महात्मा गाँधी: व्यावसायिक जीवन की शुरूआत

बम्बई में जहाज से उतरते ही एक अत्यंत दुखद समाचार सुनने को मिला। इस समाचार ने उन्हें हिला कर रख दिया। समाचार यह था कि जब वह इंग्लैंड में थे तभी उनकी माँ चल बसी थीं। परिवरवालों ने जान-बूझकर उनसे यह खबर छिपा रखी थी, ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।

कुछ समय राजकोट में बिताने के पश्चात् गांधीजी ने बम्बई आकर वकालत करने का निश्चय किया। कुछ दिनों तक वे यहाँ रहे। किंतु अदालत के माहौल से वे क्षुब्ध हो गये। रिश्वत, झूठ, साजिश और वकीलों की घटिया दलीलों से उन्हें घृणा होने लगी। इसलिए मौका मिलते ही, वे यहाँ से अन्य कहीं और जाने के लिए तैयार बैठे थे।

अपने आपको बम्बई में असफल होता देख वे एक फिर राजकोट चले गये। यहाँ भी उन्हें सुकून नहीं मिला। इसी बीच उन्हें वह मौका मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी। दक्षिण अफ्रीका का स्थित भारतीय मुस्लिम फर्म दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी ने अपने मुकदमे की पैरवी के लिए दक्षिण अफ्रीका में उन्हें आमंत्रित किया। दक्षिण अफ्रीका का यह प्रस्ताव उन्हें भा गया। वर्ष 1893 के अप्रैल महीने में चौबीस वर्षीय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका चले गये।

जहाज छ सप्ताह में डरबन पहुँचा। वहाँ अब्दुल्ला सेठ ने उनकी अगवानी की। वहाँ भारतीयों की संख्या अधिक थी। यहाँ के अधिकांश व्यापारी मुसलमान थे। मुसलमान अपने को ‘अरब` तो पारसी अपने आपको ‘पर्शियन` कहलाना पसंद करते थे। यहाँ भारतीयों को, चाहे वो कोई भी काम क्यों न करता हों, किसी भी धर्म जाति के क्यों न हों, यूरोपीय उन्हें ‘कुली` कहते थे। दक्षिण अफ्रीका के एकमात्र बैरिस्टर एम. के. गांधी शीघ्र ही ‘कुली बैरिस्टर` के नाम से जाने जाने लगे।

डरबन में एक सप्ताह बिताने के बाद गांधीजी ट्रंसवाल की राजधानी प्रिटोरिया जाने को तैयार हुए। उनके मुवक्किल के मुकदमे की सुनवाई वहीं होनी थी। अब्दुल्ला ने उन्हें प्रथम दर्जे का टिकट खरीद कर दिया। जब गाड़ी नाताल की राजधानी मार्टिजबर्ग पहुँची, तो रात 9 बजे के करीब एक श्वेत यात्री डिब्बे में आया। उसने रेल कर्मचारीयों की उपस्थिति में गांधीजी को ‘सामान्य डिब्बे` में जाने का आदेश दिया। गांधीजी ने इसे मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद एक सिपाही की मदद से उन्हें बलपूर्वक उनके सामान के साथ डिब्बे के बाहर ढकेल दिया गया। उस रात कड़ाके की ठंड थी। ठंड की उस रात में प्रतिक्षा कक्ष में बैठे गांधीजी सोचने लगे, मैं अपने अधिकारों के लिए लडूँ या फिर भारत वापस लौट जाउ? अंत में उन्होंने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का निश्चय किया।

अगले दिन आरक्षित बर्थ पर यात्रा करते हुए गांधीजी चार्ल्सटाउन पहुँचे। यहाँ एक और दिक्कत उनका इंतजार कर रही थी। यहाँ से उन्हें जोहान्स्बर्ग के लिए बग्गी पकड़नी थी। पहले तो एजेंट उन्हें यात्रा की अनुमति देने के पक्ष में ही नहीं था, पर गांधीजी के आग्रह पर उसने उन्हें अनुमति तो दे दी। लेकिन बग्गी में नहीं बल्कि कोचवान के साथ बाहर बक्से पर बैठ कर उन्हें यात्रा करनी थी। गांधीजी अपमान के इस कड़वे घूंट को भी पी गये। लेकिन कुछ देर बाद जब उस सहयात्री ने गांधीजी को पायदान के पास बैठने को कहा, ताकि वही खुली हवा और सिगारेट का आनंद कोचवान के पास बैठ कर ले सके, तो गांधीजी ने इंकार कर दिया। इस पर उस आदमी ने गांधीजी की खूब पिटाई की। कुछ यात्रियों ने बीच-बचाव किया और गांधीजी को उनकी जगह पुनः दे दी गई।

