प्रेम – प्रीति और भक्ति … प्रेमी, प्रेमास्पद से प्रेम करते समय कुछ पाने की कामना नहीं करता।

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प्रेम प्रीति : नारद-भक्ति-सूत्र में प्रेम को कामना रहितं, प्रतिक्षण वर्धमानं, गुण-रहितं आदि बताया गया है।
प्रेमी, प्रेमास्पद से प्रेम करते समय कुछ पाने की कामना नहीं करता। कामना करने पर वह प्रेम न रहकर स्वार्थ हो जाता है।
यदि प्रेम क्षणानुक्षण घटता-बढ़ता है तो वह कामना के कारण घटता-बढ़ता है, प्रेम निस्वार्थ होता है।
अतः प्रेम घटता-बढ़ता नहीं है। प्रेम घटता नहीं प्रत्युत् प्रत्येक क्षण बढ़ता ही जाता है। प्रेमी, प्रेमास्पद के गुणों को देखकर प्रेम नहीं करता।
वह उससे एक बार प्रेम करना प्रारंभ कर देने पर उसके अवगुणों को देखता ही नहीं, देखना तो दूर उनके बारे में सोचता तक नहीं।
भक्ति प्रायः तीन प्रकार की कही गई है।
वैधी जिसको नवधा भी कहते हैं। रागात्मिका जिसको पंचधा कहा गया है दास्य, सख्य, वात्सल्य, श्रृंगार व शांत । तीसरी प्रेमाभक्ति है जो रागात्मिका भक्ति का ही परिष्कृत उच्च भूमिका युक्त रूप है। संतों ने इससे भी ऊपर पराभक्ति और मानी है जिसको ज्ञान के समकक्ष माना है।
गुण स्वारथ अर रूप की, प्रीति करै सब कोय । प्रीति जिंटा की जाणिये, या तीनाँ विण होय
जो गुण देखकर, स्वार्थ सिद्धि होने की संभावना देखकर व रूप पर आकर्षित होकर प्रीति की जाती है, वह प्रीति न होकर कामना है। जो इन तीनों का बिना विचार किये प्रीति करता है, वही वास्तव में प्रेमी है।
तन मन अंतःकरण की, बात कहन के वैन। यों परमानन्द प्रेम कौं, प्रगट करन के नैन।।
मन की बात वचनों के द्वारा कह दी जाती है किन्तु प्रेम की बात वचनों से नहीं कही जाती। यदि कही जाती है तो वे स्वार्थ की बातें हैं, प्रेम की नहीं। प्रेम को व्यक्त करने का साधन बस आँखें हैं।

 

“संत परमानन्द वनिहाल”


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