मध्यप्रदेश के संत -दिनेश मालवीय

मध्यप्रदेश के संत

-दिनेश मालवीय

बीस वर्ष पहले तक मध्य प्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से से भारत का सबसे बड़ा प्रदेश था. वर्ष 2000 में अलग छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद अब यह राजस्थान के बाद दूसरे क्रम पर आ गया है. मध्य प्रदेश के संतों के विषय में लिखते हुए इस लेख में अविभाजित मध्य प्रदेश के संतों का भी उल्लेख किया जा रहा है. इनमें से कुछ संत तो ऐसे हैं, जिनकी कुछ अंचलों के घर-घर में पूजा होती है. इन संतों ने बहुत विपरीत परिस्थितियों में भी समाज को एकजुट रखते हुए सामाजिक चेतना बढाने और असमानता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया.
संत सिंगाजी- मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में हुए इन संत ने अपनी तपस्या और पवित्र आचरण से यह सिद्ध कर दिया कि कोई कितने भी गरीब परिवार में जन्मा हो या जीवनयापन के लिए कोई भी कार्य करता हो, वह भक्ति और सदाचरण से चेतना की बहुत उच्च अवस्था प्राप्त कर सकता है. उनका जन्म एक ग्वाल परिवार में हुआ था और वह राजा के यहाँ डाकिये का काम करते थे. बचपन से ही उनका मन भक्ति भाव में रहता था. उनके मन में प्रबल वैराग्य जागने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और ईश्वर की आराधना में सारा समय बिताने लगे. उन्होंने पिपल्या के जंगल में बहुत कठोर तप किया और सिद्धि प्राप्त की.
सिंगाजी का मानना था कि परमतत्व को खोजने के लिए मनुष्य को कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है, वह उसे अपने ही भीतर मिल जाएगा. उनकी भक्ति की धारणा कबीर की तरह थी. मनुष्य को अपनी जातिगत और अन्य सामाजिक पहचानों से ऊपर उठकर अपने तात्विक स्वरूप को जानना चाहिए. निमाड़ क्षेत्र में उन्हें घर-घर पूजा जाता है और अधिकतर घरों में उनके चबूतरे बने हैं, जहाँ सुबह-शाम उनकी पूजा-अर्चा की जाती है.
वर्ष 2004 में उनकी समाधि नर्मदा बाँध के डूब क्षेत्र में आ रही थी. मध्यप्रदेश सरकार ने इस तरह की योजना बनाकर क्रियान्वित की कि उनकी समाधि सुरक्षित रही. आज उनकी समाधि के चारों ओर नर्मदा नदी है और यह बीच में सुरक्षति है. इस समाधि-स्थल को अब एक सुंदर स्थान के रूप में विकसित किया गया है, जो दर्शनार्थियों के साथ ही पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र बन गया है. उन्होंने विक्रम संवत 1616 में अपनी इहलीला को समेत लिया.
महामति प्राणनाथ- महामति प्राणनाथ प्रदेश के बहुत सिद्ध संत हुए हैं. उनका जन्म सौराष्ट्र में हुआ था और उनके पिता केशवराज जामनगर राज्य के प्रधानमंत्री थे. बचपन से ही वह वैराग्य वृत्ति के थे. उन्होंने स्वामी निजानंद से दीक्षा ली और आध्यात्मिक साधना के साथ ही शास्त्रों का गहन अनुशीलन किया. धर्म प्रचार के लिए उन्होंने अरब देश की यात्रा कि और पाँच वर्ष तक वह वहाँ रहे. उन्होंने अरब देश में भारतीय व्यापारियों को दीक्षा दी और मुस्लिम जमाय्तों के साथ खूब धर्म चर्चाएँ कीं. अरब से लौटकर उन्होंने धरौल के प्रधानमंत्री का पद स्वीकार किया.
इसी समय उन्होंने अपने ग्रंथ “श्री कलश” की रचना की. वह जातिगत भेदभाव के प्रबल विरोधी थे. उनके अनुसार सदाचारी चांडाल भी कदाचारी ब्राह्मण से बेहतर होता है. उन्होंने एक और ग्रंथ “श्री सनंध” की भी रचना की. ”श्री प्रकाश” नामक ग्रंथ की भी उन्होंने रचना की.
औरंगजेब की अत्याचारी नीतियों के विरोध में उन्होंने 500 अनुयायियों को लेकर सत्याग्रहियों के रूप में देश के अनेक स्थानों की यात्रा की और दिल्ली आ पहुँचे. इसका बाद छत्रसाल बुंदेला के आग्रह पर महामति प्राणनाथ बुंदेलखंड क्षेत्र के राजाओं के पास गए और उन्हें छत्रसाल के नेतृत्व में संगठित किया. उनके आशीर्वाद से ही छत्रसाल ने मध्यभारत के बड़े भू-भाग को मुगलों से आज़ाद करा लिया. उनके कहने पर ही छत्रसाल ने पन्ना को अपनी राजधानी बनाया.
वह श्रीकृष्ण के उपासक थे और कबीर के विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं थे. बहुत वितरीत हालात में उन्होंने समाज में समरसता और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. पन्ना नगर में उनके द्ववारा स्थापित मंदिर को “धामी मंदिर” कहा जाता है. उनके द्वारा स्थापित सम्प्रदाय को “प्रणामी सम्प्रदाय” कहा जाता है. मध्यप्रदेश के साथ ही गुजरात में भी उनके अनुयाइयों की संख्या बहुत है.
दादाजी धूनीवाले- इनका मूलनाम स्वामी केशवानंद है. मध्य प्रदेश के महान संतों में दादाजी धूनीवाले का नाम अग्रणी है. उनकी समाधि खंडवा में स्थित है. दादाजी बहुत चमत्कारी परमहंस कोटि संत थे. उनके अनेक चमत्कारी कार्यों की चर्चा स्थानीय लोग आज भी करते हैं. विश्वभर में उनके भक्त और अनुयायी हैं. उनकी समाधि पर हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में दूर-दूर से लोग आते हैं. इस दिन पूरा खण्डवा शहर दादजीमय हो जाता है.
खण्डवा और निमाड़ में शायद ही कोई ऐसा घर हो जिसमें दादाजी और उनके भाई छोटे दादाजी की तस्वीर न हो. दादाजी सदा एक धूनी के पास बैठते थे. उनके द्वारा जलायी गयी धूनी आज भी मौजूद है और भक्तगण इसकी विभूति को प्रसाद रूप में ग्रहण कर माथे से लगाते हैं. समाधि की हर दिन विधि-विधान के साथ नियमित पूजा होती है. विश्वभर में दादाजी के 27 धाम हैं. उनकी समाधि पर जाने वालों को बहुत आध्यात्मिक आनंद मिलता है.

