लव जिहाद:  मानव स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियम -दिनेश मालवीय

लव जिहाद

 मानव स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियम

-दिनेश मालवीय

     “लव जिहाद” शब्द मीडिया में बहुत तेजी से उभर रहा है. इस पर बहस-मुबाहिसे हो रहे हैं. टीवी चैनलों में तीखी नोकझोंक चल रही है. लोगों की राय विभाजित है. कुछ लोग कह रहे हैं कि शादी-विवाह व्यक्तिगत मामला है और इस पर सामाजिक पाबंदियां नहीं लगानी चाहिए. दूसरी राय वालों का कहना है कि यह बात सिर्फ प्यार और शादी-विवाह तक सीमित नहीं है, इसके पीछे बहुत निहित अर्थ हैं. अपने-अपने सन्दर्भ में दोनों बातें सही हैं.

इस घटनाक्रम के बीच मुझे कुछ वर्ष पहले भोपाल में एक हिन्दू लड़की और मुस्लिम युवक की शादी को लेकर मीडिया में हुए बवाल की याद ताजा हो आयी. एक मुस्लिम युवक और हिन्दू लड़की ने भागकर शादी कर ली थी. घटना को मीडिया ने बहुत व्यापक रूप से प्रसारित किया. इसके बाद ज़ोरदार बहस छिड़ गयी. मीडिया, समाजसेवकों, विचारकों, नारी स्वतंत्रता के समर्थकों, धर्म प्रतिनिधियों, साहित्यकारों के साथ-साथ आम आदमी के विचार भी सामने आये. सबकी सोच की खूबियों के साथ-साथ इनकी कमियां भी उजागर हुई . किसी-किसी ने यह भी कहा कि मीडिया ने अंतर-धार्मिक विवाह की एक छोटी सी घटना को बेवजह तूल दिया. ये घटनाएं तो इतने बड़े देश में रोज-ब-रोज कहीं न कहीं होती रहती हैं.

     इस वाकये पर मैंने विचार किया तो कुछ बातें स्पष्ट हुयीं. पहली बात तो यह कि खबरिया चैनलों ने इस मुद्दे पर बहस के लिए जिन मेहमानों को बुलाया और एंकरों ने जिस भाषा का प्रयोग किया, उससे साफतौर पर लगा कि वे जाने-अनजाने इस मुद्दे पर पार्टी बन गये. उन्हें सुनकर लगा कि मानो यह इतिहास में अब तक की सबसे क्रांतिकारी घटना है. शादी के पक्ष में बोलने वालों की हिमायत की गयी और विपक्ष में बोलने वालों को "धर्म के ठेकेदार'',"समाज के ठेकेदार'' जैसे अपमानजनक संबोधन दिये गये. समझने की बात यह है कि जब किसी मुद्दे पर आपने अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों को अपनी बात कहने के लिए बुलाया है, तो वे अपनी बात तो कहेंगे ही.

     इस शादी के पक्ष में बोलने वालों ने कहा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है. एक बालिग लड़के-लड़की ने आपसी स्वैच्छा से शादी कर ली, जिसे देश की अदालत ने भी सही ठहराया. फिर, इस शादी में गलत या बुरा क्या है? बेशक, अगर बात इतनी ही हो, तो इसमें कुछ भी ग़ैर-मुनासिब नहीं है. लेकिन इसका खेदजनक पहलू यह है कि इस बहस में सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एकतरफा ज़ोर देकर सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक और भावनात्मक पक्ष की एकदम अनदेखी की गयी.

    व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव धर्म जैसी बड़ी बातें कहने-सुनने में कितनी ही अच्छी लगती हों, लेकिन इनका अर्थ इतना आसान नहीं है, जितना कि इस शादी का पक्ष लेने वाले बता रहे थे. व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव धर्म को व्यवहार में वही ला सकता है, जिसमें अच्छे-बुरे कि गहरी समझ हो.

    लड़की बारहवीं में पढ़ रही थी. एक सप्ताह बाद उसकी परीक्षा होने को थी. उसने सबकुछ छोड़कर उस लड़के के साथ भागकर शादी कर ली. लड़का मुस्लिम था, जिसे लड़की के माता-पिता और समाज अपनाने को मुश्किल से राज़ी होते. लड़की ने माता-पिता की भावना की ज़रा भी परवाह नहीं की, जिन्होंने उसे लाड़-प्यार से पाला-पोसा. इस घटना से लड़की के माता-पिता और परिजनों पर क्या गुज़री और भविष्य में उनके दूसरे बच्चों के वैवाहिक संबंध आदि उन्हें क्या परेशानियां आएंगी, इस बहस में इसकी पूरी तरह अनदेखी की गयी.

     अब ज़रा लड़के के विवेक का स्तर देख लिया जाए. उसने इस लड़की से शादी करने के लिए जन्म से प्राप्त अपने धर्म को छोड़ दिया. बहस में कहा गया इसमें क्या बुरा है? बुरा धर्म परिवर्तन में नहीं, उसके पीछे मंशा में है. यदि कोई व्यक्ति अपने विवेक दूसरे धर्म को अपनाता है तो अनुचित नहीं, लेकिन इस मामले में धर्म बदलने का मकसद  सिर्फ हिन्दू लड़की से शादी करना था. लड़के ने पहले मसाजिद कमेटी को लड़की का धर्म परिवर्तन कराने की दरख्वास्त दी थी, जिसे कमेटी ने ख़ारिज कर दिया था. लिहाजा, यह मजबूरी और स्वार्थवश किया गया धर्म परिवर्तन था. यदि कमेटी लड़की का धर्म परिवर्तन करा देती, तो वह मुस्लिम ही बना रहता.

