महर्षि अगस्त्य -दिनेश मालवीय

महर्षि अगस्त्य

-दिनेश मालवीय

महर्षि अगस्त्य एक मंत्रदृष्टा ऋषि हैं. महर्षि वशिष्ठ के बड़े भाई अगस्त्यजी की गणना सप्तर्षियों में होती है. इनकी उत्पत्ति के विषय में विभिन्न कथायें प्रचलित हैं. वह अनेक दिव्य शक्तियों से सम्पन्न थे और उन्होंने महान वैज्ञानिक शोधकार्य के द्वारा इन्होंने लोक कल्याण और दुष्टों के विनाश के लिए बहुत प्रभावी अस्त्रों का निर्माण किया. भगवान श्रीराम अपने वनवास के दौरान उनके आश्रम पर पधारे थे. ऋषि ने श्रीराम को अनेक दिव्य अस्त्र प्रदान किये. महाआततायी लंकेश्वर रावण पर विजय में महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रदान किये गये दिव्यास्त्रों की प्रमुख भूमिका थी. अगस्त्यजी ने श्रीराम को सूर्योपस्थान की पद्धति बतायी.

अगस्त्यजी के सभी वैज्ञानिक शोध और कार्य लोकहित में होते थे. उनके द्वारा “अगस्त्य संहिता” नामक ग्रंथ की रचना की गयी. इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है. इसमें सबसे आश्चर्यजनक सूत्र विद्युत् उत्पादन से सम्बंधित हैं. इन सूत्रों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि विद्युत् का अविष्कार ऋषि अगस्त्य ने ही किया था. यह ऋग्वेद के अनेक मंत्रों के दृष्टा हैं. इनकी पत्नी लोपामुद्रा वेदज्ञ थीं.

महर्षि अगस्त्य के बारे में कुछ कथाएं बहुत प्रचलित हैं. एक बार विन्ध्याचल ने गगनपथगामी सूर्य का मार्ग रोक लिया. वह इतना ऊँचा हो गया कि सूर्य के आने-जाने का स्थान ही न रहा. सूर्य अगस्त्यजी के शरणागत हुए. अगस्त्यजी स्वयं विन्ध्याचल के पास गए. महर्षि ने कहा कि मुझे तीर्थों में पर्यटन करने के लिए दक्षिण दिशा में जाना है. परन्तु तुम्हारी ऊँचाई के कारण यह कठिन है. इस पर विन्ध्याचल उनके चरणों में लोट गया. अगस्त्य बड़ी सुगमता से उसे पार कर गये और कहा कि जब तक मैं न लौटूं तब तक तुम इसी प्रकार पड़े रहना. अगस्त्य लौटे ही नहीं और विन्ध्याचल वैसे ही पड़ा हुआ है.

एक बार भ्रमण करते हुए उन्होंने देखा कि कुछ लोग नीचे मुंह किये गये कुएं में लटके हैं. पता लगाने पर उन्हें मालूम हुआ कि ये उन्हीं के पितर हैं और उनके उद्धार का उपाय यह है कि वे संतान उत्पन्न करें. लिहाजा उन्होंने विदर्भराज की पुत्री लोपामुद्र से विवाह किया.

उस समय इल्वल और वातापी नाम के राक्षसों ने बहुत उत्पात मचा रखा था. वे ऋषियों को अपने यहाँ निमंत्रित करते थे और वातापी स्वयं भोजन बन जाता तथा जब ऋषि लोग भोजन कर चुकते तो इल्वल बाहर से उसे पुकारता और वह उनका पेट फाड़कर निकल आता. महर्षि अगस्त्य ने इस अत्याचार को समाप्त करने का निर्णय लिया. एक दिन वह वहाँ अतिथि के रूप में पहुँचे और हमेशा के लिए वातापी को पचा गये.

एक बार इंद्र ने वृतासुर को मार डाला तब कालेय नाम के दैत्यों ने समुद्र का आश्रय लेकर ऋषि-मुनियों का विनाश करना शुरू कर दिया. वे दैत्य दिन में तो समुद्र में रहते और रात में निकलकर पवित्र जंगलों में रहने वाले ऋषियों को खा जाते. उन्होंने वशिष्ठ, भारद्वाज, च्यवन आदि के आश्रम में जाकर ऋषि-मुनियों को खा डाला. देवतागण अगस्त्यजी की शरण में गये. अगस्त्यजी ने एक चुल्लू में सारे समुद्र को पी लिया. तब देवताओं ने जाकर कुछ दैत्यों का वध किया और कुछ भागकर पाताल चले गये.

एक बार ब्रह्महत्या के कारण इंद्र अपने पद से च्युत हो गये और राजा नहुष इंद्र बन गये. इंद्र होने के अधिकार के मद में उन्होंने इंद्राणी को अपनी पत्नी बनाने की चेष्टा की. तब बृहस्पति की सम्मति से इंद्राणी ने उसे एक ऐसी सवारी पर आने की बात कही, जिस पर अब तक कोई सवार न हुआ हो. सत्ता के मद में अंध हुए नहुष ने सवारी ढोने के लिए ऋषियों को बुलाया. ऋषि पालकी में जुट गये. नहुष उन्हें कोड़े मारता हुआ जल्दी चलो! जल्दी चलो! (सर्प सर्प) कहता था. महर्षि अगस्त्य से यह देखा नहीं गया और उन्होंने उसे शाप देकर एक महाकाय सर्प बना दिया. इस प्रकार उन्होंने समाज की मर्यादा की रक्षा की और धन तथा पट के मद में अंधे लोगों की आँखें खोल दीं.

अपने उच्च मानवीय गुणों और लोकोपकारी कार्यों के लिए महर्षि अगस्त्य भारत की आध्यात्मिक परम्परा के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं.

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