मध्यप्रदेश : वैदिक और पौराणिक काल का इतिहास

मध्यप्रदेश : वैदिक और पौराणिक काल का इतिहास…………
वैदिक काल : ऋग्वेद काल में जब आर्यों का उत्तर भारत में आना शुरू हुआ उस समय इस भू-भाग (वर्तमान मध्यप्रदेश) के प्राय: सभी हिस्सों में विभिन्न अनार्य जातियों के समुदाय निवास कर रहे थे। आर्यों को इस प्रदेश की पुण्य सलिला नर्मदा के अलावा क्षेत्र की काफी जानकारी थी। उत्तर वैदिक संहिताओं ब्राह्मण व अरण्यों में मध्यप्रदेश के संबंध में जानकारी मिलने लगती है। कौशीतकी उपनिषद में अपरोक्ष रूप में विन्ध्य पर्वत का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण के एक पद में "रेवोत्तरस" आता है, इसे बेबर द्वारा रेवा नदी माना गया है। वैदिकोत्तर साहित्य में रेवा का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलने लगता है।

प्रागैतिहासिक सभ्यता

कहा जाता है कि आर्य पंचानद प्रदेश (पंजाब) से अन्य प्रदेशों को गए। महर्षि अगस्त्य के नेतृत्व में एक कबीला इस क्षेत्र (मध्यप्रदेश) में आकर बसा, तभी से क्षेत्र का आर्यीकरण शुरू हुआ। इसके अलावा विश्वामित्र के शापित पचास पुत्रों के अलावा अत्रि, पाराशर, भारद्वाज और भार्गव ऋषि भी यहां आए। रामायण और पुराणों के अलावा कई पौराणिक कथाएं भी इस बात से अवगत कराती हैं कि इस क्षेत्र का हैहय राज माहिष्मंत, यदुवंशी नरेश मधु जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे, शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती, यदुवंशी नरेश नील का इस राज्य के क्षेत्रों से सीधा संबंध था तो स्वयं भगवान राजा राम ने अपने वनवास काल का कुछ समय इसी धरती पर बिताया था। वहीं महाभारत काल में पांडव भी अज्ञातवास के समय इस क्षेत्र में आए थे । भगवान राम ने इस काल में सतना, पन्ना, टीकमगढ़, मंडला और बालाघाट जिलों में तो पांडवों ने यहां के वनों में कुछ समय व्यतीत किया था।

प्रागैतिहासिक सभ्यता

पौराणिक इतिहासः ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी के पूर्व के इतिहास को पौराणिक इतिहास का कालखंड कहा जाता है क्योंकि इस काल के भारतीय इतिहास के जानने के मुख्य साधन विभिन्न पुराण, रामायण और महाभारत आदि ग्रंथ हैं। पौराणिक इतिहास पर सर्वप्रथम पर्गिटर ने शोध किया था। डाक्टर ए. डी. पुसालकर ने भी विभिन्न विद्वानों के विचार और धार्मिक ग्रंथों को आधार बनाकर पौराणिक इतिहास को संजोया है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पौराणिक युग के सभी राजवंश मनु वैवस्वत के 10 पुत्रों और उनके वंशजों द्वारा स्थापित हुए थे। एक कथा के अनुसार वैवस्वत मनु के दस पुत्र इला, इक्ष्वाक, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। कुछ मतों के अनुसार नौ पुत्र और एक पुत्री का भी विवरण मिलता है। वैवस्वत के सबसे बड़े पुत्र इला (जो स्त्री-पुरूष दोनों ही थे) के पुत्र पुरुरवा ने चंद्रवंशी क्षेत्रीय राज्य की स्थापना की थी। इसे ऐल वंश कहते है जिससे बाद में यादव वंश शुरू हुआ और उसकी एक शाखा हैहय वंश कहलाई। पुरुरवा ने अपने राज्य का विस्तार किया लेकिन उसके कार्यकाल में ब्राह्मणों को उचित सम्मान नहीं मिला। नाराज ऋषि नैमिष ने पुरुरवा की हत्या कर उसके पुत्र आयु को राजगद्दी पर बैठाया। आयु का पुत्र नहुष्क महान राजा था जिसका बेटा ययाति इतिहास में याद रखा जाता है। ययाति ने मध्यभारत (मध्यप्रदेश) पर विजय प्राप्त की थी। ययाति की दो रानियां थीं, पहली शुक्र की बेटी देवयानी और दूसरी असुर राजकन्या शर्मिष्ठा ययाति के 5 पुत्र थे जिसमें से यदु ने गुजरात यादव वंश की नींव डाली थी इसी यादव वंश में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यदु को महिष मंडल और मालवा का राज्य मिला था जिसमें पवित्र नदियां चर्मावती (चंबल), वेत्रवती (बेतवा) तथा सुक्तिमती (केन) अपने निर्मल जल से राज्य को समृद्ध करती थीं।



