NEWS PURAN DESK 1September 10, 20201min20

कूर्म पुराण संक्षेप -दिनेश मालवीय

कूर्म पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

‘कूर्म पुराण’ की गणना शैव पुराण में की जाती है, लेकिन इसमें विष्णु के प्रभाव को कम नहीं माना गया है. इसमें देवी महात्म्य का भी व्यापक वर्णन है. सगुण और निर्गुण ब्रह्म की उपासना का इसमें सुंदर और सारगर्भित विवरण दिया गया है.

इसमें राजा इन्द्रद्युम्न को ज्ञान, भक्ति और मोक्ष के उपदेश का वर्णन है. उसे लोमहर्षण सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को नैमिशारन्य में सुनाया था. इसीने कूर्म पुराण का रूप धारण कर लिया.

इस पुराण में चार संहिता हैं- ‘ब्राह्मी संहिता’, ‘भागवती संहिता’, ‘शौरी संहिता’ और ‘वैष्णवी संहिता’. इनमें से आज केवल ‘ब्राह्मी संहिता’ ही उपलब्ध है. इस पुराण में शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों सम्प्रदायों का समन्वयात्मक रूप प्रस्तुत किया गया है.

कूर्म पुराण में भी श्रृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से होना बताया गया है. सभी जड़-चेतन स्वरूपों में जीवन का अंश मना गया है और इसे जीवन-अंश को ही ब्रहम का अंश कहा गया है. इस पुराण में वर्णाश्रम धर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है. इसमें कूर्म रूप में भगवान विष्णु स्वयं ऋषियों से चारों आश्रमों का उल्लेख करते हुए उनके दो-दो रूप बताते हैं.

इस पुराण के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के दो भेद हैं. इसमें रहने वाले दो प्रकार के ब्रह्मचारी होते हैं- ‘उपकुवणिक’ और ‘नैष्ठिक”. जो ब्रह्मचारी विधिवत वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है, वह ‘उपकुवणिक’ ब्रह्मचारी होता है. जो व्यक्ति जीवन पर्यंत गुरु के निकट रह कर ब्रह्मज्ञान का सतत अभ्यास करता है, वह ‘नैष्ठिक’ ब्रह्चारी कहलाता है.

गृहस्थाश्रम में रहने वाले व्यक्ति के भी दो प्रकार हैं- ‘साधक’ और ‘उदासीन’.  जो व्यक्ति अपनी गृहस्थी एवं परिवार के भरण-पोषण में लगा रहता है, वह ‘साधक गृहस्थ’ कहलाता है. जो व्यक्ति देवगणों के ऋण, पितृगणों के ऋण और ऋषिगण के ऋण से मुक्त होकर निर्लिप्त भाव से अपनी पत्नी और सम्पत्ति का उपभोग करता है, वह ‘उदासीन गृहस्थ’ कहलाता है.

इसी प्रकार, वानप्रस्थ आश्रम के भी दो रूप हैं-‘तापस’ और ‘सान्यासिक’. जो व्यक्ति वन में रहकर हवन, अनुष्ठान और स्वाध्याय करता है, वह ‘तापस वानप्रस्थी’ कहलाता है. जो साधक कठोर तप से अपने शरीर को कृश और क्षीण कर लेता है और ईश्वराधना में निरंतर लगा रहता है, उसे ‘सान्यासिक वानप्रस्थी’ कहा जाता है.

चौथे संन्यास आश्रम के भी दो भेद हैं-‘ पार्मेष्ठिक’ और ‘योगी. नित्यप्रति योगाभ्यास द्वारा अपनी इन्द्रियों और मन को जीतने वाला तथा मोक्ष की कामना रखने वाला साधक ‘पार्मेष्ठिक सन्यासी’ कहलाता है. जो व्यक्ति ब्रह्म का साक्षात्कार कर अपनी आत्मा में ही परमात्मा के दिव्य स्वरूप का दर्शन करता है, वह ‘योगी सन्यासी’ कहलाता है.

इस पुराण में निष्काम कर्म योग साधना, नारायण, विष्णु, ब्रह्म और महादेव नामो की व्याख्या, चतुर्युग वर्णन, काल वर्णन, नौ प्रकार की श्रष्टयों का वर्णन, मधु-कैटभ राक्षस की उत्पत्ति और उनके वध का दृष्टांत, भगवान शिव के विविध रूपों और नामों की महिमा का वर्णन, शक्ति की उपासना का गूढ़, गहन और भावुक वर्णन, दक्ष कन्याओं द्वारा उत्पन्न संतति का वर्णन, नृसिंह अवतार लीला, भक्त प्रहलाद चरित्र, राजा बलि और भगवान के वामनावतार का वर्णन, पुलस्त्य वंशज रावण का चरित्र, सूर्यवंशी राजाओं की वंशावली, चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली, वाराणसी के विश्वेषर लिंग की महिमा, व्यास और जैमिनी ऋषि के बीच धर्म सम्बन्धी संवाद, स्थूल शरीर से सूक्षम शरीर में जाने का वर्णन, मोक्ष वर्णन और पौराणिक भूगोल आदि का वर्णन भी इसमें मिलता है.

पुराण के उत्तर भाग में ‘ईश्वर गीता’ और ‘व्यास गीता’ का बहुत सुंदर और दार्शनिक विवेचन किया गया है. ईश्वर और भगवान शिव के मध्य संवाद को ऋषिगण ग्रहण करते हैं. इसे ‘ईश्वर गीता’ नाम दिया गया है. इसमें व्यासजी द्वारा ‘महाभारत’ में रचित गीता का गहरा और व्यापक प्रभाव है. इसमें नटराज शिव के विश्व रूप का वर्णन है.

इसमें ‘आत्मतत्व’ के स्वरूप का निरूपण करते हुए स्वयं भगवान् शिव कहते हैं कि जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकार का, धूप और छाया का सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार ‘आत्मा’ और ‘प्रपंच’ एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं. सुख-दुःख, राग-द्वेष, स्थूल और सूक्ष्म आदि आत्मा के लक्षण नहीं हैं. ये सभी विकार हैं, जिन्हें मनुष्य अपने अहंकार के कारण धारण कर लेता है, इसका मूल कारण अज्ञान है, जब योगी सभी प्राणियों में आत्मा का समभाव देखने लगता है, तभी वह सच्चा प्रेमी हो जाता है.

विनम्र साधु पुरुष अपने वास्तविक ज्ञान के कारण विद्वान, विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखता है. जड़-चेतन, पशु-पक्षी, नर-नारी सभी में जो व्यक्ति आत्मा के समान भाव से दर्शन करता है, वही पूर्ण योगी होता है. अर्थात परमात्मा से उसका संयोग हो जाता है. वह उसी की परम ज्योति में लीन होकर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेता है.

इसके अलावा, ‘कूर्म पुराण’ में सांख्य योग के चौबीस तत्वों, सदाचार के नियमों, गायत्री महिमा, गृहस्थ धर्म, श्रेष्ठ सामाजिक नियमों, विविध संस्कारों, पितृकर्मों आदि कि विधियों और चारों आश्रमों में रहते हुए आचार-विचारों के पालन पर विचार किया गया है.

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