प्रिटोरिया तक की यात्रा के अनुभवों ने, ट्रंसवाल में भारतीयों की स्थिति का उन्हें आभास करा दिया था। सामाजिक न्याय के पक्षधर गांधीजी इस संबंध में कुछ करना चाहते थे। वे तैय्यब सेठ के पास गये। मुकदमा उसके ही खिलाफ चल रहा था। उससे उन्होंने मित्रता कर ली, यह एक विशिष्ट प्रयास था। उसकी मदद से उन्होंने ट्रंसवाल की राजधानी में रहने वाले सभी भारतीयों की एक बैठक बुलाई। बैठक एक मुसलमान व्यापारी के घर पर हुई और गांधीजी ने बैठक को संबोधित किया। अपने जीवन में गांधीजी का यह पहला भाषण था। उन्होंने भारत से आने वाले सभी धर्मों एवं जातियों के लोगों से भेदभाव मिटाने का आग्रह किया। साथ ही एक स्थायी संस्था बनाने का सुझाव दिया ताकि भारतीयों के अधिकारों की सुरक्षा की जा सके और समय-समय पर अधिकारीयों के समक्ष उनकी समस्याओं को उठाया जा सके।

नाताल की उपेक्षा ट्रंसवाल में भारतीयों की स्थिति बदतर थी। यहाँ भारतीयों को असमानताओं, तिरस्कारों और कठिनाइयों का अधिक सामना करना पड़ता था। यहाँ के कठोर कानून की मार हर भारतीय झेल रहा था। ट्रंसवाल में प्रवेश के लिए उन्हें तीन पाउंड का ‘प्रवेश कर` देना पड़ता था। रात्रि में नौ बजे के बाद बाहर निकलने के लिए अनुमति पत्र लेना पड़ता था। वे सार्वजनिक फुटपाथों पर नहीं चल सकते थे, उन्हें पशुओं के साथ गलियों के रास्ते में ही चलना पड़ता था। एक बार तो राष्ट्रपति क्रूगर के घर के निकट फुटपाथ पर चलने के लिए गांधीजी पुलिसवालों के हत्थे चढ़ गये थे।

कुछ काल के लिए भारतीयों की दुर्दशा की ओर से गांधीजी का ध्यान हट गया – व्यावहारिक कारण यह था कि उन्हें अब्दुल्ला सेठ की मुकदमे की ओर ध्यान देना था, जिसके लिए वे यहाँ आये थे। उन्होंने अब्दुल्ला सेठ और उनके चचेरे भाई तैय्यब सेठ के बीच सुलह करा दी। उनके इस शांतिपूर्ण समझौते की चर्चा वहाँ का हर भारतीय करता रहा। गांधीजी का एक वर्ष समाप्त हो गया था, और मुकदमा तय करने के बाद वे स्वदेश लौटने की तैयारी करने लगे थे। वे डरबन लौट आये।

अब्दुल्ला सेठ ने उनके सम्मान में एक विदाई समारोह आयोजित किया। इस विदाई समारोह के दौरान गांधीजी की नजर समाचार पत्र में छपी एक खबर पर पड़ी, जो नाताल के ‘इंडियन फ्रैंचाइज़ बिल` के बारे में था। इस विधेयक के जरिये वहाँ के भारतीयों का मताधिकार छीना जा रहा था। गांधीजी ने इसके गंभीर परिणामों से लोगों को अवगत कराया। भारतीय मूल के लोग गांधीजी से वहाँ ठहरने और उनका मार्गदर्शन करने की चिरौरी करने लगे। गांधीजी ने वहाँ एक महिना ठहरने की बात इस शर्त पर मान ली कि सभी लोग अपने मताधिकार के लिए आवाज उठायेंगे।

गांधीजी ने वहाँ स्वयंसेवकों का एक संगठन खड़ा किया। वहाँ के विधानमंडल के अध्यक्ष को तार भेजकर यह अनुरोध किया कि वे भारतीयों का पक्ष सुने बिना मताधिकार विधेयक वर बहस न करें। लेकिन इसे नजरंदाज कर मताधिकार विधेयक पपरित कर दिया गया। गांधीजी हार मानने वाले नहीं थे। उन्होंने लंदन में उपनिवेशों के मंत्री लार्ड रिपन के समक्ष अपनी वह याचिका पेश की, जिस पर अधिकाधिक नाताल भारतीयों के हस्ताक्षर थे।

बैचेनी भरा एक महीना बीत जाने के बाद छोड़ना गांधीजी के लिए असंभव लगने लगा था। डरबन के भारतीयों की समस्याओं ने उन्हें रोक लिया। लोगों ने उनसे वहीं वकालत करने का आग्रह किया। समाज सेवा के लिए पारिश्रमिक लेना उनके स्वभाव के विरूद्ध था। लेकिन उनकी बैरिस्टर की गरिमा के अनुरूप तीन सौ पाउंड प्रतिवर्ष की जरूरतवाले धन की व्यवस्था भारतीस मूल के लोगों द्वारा की गई। इसके बाद गांधीजी ने अपने आपको जनसेवा में समर्पित कर दिया। नाताल के सर्वोच्च न्यायालय में काफी परेशानियाँ झेलने के बाद अंत में उन्हें वहाँ के प्रमुख न्यायाधीश ने वकील के रूप में शपथ दिलाई। संघर्ष करके गांधीजी काले-गोरे का भेद मिटाकर सर्वोच्च न्यायालय के वकील बन गये।

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