मनु वैवस्वत के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु ने सूर्यवंशी क्षत्रिय राज्य की स्थापना की। इसी कुल में रामायण के नायक भगवान राम ने जन्म लिया था। इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधात्रि ने यादव साम्राज्य को पराजित कर, उसे झुकने पर मजबूर कर दिया था। उस समय यादव राजा शशबिंदु ने अपनी बेटी बिंदुमती का विवाह राजा मांधात्रि से कराया था। मांधात्रि का ज्येष्ठ पुत्र पुरुकुत्स हुआ। मौनेय गंधव का जब कारकोट नागवंशी शासक जो कि नर्मदा नदी के किनारे वाले क्षेत्र के शासक थे, से संघर्ष हुआ तो पुरूक्क्रुत्सु ने नागों की सहायता कर गंधवों को पराजित कर दिया। इस विजय से खुश होकर नागों ने अपनी बेटी नर्मदा का विवाह पुरुकुत्सु के साथ कर दिया। कहा जाता है कि इक्ष्वाकु वंश के पुरुकुत्सु ने ही रेवा नदी का नाम नर्मदा कर दिया था। पुरुकुत्सु ने अपने पिता मांधात्रि की विजयों को नर्मदा तट तक पहुंचाया। इसी वंश के मुचकुंद (मांधात्रि के तृतीय पुत्र) ने अपने पूर्वज मांधाता के नाम पर पर्वत श्रेणियों के बीच नर्मदा तट पर एक ग्राम मांधाता नगरी (ओंकारेश्वर मांधाता) की स्थापना की।

Omkareshwar Temple-min

कालान्तर में यदुवंश की हैहय नामक शाखा के प्रतापी राजा महिष्मंत या माहिष्मंत ने इक्ष्वाकु और नाग को हरा कर इस क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया। कुछ संदर्भों के अनुसार मांधाता नगरी (ओंकारेश्वर मांधाता) का नाम बदलकर महिष्मती या माहिष्मती रखा गया था। पुराणों तथा महाकाव्यों में महिष्मती या माहिष्मती का अनेक बार उल्लेख मिलता है। अनेक विद्वानों का मत है कि खंडवा से उत्तर पश्चिम में लगभग 32 मील दूर औंकार मांधाता (ओंकारेश्वर) ही प्राचीन माहिष्मती है। यद्यपि कुछ विद्वान खरगौन जिले के महेश्वर को माहिष्मती मानते हैं। वहीं कनिंघम मंडला को माहिष्मती मानते हैं।




हैहय वंश में कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन महाप्रतापी सम्राट हुआ है, जिसे अर्जुन, सहस्त्रार्जुन और हैहयाधिपति के नामों से भी पुकारा गया है। उन्होंने परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि को अपमानित कर कामधेनु गाय छीन ली थी तब परशुराम ने उसका वध कर दिया था। सहस्त्रार्जुन को पौराणिक साहित्य में सम्मानित स्थान प्राप्त है। कहा जाता है कि सहस्त्रार्जुन, रावण को भी परास्त किया था। वंशावली के आधार पर दोनों का समकालीन होना

असंभव है, हालांकि बाद में स्पष्ट हुआ कि रावण, तमिल भाषा के इरावण शब्द के संस्कृत रूप से बना होगा। इसका अर्थ देव, राजा, श्रेष्ठ आदि होता है। सहस्त्रार्जुन ने कारकोट वंशी नागों को युद्ध में हराकर अनूप देश (निमाड़) को जीता था, उसने माहिष्मती को अपनी राजधानी बनाया था। उसके बाद उसके पुत्र जयध्वज फिर जयध्वज के पुत्र तालजंध उसके बाद तालजंध के पुत्र वीतिहोत्र ने राज किया। वीतिहोत्र के बाद हैहय वंश की अनेक शाखाएं बन गई। इन

