हानि कारक होता है धान की खेती में पानी खड़ा रखना

हानि कारक होता है

धान की खेती में पानी खड़ा रखना

What is cultivation process?

अधिकर लोग धान की खेती में पानी को खड़ा रखने के लिए खेत में मेड बनाते हैं ,उसमे खूब जुताई करते हैं फिर कीचड़ मचाते हैं जिस से बरसात का या सिंचाई का पानी जमीन के भीतर नहीं जाये। यह गेरकुदरती काम है। ऐसा करने से खेत कमजोर हो जाते हैं। खेत सूख जाते हैं

खेतों में पानी खड़ा रखने के  पीछे खरपतवार को रोकना मात्र उदेश्य रहता है  खेतों में पानी खड़ा रहता है तो उसकी जैव -विवधता मर जाती है। यह जैव विविधता ही असली खाद का काम करती है। जमीन की जैविकता को जिन्दा रखने के लिए हम कुदरती खेती में पानी को रोकने के लिए मेड नहीं बनाते वरन पानी की निकासी के लिए नालियां बनाते हैं। नालियां  हमे केवल एक बार बनानी पड़ता है जबकि मेड  को हर साल बनाना पड़ता है या सुधारना पड़ता है। हमने यह पाया है जरा सी भी मेड खराब हो जाती है  तो सब पानी निकल जाता है इसलि किसान को पानी भरने के लिए  पूरे मौसम पम्प को चलाते रहना पड़ता है। इस से अत्यधिक ऊर्जा का खर्च लगता है और फसल घाटे  का सौदा बन जाती है।

हमारे खेत हमारे शरीर के माफिक जीवित रहते हैं जब हम उन्हें पानी में डुबा देते हैं तो वे हवा की कमी के कारण मर जाते हैं। पानी से भरे खेतों में जो धान की फसल बनती है उसमे अधिक पुआल और कम धान रहती है जबकि बिना भरे खेतों में धान के पौधों में कम पुआल और अधिक धान लगती है। ऐसा असामन्य पौधों की बढ़वार के कारण होता है।

अधिकर किसानो को नहीं मालूम है की खेतों में पानी खड़ा रखने से खेतों की जल धारण शक्ति नस्ट हो जाती है  पानी सूखते ही फसल भी सूख जाती है। खेत की जल धारण शक्ति खेत की जैविकता पर निर्भर रहती है ,जैविकता को जीवित रहने के लिए प्राण वायु की जरूरत रहती है।

धान के पौधों में अच्छी पैदावार के लिए पौधों की जड़ों का घना और गहराई तक जाना जरूरी रहता है यह पानी भरे बिना ही संभव रहता है डूबे खेतों में जड़ें उथली होती हैं जिस से उन्हें भरपूर पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं इसलिए पैदावार में कमी आ जाती है।

कुदरती धान की खेती में खरपतवार नियंत्रण  के लिए पिछली फसल की नरवाई को खेतों में आड़ा तिरछा फैला दिया जाता है जिस से खरपतवारों का  नियंत्रण हो जाता है और नमी का भी संरक्षण हो जाता है। नरवाई की ढकावन  में फसल में लगने वाले कीड़ों का भी नियंत्रण हो जाता है हवा, नमी और रौशनी में बीमारी के कीड़ों को खाने वाले कीड़े पनप जाते हैं और केंचुए जमीन को अंदर तक पोरस बना देते हैं जिस से खेत बरसात का पानी सोख लेते हैं।

कुदरती खेती में सीधे बीजों को फेंक कर उगाया जाता है इसमें रोपा बनाना ,कीचड़ मचाने जमीन की जुताई करने की कोई जरूरत नहीं रहती है। पानी खड़ा नहीं रखने के कारण ऊर्जा की भारी  बचत रहती है जिस से धान की गुणवत्ता और उत्पादकता में भारी  इजाफा रहता है जिस से धान की खेती लाभप्रद बन जाती है

खाद की मात्रा तथा खाद देने का समय
सामान्य तरीके से रोपाई किए गई धान की फसल में 6 किलो प्रति एकड़ बीज, एक थैला डीएपी, चार थैले यूरिया खाद व कई प्रकार की कीटनाशक का प्रयोग किया जाता है और पैदावार 25 से 30 क्विंटल होती है जबकि नई तकनीक से आधा खर्च वहन होता है और दाने की गुणवता ज्यादा व पैदावार ढाई गुणा अधिक होती है |

धान की खेती की प्रचलित पद्धतियां को जानें 

1. सीधे बीज बोने की पद्धतियां- खेत में सीधे बीज बोजकर निम्न तरह से धान की खेती की जाती है-

  • छिटकवां बुवाई।
  • नाड़ी हल या दुफन या सीडड्रिल से कतारों में बुवाई।
  • बियासी पद्धति (छिटकवां विधि) से सवा गुना अधिक बीज बोकर बुवाई के एक महीने बाद फसल की पानी भरे खेत में हल्की जुताई।
  • लेही पद्धति (धान के बीजों को अंकुरित करके मचौआ किये गये खेतों में सीधे छिटकवां विधि से बुवाई)

2. रोपा विधि- इस विधि द्वारा पहले धान की रोपणी (खार) सीमित क्षेत्र में तैयार की जाती है तथा 25 से 30 दिन के पौध को खेत को मचाकर रोपाई की जाती है।

3. बीज की मात्रा- धान के लिए बीज की मात्रा बुवाई के पद्धति के अनुसार अलग-अलग रखनी चाहिए, जो निम्नानुसार होनी चाहिए-

बोवाई बीज दर इस तरह               (किलो/हेक्टेयर)

  • छिटकवां विधि से बोना                  100-120
  • कतारों में बीज बोना                        90-100
  • लेही पद्धति में                                 70-80
  • रोपाई पद्धति में                              40-50
  • बियासी पद्धति                             125-150

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