मध्यकाल में हिन्दी का विकास और सृजन -दिनेश मालवीय

मध्यकाल में हिन्दी का विकास और सृजन -दिनेश मालवीय

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इतिहास के साथ सबसे बुरी बात यह है कि इसमें अधिकतर युद्धों, राजा-महाराजाओं और उनके जीवन का वर्णन सबसे अधिक होता है. लेकिन किसी भी काल में युद्धों और विध्वंसों के साथ-साथ सृजन भी होता रहता है. दुर्भाग्य से इसे कम ही प्रकाश में लाया जाता है. आइये, हम भारतीय इतिहास के मध्यकाल में हिन्दी के विकास पर एक संक्षेप दृष्टि डालते हैं.

भारत के इतिहास में मध्यकाल के दौरान हिन्दी में भी काफी श्रेष्ठ सृजन हुआ.हिन्दी का विकास ब्रज, अवधि, डिंगल जैसी पश्चिमी हिन्दी तथा दिल्ली के आसपास की शुरूआती दौर की भाषा से हुआ. मध्यकाल में धर्म उपदेशक और साधु-संत उत्तर भारत में खूबभ्रमण करते थे. इन लोगों ने अपनी बात लोगों को समझाने के लिए एक ऐसी भाषा विकसित की जो आगे चलकर हिन्दी साहित्य का अंग बन गयी.इसके विकास में क्षेत्रीय हिन्दू राजाओं द्वारा विद्वानों को दिये गये का भी बहुत योगदान रहा.

राजपूत राजाओं के चारण अपने गीतों में अपने स्वामियों का गौरव का गान करते थे. इन गौरव  गीतों ने हिन्दी काव्य का रूप ले लिया. राजपूत नायकों की वीरोचित रूमानी कथाएँ प्रारम्भिक हिन्दी काव्य का विषय बन गयीं. इनमें प्रमुख रूप से पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, खुमान रासो, आल्हा-ऊदल, हम्मीर रासो, विजयपाल रासो आदि के नाम विशेष रूप से लिए जा सकते हैं. चंद वरदाई दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान का दरवारी कवि और अभिन्न मित्र था . उसने पृथ्वीराज रासो नाम का महाकाव्य लिखा. 

इसमें योद्धा पृथ्वीराज के जीवन और उसके युद्धों का वर्णन किया गया है. पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य की एक महान कृति है. यह उस काल के इतिहास का एक स्रोत भी है. कवि मधुकर ने मयंक जस चन्द्रिका की रचना की, जिसमे जयचंद का गुणगान है. एक और चारण लेखक जगनिक ने आल्हा-खंड की रचना की. इसमें महोबा के दो वीरों आल्हा और ऊदल के प्रेम और वीरतापूर्ण कारनामों और का वर्णन है.

राजस्थान में राजपूत सरदारों और योद्धाओं के वीरतापूर्ण कृत्य से भरे काव्य और गाथा-गीतों से परिपूर्ण  समृद्ध साहित्यका विकास हुआ. शारंगधर द्वारा रचित हम्मीर रासो और हम्मीर काव्य उल्लेखनीय हैं. वह रणथम्भोर के राजा हम्मीर देव चौहान का दरबारी कवि था.. हम्मीर रासो और हम्मीर काव्य में रणथम्भोर के शासक हम्मीर के शौर्य और वीरतापूर्ण कार्यों का बहुत सजीव वर्णन किया गया है.इसी प्रकार, नाल्हसिंह ने विजयपाल रासो लिखा,जिसमे करौली के सरदार विजयपाल के युद्धों का बहुत सजीवभाषा में वर्णन किया है. नरपति नाल्ह (नरपति नाथ) ने बीसलदेव रासो की रचना की. बीसलदेव अजमेर का राजा था. एक चारण, दलपत विजय ने खुमान रासो की रचना की.



प्रारम्भिक सल्तनत काल हिन्दू धर्म में धार्मिक औरयोगी थे गीतों और पदों की रचना करते थे. हिन्दी में भजन और पद लिखने वाले गोरखनाथ और नामदेव प्रारंभिक संत थे.  मीरा, कबीर और नानक ने उनका अनुसरण किया. कबीर ने बड़ी संख्या मेंपदों की रचना की. इनमे से महत्वपूर्ण हैं - अनुराग सागर, अमर मूल, उग्र गीता, साखी,, बीजक, सबदावली,ज्ञान सागरआदि प्रमुख हैं.

गुरु नानक औरउनके उत्तराधिकारियों ने पंजाब में भक्ति की परम्परा को निरंतर रखा.उन्होंने पंजाबी खड़ीबोली और बृजभाषा में पदों की रचना की. उन्होंने जपुजी साहब की रचना की जिसमे ईशवर की प्रशंसा में पद शामिल हैं. इसके अलावा, उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में पद रचे जिनमे सिखों का अदि-ग्रंथ शामिल है. यह संग्रह सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन ने किया था  

वल्लभाचार्य कबीर और नानक के समकालीन थे. वहभक्ति सिद्धांत के महान गुरु थे. उनके अनुयायियों और भक्तों ने अपनी शिक्षाओं और पदों के द्वारा बृजभाषा को प्रोत्साहित किया. इससे कृष्ण सम्प्रदाय के वैष्णव कवियों को ब्रजभाषा में लिखने का बढ़ावा मिला. सूरदास इन सबमे महानतम थे. उन्होंने साहित्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण पदों की रचना की. सूरसागर उनकी सबसे श्रेष्ठ कृति है.

