मध्यप्रदेश में छह साल में 40 स्क्वायर किलोमीटर जंगल घटे -सरयूसुत मिश्रा

मध्यप्रदेश में छह साल में 40 स्क्वायर किलोमीटर जंगल घटे

-सरयूसुत मिश्रा
mp for 2जंगल और वन्य प्राणी मध्य प्रदेश की शान और पहचान हैं. जंगलों में बढ़ती बसाहट और मानव हस्तक्षेप के कारण जंगलों को लगातार नुकसान होता दिखाई पड़ रहा है. मध्यप्रदेश में 6 सालों में लगभग 40 स्क्वायर किलोमीटर वन क्षेत्र कम हो गया है. भारत सरकार द्वारा 2 वर्षों में भारत में वनों की स्थिति पर इंडिया स्टेट आफ फॉरेस्ट रिपोर्ट जारी की जाती है. वर्ष 2013 की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में वन क्षेत्र 77522 स्क्वायर किलोमीटर था, जो वर्ष 2019 की रिपोर्ट में घटकर 77482 वर्ग किलोमीटर हो गया है.

इस प्रकार मध्यप्रदेश के वन क्षेत्र में 6 वर्षों में 40 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है. वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 25 .14% वन क्षेत्र है, जो वर्ष 17 की रिपोर्ट में 25.11% था.। वन क्षेत्र की दृष्टि से मध्य प्रदेश का वन क्षेत्र देश में पहले नंबर पर है, दूसरे स्थान पर अरुणाचल प्रदेश है. मध्यप्रदेश में वनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. इस दबाव के कई कारण हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि जंगल के मुद्दों को भी राजनीतिक लाभ-हानि के गणित पर तय किया जाता है. जंगल में रहने वाले निवासी सामान्यत: जनजाति वर्ग के होते हैं. इसी जनजाति की राजनीति के कारण अघोषित से यह परंपरा मध्यप्रदेश में बनी हुई है, कि वन विभाग का प्रभार जनजातीय वर्ग के मंत्री को सौंपा जाता है. 

वन विभाग का प्रभार सौंपते समय सबसे पहली योग्यता जनजाति वर्ग से होना ही माना जाता है. जंगलों में बड़ी संख्या में जनजाति वर्ग के लोग रहते हैं और आज जो जंगल बचे हुए हैं उसमें वहां रहने वाले लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन राजनीतिक लाभ-हानि के लिए लोगों को लाभान्वित करने का दिखावा करने की दृष्टि से सरकार खुद ऐसे कदम उठाती हैं जो अंततः जंगलों को नुकसान पहुंचाते हैं. जंगल और जनजाति जनजीवन को अलग करना संभव नहीं है. जनजाति समुदाय के लोग भी जंगलों से उतना ही लेते हैं, जितना उनके जीवन यापन के लिए जरूरी है. वे जंगलों को नुकसान नहीं पहुंचाते. जंगलों का नुकसान माफिया से होता है, भले ही वह माफिया लकड़ी काटने वाला हो, माइनिंग माफिया हो या जंगलों से व्यवसायिक लाभ लेने वाला. मध्यप्रदेश में खनिज माफिया ने तो जंगलों को बहुत नुकसान पहुंचाया है. आए दिन ऐसी घटनाएं होती हैं, जब माइनिंग माफिया वन विभाग के अमले को लहूलुहान कर देता है.

mp forest 4

रेत माफिया भी जंगल को नुकसान पहुंचाने में पीछे नहीं है. मुरैना में एक आईपीएस अफसर की हत्या रेत माफिया ने ट्रक से कुचलकर कर कर दी थी. यह घटना पूरे देश में चर्चा में आई थी और माइनिंग माफिया से जंगलों को हो रहा नुकसान लोगों की नजर में आया था. लेकिन धीरे-धीरे फिर वैसे ही चलने लगा और सब जंगल को नुकसान पहुंचा कर अपनी जेबें भरने लगे. माफिया और सरकारी गठजोड़ भी कई बार सामने आता रहा है. जिन लोगों के कंधों पर जंगल को बचाने की जिम्मेदारी है, वह भी कई बार माफिया से हाथ मिला कर अपनी जेब भरते हैं और मध्य प्रदेश का जंगल बर्बाद करने में अपनी भूमिका निभाते हैं. कई बार मध्यप्रदेश की वन नीति बनी, लेकिन उस पर ईमानदारी से अमल कभी भी नहीं हो सका. वास्तव में जंगल की स्थिति और आंकड़ों में भी अंतर होता है. आंकड़ों का यह खेल समझने के लिए आपको 2013 की वनों की स्थिति की रिपोर्ट के बाद 2017 और 2019 में आई रिपोर्ट को देखकर ही एहसास हो जाएगा. 2013 की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश में 77522 स्क्वायर स्क्वायर किलोमीटर वन क्षेत्र बताया गया था. वर्ष 2017 की रिपोर्ट में यह वन क्षेत्र 77414 वर्ग किलोमीटर बताया गया. फिर 2019 की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश का कुल वन क्षेत्र 77 482 वर्ग किलोमीटर बताया गया है. वर्ष 2019 के रिपोर्ट के समय जो प्रेस नोट जारी किए गए उसमें यह बताया गया कि 2017 की तुलना में मध्यप्रदेश के वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है, लेकिन मध्यप्रदेश का वन क्षेत्र जो 13 में 77522 वर्ग किलोमीटर, उससे 40 किलोमीटर कम हो गया. फिर भी वन विभाग ने 2017 से तुलना कर 2019 में वन क्षेत्र में वृद्धि का ढिंढोरा पीटा.

van bhumiइसे क्या कहा जाएगा?  क्या यह आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है? जब वास्तव में जंगल का एरिया कम हो रहा है तो फिर बीच के वर्ष से तुलना कर उसे बढ़ा हुआ बताने की क्या आवश्यकता है? अब सवाल यह है कि जब जिम्मेदार तंत्र आंकड़ों को ही बढ़ा हुआ बता रहा है तो फिर जमीन पर जंगल की स्थिति जैसा आंकड़ों में बताया जा रहा है वैसी होगी, यह भी पूरी तरह से स्वीकार योग्य नहीं है. 

आज कब्जे के नाम पर वन भूमि को लोगों को लाभ देने का राजनीतिक अभियान हर दल चलाता रहता है. वन भूमि पर पट्टे देने की घोषणाएं और कमिटमेंट हर दल चुनाव में करता है. वोट की राजनीति में नजरिया पार्टी का लाभ होता है, जंगल को लाभ या नुकसान चिन्तन में ही नहीं होता. आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से चिंतित है. मध्यप्रदेश का भी मौसम आज जिस तरह का हो गया है, वैसा पहले नहीं था. इसके बावजूद जंगल की बर्बादी रुक नहीं रही है. अब 2021 की रिपोर्ट भारत में वनों की स्थिति पर आएगी. जंगल की मौके पर जो स्थिति है, उसको देखकर तो ऐसा ही लगता है कि अगली रिपोर्ट में भी मध्यप्रदेश का वन क्षेत्र कम होता दिखाई पड़ेगा. जंगल को बचाना मानव जीवन के अस्तित्व को बचाने के लिए जरूरी है, यह बात जितनी जल्दी आम लोगों को सरकारी तंत्र को और सरकार चलाने वाले नुमाइंदों को आ जाए, उतना ही मध्य प्रदेश के हित में होगा.


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