क्या कुण्डलिनी जागरण से घर परिवार छूट जाता है?

हर मनुष्य के अन्दर एक अनन्त चेतना शक्ति निवास करती है, उस शक्ति के दो स्वरूप हैं बहिर्मुखी एवम् अन्तर्मुखी ।बहिर्मुखी रूप में कुण्डलिनी हमारी पाँचों इन्द्रियों द्वारा अलग अलग आधिभौतिक कार्य सम्पन्न कराती है और अन्तर्मुखी रूप में आध्यात्मिक संसार की अनुभूतियाँ कराती है।

भिन्न-भिन्न देशों में कुण्डलिनी सम्बन्धी विवरण उनके अपने-अपने आचार व्यवहार के आधार पर मिलते हैं। जापान में 'को' नाम से कुण्डलिनी शक्ति की बात की जाती है तो चीन में 'ची' नाम से । ईसाई लोग 'होली- स्पिरिट' कहते हैं तो हिन्दू चिति शक्ति । देवी पूजक चिर कुमारी शक्ति कहते है तो तांत्रिक ऊर्धवरेतः शक्ति । योगी इसी को सर्प की कुण्डली की संज्ञा देते हैं।

कुण्डलिनी जागरण के लाभ

जागृत कुण्डलिनी साधक में क्रियात्मक बदलाव लाती है| 

जागृत कुण्डलिनी एक साथ पूरे शरीर में बदलाव की प्रक्रिया शुरू करती है| शरीर मन मस्तिष्क के कायाकल्प के लिए अलग अलग क्रियाओं के माध्यम से साधक को आगे बढाती है| 

इसके जागरण से अष्टांग योग स्वयम घटित होने लगता है| 

कुण्डलिनी जागरण से साधक के दृष्टिकोण में अद्भुत परिवर्तन आता है, जो जीवन पहले कभी-कभी निराशापूर्ण और कठिन प्रतीत होता था वह अब आनन्दपूर्ण और रमणीय लगने लगता है। साधक में अपनी जीवनचर्या के प्रति एक नया उत्साह पैदा हो जाता है। जो लोग अभी तक सुनते आये थे कि मोक्ष कामी को भोग नहीं, और भोग विलासी को मोक्ष नहीं । वे कुण्डलिनी की कृपा से भोग द्वारा ही मोक्ष का आनन्द लेने में समर्थ हो जाते हैं। कुण्डलिनी के कृपा पात्र बहुत से महात्मा गृहस्थ रहे हैं। 

जो सेवा-निवृत्त अथवा अन्य रूपों से तिरस्कृत व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ समझकर जीवन के प्रति व्यक्ति अनुभव करते हैं, उन्हें कुण्डलिनी जीवन के सच्चे उद्देश्य का ज्ञान कराकर जीवन के प्रति नयी स्फूर्ति उत्पन्न करती है। 

कुण्डलिनी किसी को परिवार से अलग नहीं करती, वह तो व्यक्ति को परिवार की देखभाल करने में अधिक सक्षम और योग्य बनाती है।

कुण्डलिनी आपकी बुद्धि को इस प्रकार विकसित करती है कि आप अपना व्यवसाय और व्यापार अधिक कुशलता से चला सकते हैं। कुण्डलिनी विद्यार्थियों में स्मरण-शक्ति और एकाग्रता बढ़ाती है। अधिकारी वर्ग में प्रशासनिक योग्यता, वैज्ञानिक में आविष्कार क्षमता आदि प्रत्येक प्रकार की गुणवत्ताएँ बहन में कुण्डलिनी सक्षम है। कुण्डलिनी विभिन्न प्रकार की प्रेरणायें और सृजनात्मक शक्तियों का उदय करती है।

 कुण्डलिनी का साधक ही सच्चे अर्थों में संयमीहोता है, चूंकि संयम वही कर सकता है जिसमें शक्ति हो । शक्तिहीन व्यक्ति केवल संयम की बातें करता है, संयम नहीं कर पाता। कुण्डलिनी व्यक्ति को इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति देती है जिससे मनुष्य सहज-संतुष्ट रहता है। जो मनुष्य संतुष्ट हो जाता है वह इन्द्रियों के विभिन्न विषयों के आकर्षण से प्रभावित नहीं होता। इस आशय को ठीक से समझ ले । किसी वस्तु के लिए लालायित होना अलग बात है और उसे आवश्यकता के समय प्रयोग में लाना अलग बात है। जो विषयों के आकर्षण से प्रभावित होता है वह लालायित कहलाता है, विलासी कहलाता है; और जो आवश्यकतानुसार इन्द्रियों के विषय का आनन्द लेता है वह योगी कहलाता है।

 


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