मीराबाई एक और महत्पूर्ण वैष्णव भक्त थीं. वह भक्ति मार्ग की कवयित्री थीं. श्रीकृष्णकी भक्ति में आकंठ डूबी हुयी थींमीरा ने  प्रेम और भक्ति भावों को अपने सुन्दर पदों में व्यक्त किया नर्सिंजी का मायरा, राज गोविंद और गीत गोविन्द की टीका उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं.

इस काल के अन्य संत कवियों में रैदास, धरमदास, दादू दयाल, सुन्दर दस और मलूक दास उल्लेखनीय हैं. रैदास ने पदों की रचना की लेकिन उनका कोई पूर्ण ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. बहरहाल, उनके अनेक पद सिखों के  गुरु ग्रन्थ में शामिल हैं. धर्मदास, दादू दयाल पंथ के संस्थापक के और उन्होंने अनेक दोहों और पदों की रचना की. उनके पदों में राजस्थानी भाषा का प्रमुखता से प्रयोग किया गया है. सुंदरदासने साहित्य की दृष्टि से महत्पूर्ण पदों की रचना की. सुंदर विलास उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है. मलूकदास खत्री ने ज्ञानबोध की रचना की.

सूफी संतों ने भी हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया. कुतबन चिश्ती सूरी संत शैख़ बुरहान का शिष्य था. उसने  मृगावती की रचना की. मनिहन (मंजन) ने मधु मालती और महान सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी ने चंदायनचंदायन की रचना की. अवधि में लिखी गयी इस काव्यग्रंथ का नायक लोरिक (लोर) और नायिका चंदा है. यह मध्यकाल में उत्तर भारत की लोकप्रिय प्रेमकथा है.  

मृगावती विशुद्ध राजपूती रोमांस है और इसमें रूपक के कुछ तत्व हैं. इसमें चंदननगर के राजकुमार और कंचनपुर की राजकुमारी के प्रेम और रोमांस का वर्णन है. मधु मालती कनेसर के राजकुमार मनोहर और मह्र्स की राजकुमारी मधुमालती की प्रेम्कथाका वर्णन है. इसमें प्रत्येक पाँच चौपाई (अर्धाली)  के बाद एक दोहा है. यही शैली मृगावती में भी अपनाई गयी है. लेकिन मधुमालती में कल्पना का विलास अधिक है. इसमें कूकुत्बन की मृगावती की तुलना में अधिक कल्पना और जीवन के अधिक गहरे रूपक हैं. इसे उत्तर भारत की अवधि परम्पराओं में कल्पना आधारित श्रेष्टतम रचना माना गया है. 

जायसी केपद्मावत में चित्तोड़ के रत्नसेन और सीलोन की राजकुमार पद्मावती की प्रेमकथा और अलाउद्दीन खिलजी के साथ रत्नसेन के युध्ध का वर्णन है. पद्मावत अवधि में लिखी गयी बहुत उच्च कोटि की प्रेमकथा है, जिस पर  संस्कृत पद्मावती का कोई प्रभाव नहीं है. 

पद्मावत ऐतिहासिक ग्रंथ से अधिक एक रोमांटिक कृति है. पद्मावत की कहानी एक रूपक है और जायसी ने इसमें चित्तोड़ को मानव शरीर के रूप में रत्नसेन को आत्मा के और पद्मिनी को ज्ञान के प्रतीक रूप में वर्णित किया है. इसमें अलाउद्दीन खिलजी भ्रम, राघो शैतान और तोता गुरु का प्रतीक है. जायसी की अन्यकृति आखरी कलाम है, जिसमे क़यामत के दिन का वर्णन है जबकि अखरावटआद्याक्षरन्तरीकाव्य है. 

अमीर खुसरो का उल्लेख किये बिना हिन्दी साहित के विकास का विवरण अधूरा होगा. अमीर खुसरो खिलजी और तुगलक शासकों के दरबार में कविथे. वह एक विलक्षण विद्वान्, रहस्यवादी (सूफी) औरकवि थे.उन्होंने फ़ारसी में बड़ी संख्या में कविताएँ और प्रेमाख्यानों की रचना की. वह हिंदी के सबसे प्रारम्भिक लेखकों में एक थे. उनकी हिन्दी रचनाओं में पहेलियाँ और सम्मिश्रित पद और मुहाबरे शामिल हैं.. उन्होंने फ़ारसी और हिन्दी मिश्रित गज़लें लिखीं. उन्होंने जिस हिन्दी का प्रयोग किया वह दिल्ली और उसके आसपास बोली जाती थी. अ

मीर खुसरो खालिक बारी के प्रसिद्द लेखक हैं. यह फ़ारसी-अरबी और हिन्दी काव्य रचनाओं का एक छोटी शब्दकोश है. खुसरो एक उच्च कोटि के विद्वान,लेखक और कवि थे. उनकी अनेक फारसी रचनाओं में उनके असीमित उर्वरक चिंतन और प्रतिभा का परिचय मिलता है.

संत तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस तो कालजयी कृति है ही, जिसका वर्णन किसी एक आलेख में किया जाना संभव ही नहीं है.

इस प्रकार हम देखते हैं की मध्यकाल में हिन्दी साहित्य का भी काफी विकास हुआ.

 

 

 


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