साफ़ है कि हमारे जीवन का केंद्र ईश्वर होना चाहिए और भारत ने इसी दर्शन पर चलकर भौतिकता की ज़मीन पर अध्यात्म की इमारत खड़ी की|  जीवन की समस्त बुराइयों को त्याग कर प्रभु के बताए वेद मार्ग पर चलो। दुखियों का दर्द मिटाओ, भूलों को मार्ग बताओ, मन-वचन-कर्म से परोपकार करो। यही भगवान की भक्ति है, सेवा है (भज सेवायाम)

तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः का अर्थ है हे मनुष्यों। तुम त्यागपूर्वक भोगों को भोगो। जरुरत से ज्यादा संग्रह मत करो। जो तुमने भोग लिया उसे दूसरों के लिय छोड दो। यदि ऐसा न करोगे, स्वयं ही भोगते रहोगे तो एक दिन तुम भोगों सहित नष्ट हो जाओगे। आखिर में तुमको त्यागना ही पड़ेगा। मृत्यु तुमसे सबकुछ छुडा लेगी|  जिस वस्तु में हम अपनापन जोड़ लेते हैं, उसमें मोह का होना स्वाभाविक है। मोह के कारण उसे त्यागने में बहुत कष्ट होता है।

यही बात तुलसीदासजी ने कही।

“मोह सकल व्याधिन कर मूला। तिहिते उपजत है बहु शूला”

मोह से छुटकारा त्याग की भावना से ही सम्भव है। इसीलिए यह मंत्र कहता है, भोगों में फॅसो मत, भोगो ज़रूर, फिर इन्हें त्यागते हुए आगे बढ़ो। ज्ञानी लोग भोगों को चखकर तुरन्त त्याग देते हैं, अति की ओर नहीं जाते।

भारत के अध्यात्म और धर्म का यही मर्म है|

 

ATUL VINOD



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