सतनामी सम्प्रदाय- छतीसगढ़ के इस सम्प्रदाय को स्थापित करने वालों में चार नाम प्रमुख हैं- जगजीवन दास, वीरभानु, ऊदादास और जोगीदास. इनमें पहले तीन नाथपंथी थे. कबीर की तरह सतनामी भी सत्य को ही ईश्वर मानते हैं. इस सम्प्रदाय के लोगों ने औरंगजेब की धर्मान्धता के खिलाफ जमकर संघर्ष किया, जिसमें हजारों सतनामियों ने अपने प्राणों की बलिदानी दी.
गुरु घासीदास-सतनामी सम्प्रदाय की छत्तीसगढ़ शाखा के प्रमुख गुरु घासीदास थे. उन्होंने लोगों को जाति और वर्ग से ऊपर उठकर समरसता के साथ रहने की शिक्षा दी. वह ईश्वर को सतनाम कहते थे. उन्होंने हिन्दू समाज के बड़ी संख्या में लोगों को धर्मभ्रष्ट होने से बचाया. उनकी प्रयासों से बड़ी संख्या में वंचित जातियों के लोगों ने गौरव प्राप्त किया. कोई भूखा न रहे, इसके लिए उन्होंने जगह-जगह सदाव्रत खोले, जहाँ सबको मुफ्त में भोजन कराया जाता था. उन्होंने पशुबलि के स्थान पर नारियल चढाने की परम्परा शुरू की. उन्होंने गाय को बहुत पवित्र मानकर उसकी पूजा करने का सन्देश दिया. अविभाजित मध्यप्रदेश में ही बिलासपुर विद्यालय का नामकरण गुरू घासीदास के नाम पर किया गया.
छत्तीसगढ़ के किसी भी गाँव के सतनामी मोहल्ले में एक चबूतरे पर सफेद रंग का ध्वज लगा दिखायी देगा, जिसे भक्तगण “जैतखाम” कहते हैं. इसका अर्थ है जयस्तंभ. यह जातिभेद से मुक्त, समतायुक्त समाज व्यवास्था और एकता का प्रतीक माना जाता है.
गहिरा गुरु- यह एक ऐसे महान संत थे, जिन्होंने वनवासी आदिवासियों के जीवन में भक्ति के प्रसार के साथ ही उनमें नव-चेतना का संचार किया. बचपन में उनका नाम रामेश्वर था, लेकिन बाद में वह अपने गाँव के नाम से प्रसिद्ध हो गये. उनका जन्म कंवर जाति में हुआ था, जो ऐतिहासिक दृष्टि से कौरवों से सम्बंधित है. इस जाति के लोगों के बारे में “श्री चन्द्र दर्पण” में विस्तृत उल्लेख मिलता है.
गहिरा गुरु ने शिवमंदिर की स्थापना कि और “श्रीरामचरित मानस” को संगीतमय गायन के लिए एक टोली का निर्माण किया. इन्होंने 1943 में “सनातन धर्म संत परम्परा” की स्थापना की. इस समाज को मानने वाले लोग सुबह तुलसी को जल देते हैं. हर घर में पूजा-स्थल हैं. वे हर दिन गाय को ग्रास देते हैं. ये लोग सुबह-शाम बड़ों को प्रणाम करते हैं. हर दिन एक मुट्ठी चावल और पन्द्रह पैसे समाज के कार्यों के लिए निकालते हैं. इसमें मद्यपान और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है. वर्ष 1951में अकाल के समय गुरुजी ने अपने साथियों की सहायता से पीड़ित लोगों की बहुत मदद की. उन्होंने संस्कृत पढने वाले वनवासी बच्चों के लिए छात्रावास की स्थापना की.

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