शाखाओं ने तुड़ीकेर (दमोह), त्रिपुरी (तेवर), दर्शाण (विदिशा), अनूप (निमाड़) अयंति आदि जनपदों की  स्थापना की।

रामायण काल में मध्यप्रदेश में महावन और वन थे। संभवत: दंडकारण्य का कुछ भाग यहां स्थित था। भगवान राम ने अपने वनवास का कुछ काल दंडकारण्य में बिताया था। माना जाता है कि चित्रकूट से पंचवटी जाते समय भगवान राम सागर और दमोह होते हुए गए थे। कुछ विद्वानों ने जबलपुर से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इंद्राना पहाड़ी पर लंका का होना बताया है। दमोह जिले के अनेक स्थानों को लंका के मार्ग में स्थित स्थलों के रूप में निरूपित किया है। इसके अनुसार रामाश्रम को हिंडोरिया में मारीच के स्थान को नोहटा में, अगस्त के आश्रम को कुंडलपुर में पम्पा के तालाब को जबेरा घाटी में तथा ऋष्य मूल को सिंगोरगढ़ के जिले की पहाड़ी पर बताया गया है।


अतीत गाथाओं के अनुसार राम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहू ने विदिशा पर शासन किया था। कालिदास के रघुवंशम के अनुसार शत्रुघ्न ने विदिशा क्षेत्र से यादवों को हटाकर अपने पुत्र सुबाहू को शासक बनाया था। किंवदंती है कि भगवान राम ने बांधवगढ़ अपने भाई (बांधव) लक्ष्मण को लंका पर नजर रखने के लिए दिया था।


महाभारत के युद्ध में मध्यप्रदेश के कुछ राजाओं ने कौरवों की ओर से और कुछ राजाओं ने पांडवों की ओर से भाग लिया था। बिंद और अनुविंद नामक अवंति के दो शक्तिशाली राजकुमार कुरुक्षेत्र में कौरवों की ओर से पराक्रम पूर्वक लड़े थे। महाभारत में इनकी प्रशस्ति महारथियों की तरह की गई हैं। माहिष्मती का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। माहिष्मती के महाराजा नील ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से पांडवों के विरूद्ध युद्ध किया था, सहदेव अपने दिग्विजय के दौरान महाराजा नील द्वारा शासित माहिष्मती को जीतने के उद्देश्य से आगे बढ़ा पर उसकी असफलता के कारण का वर्णन कर कहा गया है कि इस नगर को अग्निदेव का संरक्षण प्राप्त था जबलपुर से 13 किमी दूर स्थित गांव तेवर का महाभारत में त्रिपुरी के नाम से जिक्र मिलता है। यह बताया गया है कि इसका नाम तीन पुरों पर से पड़ा जो असुरों के आधिपत्य में थे।


चेदि राज्य जिसमें मोटे तौर पर आधुनिक बुंदेलखंड सम्मिलित है, महाभारत काल में एक प्रमुख जनपद था। महाभारत के युद्ध में चेदि नरेश शिशुपाल के पुत्र तथा उत्तराधिकारी धृष्टकेतु और उसके भाई सरभ ने पांडवों की ओर से युद्ध किया था। दतिया जिले का संबंध महाभारत के कुख्यात दैत्य दंतवक्र से जोड़ा गया है एवं दतिया का नाम इसी दैत्य राजा ने नाम पर रखा कहा जाता है। भगवान कृष्ण ने इस दैत्य को पराजित किया था। कुंती जनपद जिसमें मुख्यतः ग्वालियर एवं दतिया जिले के क्षेत्र माने जाते हैं, के संबंध सौराष्ट्र जनपद से अच्छे थे। दतिया की कुंवारी नदी का संबंध पांडवों की माता कुंती से जोड़ा जाता है, कुंती ने कर्ण को नदी की धारा में छोड़ दिया था। संभवत: उस युग में इस स्थान को कोतवार कहते थे। दंतवक्र की पराजय के बाद इस क्षेत्र का नाम गोपालकच्छ रख दिया गया और ग्वालियर की पहाड़ी को गोपालगिरि कहा जाने लगा। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि मध्य प्रदेश में सबसे पहले आर्यों का उपनिवेश रामायण काल में स्थापित हुआ और महाभारत के समय इस प्रदेश में आर्यों की आबादी पर्याप्त रूप से बढ़ चुकी थी तथा शक्तिशाली जनपद स्थापित हो चुके थे।

साभार: शिव अनुराग पटेरिया

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