मनुष्य हमेशा उन्नति नही कर सकता

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इस जीवनसमस्या के और कौन-कौन से समाधान है पहले उनके बारे में चर्चा की जाए। इस संबंध में एक प्राचीन सिद्धांत यह था कि — *मनुष्य मरने के बाद जैसा पहले था वैसा ही रहता है केवल उसके सारे अशुभ चले जाते हैं और उसका जो कुछ शुभ है वही अनंत काल के लिए बच जाता है।

यदि तर्कसंगत भाषा में इस सत्य को रखा जाए तो वह ऐसा रूप लेता है कि—

*यह संसार ही मनुष्य का चरम लक्ष्य है और इस संसार की ही कुछ उच्चावस्था को जहाँ उसके सारे अशुभ निकल जाते हैं और केवल शुभ ही शुभ बच जाता है स्वर्ग कहते हैं।यह बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि यह मत नितांत असंगत और बच्चों की बात के समान है क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता।ऐसा कभी नहीं हो सकता कि शुभ है पर अशुभ नहीं अथवा अशुभ है पर शुभ नहीं।

जहाँ कुछ भी अशुभ नहीं सब शुभ ही शुभ है ऐसे संसार में वास करने की कल्पना भारतीय नयायिकों के अनुसार दिवास्वप्न देखना है।फिर एक और मतवाद जकल के बहुत से संप्रदायों से सुना जाता है वह यह है कि मनुष्य लगातार उन्नति कर रहा है चरम लक्ष्य पहुँचने का सतत संघर्ष कर रहा है किंतु कभी भी वहां तक पहुँच ना सकेगा।यह मत ऊपर से सुनने में तो बड़ा युक्तिसंगत मालूम होता है पर यह भी वस्तुतः बिल्कुल असंगत ही है क्योंकि

कोई भी गति एक सरल रेखा में नहीं होती। प्रत्येक गति वर्तुलाकार में ही होती है।यदि तुम एक पत्थर लेकर आकाश में फेंको उसके बाद यही तुम्हारा जीवन हो और पत्थर के मार्ग में कोई बाधा ना आए तो घूमकर वह ठीक तुम्हारे हाथ में वापस आ जाएगा।यदि एक सरल रेखा अनंत दूरी तक बढ़ाई जाए तो वह अंत में एक वृत्त का रूप धारण कर लेगी। अतएव यह मत है कि—

मनुष्य का भाग सदैव अनंत उन्नति की ओर है उसका कहीं भी अंत नहीं सर्वथा असंगत है।

स्वामी विवेकानंद


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