भारत के विभिन्न प्रांतों के प्रमुख संत-दिनेश मालवीय

भारत के विभिन्न प्रांतों के प्रमुख संत

-दिनेश मालवीय

हर देश और संस्कृति का एक मूल चरित्र होता है. ऐसा कहें कि यही उसकी आत्मा होती है. कोई देश अपनी सामरिक शक्ति के कारण जाना जाता है तो कोई अपने ज्ञान-विज्ञान के कारण तो कोई अन्य किसी कारण से पहचाना जाता है. भारत में इन सभी शक्तियों का कभी अभाव नहीं रहा, लेकिन इसकी मूल चेतना और शक्ति इसकी आध्यात्मिकता ही रही. भौतिक और लौकिक विषयों में जहाँ भारत ने पूरे विश्व में अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, खगोल सहित ज्ञान की अनेक शाखाओं में अपनी पताका फहराई, वहीँ विश्व को भारत की सबसे अनमोल देन आध्यात्मिकता है. कभी सारा जगत आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भारत की ओर देखता था और विश्व भर से लोग यहाँ धर्म और अध्यात्म की शिक्षा के लिए आते हैं. आज भी विश्व में जो अशांति और अराजकता की स्थिति निर्मित हो रही है, उसमें विश्व फिर से आध्यात्मिक शान्ति के लिए फिर से भारत की ओर देख रहा है.



भारत में अनादि काल से ही ऋषि-मुनियों की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिनमें से कुछ बहुत ज्ञात हैं, कुछ अल्पज्ञात हैं तो कुछ अज्ञात ही हैं. ऋषि-मुनि तो अपनी जगह हैं, लेकिन हमारे देश के हर प्रांत में सदा-सदा से ऐसे संत हुए हैं, जिन्होंने अपने पवित्र जीवन और उपदेशों के बल पर  स्थानीय जनमानस को धर्म  के मार्ग से नहीं भटकने दिया. लोकचेतना में उनकी इतनी गहरी छाप है कि सैंकड़ों वर्ष बीतने के बाद भी वे आम लोगों के लिए भगवान से कम नहीं हैं. वे उनकी तस्वीरों और विग्रहों को अपने घर के पूजा-स्थल में भगवान के साथ ही प्रतिष्ठित कर उनकी पूजा-अर्चा करते हैं. उनके उपदेशों को पढ़ते हैं और उन्होंने यथासंभव देश,काल तथा परिस्थिति के अनुसार जीवन में आत्मसात करने का प्रयास किया हैं. यही कारण है कि भारत के किसी भी प्रांत से,विशेषकर उनके अंदरूनी क्षेत्रों में  तमाम भौतिक विकास और उससे उपजी अनेक विसंगतियों के बाबजूद धर्म और अध्यात्म का भाव आज भी सर्वोपरि बना हुआ है. ऐसा शायद ही देखने को मिले जहाँ किसी न किसी संत की तस्वीर न हो.

“न्यूज पुराण” देश के विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर जो संत हुए उनके चरित्र, व्यक्तित्व और कृतित्व के विषय में एक श्रंखला शुरू कर रहा है.. इससे एक प्रांत के लोग दूसरे प्रांतों के संतों के विषय में भी जान पाएँगे.आशा है कि इसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिलेगा.

कश्मीर के महान संत

इस श्रंखला का प्रारम्भ हम कश्मीर के संतों से करते हैं. आज कश्मीर का जो स्वरूप से कुछ सदी पहले इससे एकदम भिन्न था. यह शैव दर्शन और तंत्र-साधना का बहुत प्रमुख केंद्र था. यहाँ ललितादित्य जैसे परम प्रतापी सम्राट हुए, जिन्होंने संस्कृत और सनातन धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. उनकी राजधानी परिहासपुर धर्म-संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र थी.

पाँचवीं सदी में कश्मीर में अनेक शैव भक्त हुए. इन्होंने शैव संप्रदाय की अनेक शाखाओं का विकास हुआ. इन संतों ने ज्ञान, भक्ति और योग तीनों का बहुत व्यापक रूप से प्रसार किया.