     घटना के पक्ष में बोलने वाले कह रहे थे कि यह एक इंसान का इंसान से प्यार है. इसमें क्या शक है? इंसान का इंसान से प्यार और शादी जायज है. लेकिन जब हिन्दू या मुस्लिम संगठनों से उनकी राय लेने आप जाएंगे, तो वे अपने समुदाय, धर्म, आचार और सामाजिक परंपराओं के प्रकाश में ही अपनी राय सामने रखेंगे. इन लोगों की बात को कट्टरपन कहकर ख़ारिज कर देना उनके साथ न्याय नहीं होगा.

    मुस्लिम संगठनों का कहना था कि इस्लाम के अनुसार एक मुस्लिम ही मुस्लिम से शादी कर सकता है. वे यह बात अपने मन से नहीं कह रहे थे. उनसे पूछा, तो उन्होंने शरियत की रोशनी में अपना पक्ष रखा. उनका कहना था कि इंसान इंसान से शादी करे, हमें कोई एतराज नहीं, लेकिन धर्म की व्यवस्था की बात आएगी, तो इस्लाम से बाहर जाकर शादी करने वाला इस्लाम में नहीं रह सकता. यह उनकी धार्मिक व्यवस्था है, जिसे वे बता रहे थे.

    इसी तरह हिन्दू संगठनों का कहना था कि लड़के को सिर्फ नाम बदलकर नहीं, बल्कि विधिवत हिन्दू धर्म अपनाकर शादी करनी चाहिये थी. उनकी यह बात भी तर्कसंगत थी कि दोनों धर्मों में विवाह को लेकर मान्यताएं एकदम अलग हैं. इस्लाम में विवाह को एक क़रार माना जाता है, जबकि हिन्दू धर्म में इसे एक पवित्र संस्कार-बंधन माना जाता है, जो सात जन्मों तक चलता है.

    दोनों धर्मों के समर्थकों की इस बात में क्या गलत है कि विपरीत पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक परिवेश में पले-बढ़े और अलग-अलग संस्कार ग्रहण किये हुये युवाओं की शादी कम ही कामयाब होती है. इस शादी के पक्ष वालों ने कुछ ऐसे बड़े लोगों का हवाला दिया, जिनकी इस तरह की शादियां कामयाब रही हैं, लेकिन नाकाम शादियों का हिसाब किसके पास है?

    इस शादी के समर्थकों तथा चैनलों के एंकरों द्वारा हिन्दू और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों को बार-बार "धर्म के ठेकेदार'' और "समाज के ठेकेदार'' कहे जाने पर एक प्रतिनिधि ने घोर आपत्ति जताई. ठीक भी था हर समाज और समुदाय के अपने नियम और कायदे होते हैं. उसके कुछ प्रतिनिधि होते हैं, जो अवसर आने पर सार्वजनिक रूप से अपने समुदाय का पक्ष रखते हैं. ऐसा क्यों माना गया  कि, जो इस शादी के पक्ष में बोल रहा है वही प्रगतिशील, सभ्य और मानवता का ध्वजवाहक है, और जो इसके विपरीत रखता है वह पिछड़ा, असभ्य और मानवता का द्रोही है.

मसाजिद कमेटी की सराहनीय भूमिका

   इस पूरे वाकये में भोपाल की मसाजिद कमेटी की दानिशमंदी का काबिले तारीफ है. उसने लड़की का धर्मांतरण कराने से मना कर दिया, क्योंकि इसका मकसद महज़ शादी की सुविधा प्राप्त करना था. इसके बाद कमेटी ने मुस्लिमों से अपील की कि वे अपने ही समुदाय में शादी करें. इतना ही नहीं, कमेटी ने मुस्लिमों से गौवध से परहेज करने को भी कहा. कमेटी का तज़रुबा यह रहा है कि अंतर-धार्मिक विवाह और गौवध साम्प्रदायिक तनाव के खास कारण हैं.

   इस तरह की सोच अगर दोनों समुदाय लेकर चलें, तो समाज में साम्प्रदायिक तनाव का एक बड़ा कारण समाप्त हो सकता है.

   इसके विपरीत यह विचार भी व्यक्त किया जाता है कि साम्प्रदायिक तनाव और विद्वेष को खत्म करने के लिए अंतर्धार्मिक शादियां ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए. इसमें भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसमें धर्मांतरण आदि का सहारा लेना उचित नहीं होगा. जिसे इस तरह की शादी करना है वह विशेष विवाह अधिनियम के तहत करे किसीको धर्म बदलने की ज़रुरत नहीं होगी. इसका जो लोग विरोध करेंगे, उन्हें समाज स्वयं नकार देगा.

   भारतीय समाज आज जिस संक्रमण के दौर से गुजर रहा है उसमें सभी समुदायों को काफी यथार्थवादी दृष्टिकोण और एक-दूसरे के विचारों के प्रति सहिष्णु रहने की जरूरत है. यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि समाज सिर्फ संविधान या कानून से नहीं चलता. युगों-युगों से सांस्कृतिक, नैतिक और धार्मिक मूल्यों ने समाज को नियंत्रित और नियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सामाजिक वर्जनाएं कभी-कभी मानव स्वतंत्रता में बाधक होती दिखाई पड़ सकती हैं, लेकिन ये सही अर्थों में स्वतंत्रता को उच्छंखृलता बनने से रोकने में साधक भी होती हैं. आध्यात्मिक और मानवता के स्तर पर सामाजिक पाबंदियों का अधिक महत्व नहीं है, लेकिन सामाजिक जीवन में इनकी अपनी  अहमियत है.


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