क्या शाप और वरदान अब भी फलित होते हैं?-दिनेश मालवीय

क्या शाप और वरदान अब भी फलित होते हैं?

-दिनेश मालवीय

हमारे शास्त्रों में ऐसे दृष्टांत भरे पड़े हैं, जिनमें किसी के शाप या वरदान के कारण किसी का बुरा या भला हो गया. पिछली पीढ़ियों के लोग तो इस पर बहुत अधिक भरोसा करते रहे, लेकिन आज का तथाकथित “ज्ञान” का मारा आधुनिक इंसान इन्हें पुराणों की कपल कल्पित कथा-कहानियाँ मानने लगा है. वह इस बात पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है कि किसी के कुछ कह देने से वह सच हो जाता है. इसीके चलते वह बिना सोचे-समझे बहुत कुछ ऐसे काम करता चला जाता है, जो आगे चलकर न केवल उसके, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ियों तक को प्रभावित करते हैं.

इसमें एक बात जरूर याद रखने और समझने वाली है कि शाप या वरदान देने वाला व्यक्ति स्वयं सही हो और उसके शाप या वरदान में कोई दुर्भावना छुपी नहीं हो. इन बातों का असर होता है या नहीं, यह समझने के लिए आपको कोई rocket science जानने की ज़रूरत नहीं है.

आप स्वयं विचार कर देखिये. स्थूल बुद्धि और सोच को कुछ समय के लिए एक तरफ रखकर चेतना के कुछ सूक्ष्म स्तर पर जाकर आपको यह स्वयं महसूस हो
जाएगा. युगों-युगों से यह एक अनुभूत तथ्य है कि आप जो भी कहते या करते हैं वह आपके पास उसी तरह वापस आता है, जैसे किसी गुफा में अनुगूँज आती है. फर्क इतना है कि गुफा की अनुगूँज से आप पर कोई प्रभाव नहीं होता, लेकिन आपके शब्दों और कर्मों की अनुगूँज से आप बहुत गहरे में प्रभावित होते हैं. अंग्रेजी में भी कहावत है कि Whatever you do comes back to you.

यदि आप किसी निर्दोंष और निरीह व्यक्ति या किसी अन्य जीव को सताते हैं, तो उसके मन से बहुत नेगटिव तरंगें निकलती हैं. वह उसे व्यक्त कर पाए या नहीं, लेकिन उनका आप पर असर होना पूरी तरह निश्चित है. इसी तरह जब आप किसी व्यक्ति या अन्य जीव की मदद करते हैं, तो उसके मन से आपके लिए पॉजिटिव तरंगें निकलती हैं, जो आपके जीवन पर बहुत सकारात्मक प्रभाव डालती हैं.

इसीलिए हमारे बुजुर्गों ने कहा है कि किसी निर्दोष की आह नहीं लेनी चाहिए. आपको तत्काल उसका परिणाम भले ही पता न चले, लेकिन कालांतर में आपके साथ ऐसा कुछ अच्छा या बुरा घटित होगा, जिसकी आपने कल्पना तक नहीं की होगी. निर्दोषों की आह से अनेक ऐसे लोगों के वंश मिट गये हैं, जिन्हें अपनी शक्ति, दौलत और संख्या बल पर बहुत नाज़ था. इसी तरह अनेक लोग आपको मिल जाएँगे, जिनके जीवन में देखते ही देखते ऐसा सकारात्मक बदलाव आता है, कि उन्हें ख़ुद भी कल्पना नहीं रही होती.

सबसे बड़ी आह बुजुर्गों की होती है. वैसे तो सामान्यत: बुजुर्ग इतने सहनशील होते हैं, कि छोटी-मोटी बातों, अपमान अथवा प्रताड़ना से विचलित नहीं होते और अपने साथ ऐसा करने वाले का कभी बुरा नहीं सोचते. लेकिन जब बात हद से गुजर जाती है, तो उनके न चाहते हुए भी उनके मन से आह निकल जाती है, जो उन्हें अपमानित या प्रताड़ित करने वाले के लिए विनाशकारी सिद्ध होती है.

इसी तरह, आप किसी बुजुर्ग की थोड़ी सी भी सेवा करके देखिये. उनके अंतर से आपके प्रति इतनी अच्छी तरंगें निकलेंगी जो आपकी झोली आशीषों और खुशियों से भर देंगी. आपकी आने वाली पीढ़ी तक इससे लाभान्वित होती रहेगी.

याहबात याद रखनी चाहिए कि हमारे शास्त्रों की रचना करने वाले शेखचिल्ली या दिग्भ्रमित लोग नहीं थे. हाँ, यह बात सही है कि चूँकि शास्त्र अधिकतर का व्यरूप में लिखे गये हैं, तो उनमें कुछ अतिशयोक्ति का तत्व आ जाना स्वाभाविक है. लेकिन इसका उद्देश्य भी लोगों के मन में सन्देश को ठीक से बैठाना ही है. शास्त्रों की बातों को पूरी तरह खारिज करना किसी भी तरह विवेकसम्मत नहीं है. खासकर हमारी पीढ़ी कथित आधुनिकता की झोंक में अपने महान पूर्वजों द्वारा लिखित शास्त्रों की कुछ अधिक ही अवहेलना कर रही है. लेकिन याद रखिये कि यह हमारे लिए विनाशक ही सिद्ध होगा. आज कोई भी ऐसा शास्त्र नहीं लिखा जा रहा जो इन बातों के मर्म को उपयुक्त रूप से संप्रेषित करता हो. पुस्तकें तो लिखी जा रही हैं, लेकिन शास्त्र नहीं लिखे जा रहे.

यह कहावत भी बहुत प्राचीन काल से प्रचलित है कि- “कौवे के कोसने से ढोर नहीं मरते”. यह बात भी अपनी जगह सही है. इसीलिए ऊपर कह आया हूँ कि शाप या
वरदान देने वाला ख़ुद सही होना चाहिए. आप यदि किसीको विलावजह व्यक्तिगत राग-द्वेष से ग्रसित होकर शाप या वरदान देंगे, तो उनका कुछ फल नहीं होने वाला.

जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता की कुंजी यही है कि किसीको प्रताड़ित न किया जाए और जितना भी संभव हो दीन-हीन और दुखी लोगों तथा अन्य जीवों की मदद की जाए. आप स्वयं अनुभव करके देख लें. जब आप किसी मजबूर की मदद करते हैं, तो उसकी आँखों में क्या भाव होते हैं. अथवा जब आप किसीको प्रताड़ित करते हैं, तब उसकी आँखों में आपके प्रति क्या भाव होते हैं.

लिहाजा, किसी भी “आधुनिकता” की झोंक में इस बात को मत भूल जाइए कि शाप और वरदान आज भी वैसे ही फलित होते हैं, जैसे पहले होते थे. आगे भी यह नियम
बदलने वाला नहीं है.

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