संत लल्लेश्वरी या लल्ल

यह एक ऐसी परम साध्वी थीं, जिनकी आध्यात्मिक सिद्धियाँ बहुत उच्च कोटि की थीं. इन्हें लल्लदीदी और लालदेद के नाम से भी जाना जाता है. जाति व्यवस्था के अनुसार इनका जन्म एक बहुत छोटी कही जाने वाली ढेड़वा मेहतर जाति में हुआ था.लेकिन भारत की महान परम्परा यही है कि जो ज्ञान और भक्ति के मार्ग का पिपासु हो, उसकी जाति नहीं देखी जाती. उन्होंने शैवमत में दीक्षा ली. उस समय वहाँ अधिकार शैव आचार्य ब्राह्मण थे. उनके गुरु का नाम सेद्बायु था. उन्होंने इतनी उत्कट साधना की कि वह सर्वमान्य और सर्वपूज्य हो गयीं. वह सदा भ्रमणशील रहती थीं.



लल्लेश्वरी ने ईश्वर को अपने ही भीतर खोजने की शिक्षा दी और उसके लिए योग-ध्यान को सबसे श्रेष्ठ साधन निरूपित कर स्वयं एक आदर्श स्थापित किया.उन्हें उनके ही परिजन ने बहुत दुःख दिए. इससे त्रस्त होकर वह घर छोड़कर सदा के लिए चली गयीं. उनका वैराग्य इतना प्रबल था कि उन्हें अपने तन का भी बोध नहीं रहा और वह कब दिगंबर हो गयीं, उन्हें पता ही नहीं चला. यह चेतना की सर्वोच्च अवस्था है.

लल्ल को अपनी प्रशंसा और निंदा की कोई चिंता नहीं थी. वह सदा परमानंद में लीन रहकर भ्रमण करते हुए लोककल्याण के कार्य में संलग्न रहीं. विघ्नसंतोषी लोगों ने उनके मार्ग में बहुत बाधाएं खड़ी कीं, लेकिन वह अपने मार्ग से नहीं डिगीं. वह जाति, धर्म और मानवनिर्मित हरएक सीमा से ऊपर उठ चुकी थीं. उन्हें श्रृष्टि के कण-कण में शिव ही व्याप्त दिखायी देता था.

कश्मीरी रामायण के रचयिता प्रकाशराम 

कश्मीर में प्रकाशराम कुर्यग्रामी नाम के एक संत-कवि हुए हैं. उन्होंने “रामावतारचरित” नाम से कश्मीरी रामायण की रचना की. उनकी भाषा पूरी तरह स्थानीय होने के कारण लोगों में यह बहुत लोकप्रिय रही. इसमें संस्कृत और अरबी के शब्दों का भी प्रयोग बहुत अच्छे ढंग से किया गया है. इस ग्रन्थ के पाठ में हिन्दुओं के साथ ही मुसलमान भी भाग लेते हैं. कश्मीरी भाषा शारदा लिपि में लिखी जाती है, जो ब्राह्मी का ही कश्मीरी स्वरूप है. कश्मीरी भाषा में सात रामायण लिखी गयीं, जिनमें “रामावतारचरित” का प्रमुख स्थान है.

कश्मीर से लगे हिमालय क्षेत्र में संत मौलाराम और संत शशिधर जैसे महान पवित्र पुरुष भी हुए. संत मौलाराम ने “मनमथ पंथ” की स्थापना की, जिसमें जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं था. उन्होंने लोगों को गृहस्थ जीवन जीते हुए भगवान की भक्ति की शिक्षा दी.

संत शशिधर गढ़वाल क्षेत्र में हए. उन्होंने अपनी साधना में सभी जीवों से प्रेम को सबसे ऊंचा स्थान दिया  उनके चार ग्रंथों का उल्लेख मिलता है- 1. दोहावली 2. ज्ञानदीप 3. सच्चिदानंद लहरी और 4. योग प्रेमावली.


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